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अलविदा 2013: महिला सुरक्षा और सशक्तीकरण

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अंत भला तो सब भला

जल और पर्यावरण

जल, नदी और पर्यावरण को लेकर यह साल सकारात्मक रहा है। महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों ने नदी पुनर्जीवन को लेकर बड़े बजट का प्रावधान किया है। वहीं जिस घोषणापत्र पर मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की फिर ताजपोशी सुनिश्चित हुई है, उसमें भी नदी और जल संरक्षण को अहम स्थान मिला हुआ है। ऐसा लगता है कि इस साल सभी राज्य और केंद्रीय सरकार इस मसले पर गंभीर दिखती हैं। देश के युवा अब यह समझने लगे हैं कि अगर नदी की सेहत ठीक रहेगी तभी उनका भी स्वास्थ्य दुरुस्त रहेगा

-राजेंद्र सिंह, मैगसेसे विजेता जल विशेषज्ञ

प्राकृतिक आपदा और चुनौती

इस साल ने दो बड़े इशारे किए हैं। केदारनाथ त्रासदी के रूप में प्रकृति ने पहला संकेत दिया है। यह प्रकृति का स्पष्ट इशारा है कि अब वह इंसान की मनमानी को ज्यादा बर्दाश्त नहीं करेगी। दूसरी बात के तहत इस साल ने यह भी बताया है कि हम विकास की योजनाओं के प्रति कितने कमजोर हैं। हम स्थायी आर्थिक ढांचे को विकास में जो भी प्रमुखता दे रहे हैं वह असंतुलित है। अपने विकास को पर्यावरण के साथ संतुलन साधने की हमारी सबसे बड़ी चुनौती आज भी कायम है

-डॉ अनिल प्रकाश जोशी, पर्यावरणविद्

भारत और पड़ोसी देश

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कमजोर सुरक्षा नीतियों की वजह से इस साल हमें पड़ोसी देशों की आक्रामकता का खामियाजा उठाना पड़ा। चीन के सैनिक कई बार घुसपैठ करके हमारी जमीन में आए और बाकायदा तंबू लगाकर जम गए। दूसरी तरफ पाकिस्तानी सैनिक हमारी सीमा में घुसकर हमारे जवान का सिर काटकर चले गए। देश की ‘आ बैल मुझे मार’ की नीति ने इस साल दोनों पड़ोसी देशों को हमारे खिलाफ मजबूत किया। हालांकि भारतीय सैन्य क्षमता को बढ़ाने वाली कुछ अच्छी बातें हुई हैं। हमारी सेना में कुछ नए सैन्य हथियारों, विमानों और पोतों को शामिल किए जाने से प्रतिद्वंद्वी देशों के मुकाबले हम कहीं ज्यादा ताकतवर हुए हैं लेकिन सरकार को डंडा और डॉयलाग दोनों साथ-साथ चलाना पड़ेगा -भरत वर्मा, सुरक्षा विशेषज्ञ

महिला सुरक्षा और सशक्तीकरण

महिला सुरक्षा, अधिकारों और सशक्तीकरण को लेकर यह साल ऐतिहासिक रहा है। महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों, यौन उत्पीड़न इत्यादि के खिलाफ न केवल कानून बदला है बल्कि सामाजिक चेतना भी बदली है। पहले यौन शोषण जैसे महिला अपराध केवल महिलाओं के निजी मसले हुआ करते थे, लेकिन अब यह मसला सामाजिक होता दिखा है। समाज में इसके खिलाफ व्याप्त आक्रोश से इसे सहज समझा जा सकता है

-रंजना कुमारी, निदेशक, सेंटर फॉर  सोशल रिसर्च

पुलिस सुधार और कानून व्यवस्था

लोकपाल बिल और दुष्कर्म रोधी कानून में सुधार जैसे नए कानून उपलब्धियां रहे। कानूनों के बारे में बाल्जाक (फ्रेंच रचनाकार) ने कहा है कि ये मकड़ी के जाले की तरह होते हैं जिनमें से बड़ी तितलियां तो निकल जाती हैं लेकिन केवल छोटी पकड़ में आ जाती हैं। कानून तभी अच्छे होते हैं जब बिना किसी भय और पक्षपात के प्रभावी तरीके से ये लागू हों। यह पेशेवर रूप से सक्षम और ईमानदार पुलिस बल पर निर्भर करता है -जीपी जोशी,

डायरेक्टर ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (रिटायर्ड)

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

karan के द्वारा
January 20, 2014

किरण बेदी मुझे लगता है अरविन्द केजरीवाल से छिड़ती हैं और राजनीती मैं न आने की बकालत करने बाली किरण बेदी को शोभा नहीं देता कि वो पोलिटिकल ब्यक्ति के लिए सार्वजानिक रूप से व्यान दें इससे उनकी क्रेडिबिलिटी देश मैं कम हो रही है |


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