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टैक्स का मकड़जाल, हर कोई बदहाल

Posted On: 14 Jan, 2014 बिज़नेस कोच,social issues में

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टैक्स का मकड़जाल, हर कोई बदहाल

-नितिन प्रधान

(उप ब्यूरो प्रमुख)

स देश में नौकरीपेशा आदमी की सबसे बड़ी चिंता शायद इनकम टैक्स है। लेकिन क्या आप जानते हैैं कि इनकम टैक्स के अलावा ऐसे कई टैक्स हैैं जो आपकी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा खा रहे हैैं। एक अनुमान के मुताबिक आप अपनी आमदनी का करीब 50 फीसद हिस्सा देश में लागू प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों पर खर्च कर देते हैैं। देश के टैक्स ढांचे में बदलाव की बात यूं ही नहीं उठी है। वर्तमान में देश में 32 तरह के प्रत्यक्ष कर और करीब 50 तरह के अप्रत्यक्ष कर लागू हैं। टैक्स का यह ऐसा मकड़जाल है कि जनता की जेब से निकलने वाले पैसे का एक बड़ा हिस्सा इन टैक्सों के जरिए सरकारी खजाने की भेंट चढ़ जाता है। छोटी से छोटी खरीद और सेवा अब टैक्स के दायरे में है। इसलिए अब आप ऐसा कोई सौदा नहीं करते जहां आप करों का भुगतान नहीं करते।


एक सौदे में एक तरह का टैक्स हो इसकी भी गारंटी नहीं है। हम आप अधिकांश मामलों में एक सौदे में एक से ज्यादा करों का भुगतान करते हैैं। केंद्र सरकार कई टैक्स हमसे सीधे तौर पर लेती है और ज्यादातर अप्रत्यक्ष तरीके से लिए जाते हैैं। यही वजह है कि टैक्स का ढांचा इतना जटिल हो चुका है कि आम आदमी के लिए इसे समझना बेहद मुश्किल हो गया है। बिक्री कर, उत्पाद कर, सीमा शुल्क, सेवा शुल्क आदि जैसे कर हैैं जिन्हें हम आप पहचानते हैैं और जिनके बारे में जानते हैैं। लेकिन ऐसे तमाम टैक्स हैैं जिनका अप्रत्यक्ष बोझ आप पर पड़ता है और उसका भुगतान आपकी जेब से होता है। राज्यों में ली जाने वाली चुंगी, एंट्री टैक्स, परचेज टैक्स का आपसे कोई सीधे लेना देना नहीं है। लेकिन सामान की आवाजाही पर लगने वाले ये टैक्स उसकी कीमत में शामिल हो जाते हैैं जिसका बोझ जनता को उठाना पड़ता है।


देश में सरकार ने टैक्स का ढांचा इस तरह बनाया है कि आपको कहीं से आमदनी होती है तो उस पर टैक्स है। आप कहीं खर्च करते हैैं तो उस पर टैक्स देते हैैं। घर में भोजन करते हैैं तो उसमें टैक्स की भागीदारी होती है और बाहर खाने जाते हैैं तो भोजन के दाम के अलावा वैट, सेवा शुल्क और सर्विस चार्ज जैसे टैक्स अदा करने पड़ते हैैं। आप वाहन खरीदते हैैं तो उस पर टैक्स देते हैैं, उसे चलाने के लिए रोड टैक्स देते हैैं। उसे चलाने के लिए जरूरी ईंधन पर कई तरह के टैक्स में हिस्सेदारी करते हैैं। यानी जनता को किसी भी रूप में टैक्स अदायगी से बचाव नहीं है। सरकार के टैक्स ढांचे का यह ऐसा पेंच है जिसमें किसी तरह का बचाव नहीं है। चूंकि केंद्र और राज्य सरकारों का खजाना भरने का स्नोत यही टैक्स ढांचा है, इसलिए बिना राजनीतिक इच्छाशक्ति के इसमें बदलाव भी संभव नहीं है। चूंकि जनता केवल इनकम टैक्स को लेकर ही चिंतित रहती है इसलिए सरकारें भी आम आदमी को आयकर में रियायतों का झांसा दे उलझाए रखती है। जबकि एक आम आदमी साल भर में जितना आयकर भरता है उससे कई गुना वो अपनी जिंदगी गुजर बसर करने की जुगत में सरकार को दे देता है।

यदि प्रस्तावित कदम से न केवल राजस्व में वृद्धि होती हो बल्कि करदाताओं का दायरा भी बढ़ता हो, साथ ही नियामक ढांचे की पारदर्शिता भी सुधरती हो तो हमें इन आयामों का स्वागत करना चाहिए।

-सिद्धार्थ बिड़ला, अध्यक्ष, फिक्की


वैकल्पिक स्नोतों के साथ आयकर को कम या खत्म कर देना चाहिए। मेरा मानना है कि सरकार में क्षमता है कि वह विभिन्न अन्य स्नोतों से राजस्व जुटा सकती है। ये वे स्नोत हैं जिनको अभी इस्तेमाल ही नहीं किया गया है

-शरद जयपुरिया, अध्यक्ष, पीएचडीसीसीआइ

प्रस्तावित बैंकिंग ट्रांजैक्शन टैक्स बैंक में जमा धनराशि के लेनदेन पर लागू किया जा सकता है। व्यावहारिक रूप से भी यह आसान है, क्योंकि यह टैक्स बैंक, कमर्शियल एक्सचेंज या फिर क्लियरिंग प्रक्रिया के दौरान ऑटोमेटिक रूप के तहत किसी एक केंद्रीय आधिकारिक एजेंसी द्वारा एकत्र किया जा सकता है। व्यापक आधार वाले इस टैक्स को अगर लागू किया जाता है तो एक तो इससे कर चोरी करना मुश्किल हो जाएगा साथ ही प्रशासकीय लिहाज से बहुत आसानी होगी। हालांकि अभी इसके विश्लेषण की जरूरत है कि प्रस्तावित कराधान प्रणाली में टैक्स चोरी को कैसे रोकी जा सकती है। एक बड़ी खामी इस तंत्र की यह सामने आ सकती है कि लोग बैंक से लेन देन करना बंद कर सकते हैं और नकदी लेनदेन को बढ़ चढ़कर करने लग सकते हैं। इस समस्या को दूर करने के लिए छोटी कीमतों वाली मुद्रा के चलन को बढ़ावा देना होगा। इसके अलावा इस विचार को अमलीजामा पहनाने में देश के दूरदराज इलाकों में भी बैंकों की मौजूदगी सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती है। भारत जैसे देश में इस तरह की नई कर प्रणाली को लागू करने की संभावनाओं की पड़ताल के लिए व्यापक स्तर पर बहस और विमर्श की भी जरूरत है।

-सुशील सिंह, चार्टर्ड अकाउंटेंट

इससे भ्रष्टाचार कम हो सकता है। सरकारी एजेंसियों से लोगों की होने वाली झड़प कम हो सकती है। निजी के साथ साथ कारपोरेट टैक्स अदा करने वाले लोगों पर से भी टैक्स का बड़ा बोझ हट सकता है। करदाताओं को अपना कर बचाने के लिए खाता-बहियों में गड़बड़ियों, मनीलांडरिंग जैसे अन्य अनैतिक गतिविधियां नहीं करनी होंगी। हालांकि इस रास्ते पर चलने से पहले हमें एक समग्र्र और व्यापक विश्लेषण की जरूरत होगी।

-गिरीश वनवारी, केपीएमजी


देश में मौजूदा टैक्स की स्थिति

सालाना दो लाख रुपये कम की आय : कोई कर नहीं

10% दो-पांच लाख रुपये के बीच

20% पांच-दस लाख रुपये के बीच

30% 10 लाख रुपये से ऊपर

33% कारपोरेट इनकम टैक्स


अतिरिक्त सरचार्ज : एक करोड़ रुपये सालाना की आय वाले सुपर अमीरों से 10 प्रतिशत अतिरिक्त सरचार्ज लिया जाता है, जोकि कुल मिलाकर 33 प्रतिशत पड़ता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस श्रेणी में महज 42,800 लोग शामिल हैं

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