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महाशक्ति और भुखमरी

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Dainik Jagran Mudda

भुखमरी ने अमेरिका में 24 साल के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। चार में से एक आदमी गरीब और सात में से एक व्यक्ति भूखे पेट सोने को बेबस है। करीब 32 करोड़ की आबादी में यहां 4.7 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं। अटलांटिक महासागर से सटे हुए समृद्ध यूरोपीय संघ में 12 करोड़ लोग भुखमरी से जूझ रहे हैं। सबसे चकित करने वाली बात यह है कि भारत में लागू नए खाद्य सुरक्षा कानून के तहत यहां प्रत्येक व्यक्ति को सालाना 60 किग्र्रा अनाज मुहैया कराए जाने का प्रावधान है जबकि अमेरिका डेयरी उत्पादों और प्रसंस्कृत खाद्य समेत लोगों को 358 किग्र्रा खाद्यान्न मुहैया करा रहा है।


खाद्य सुरक्षा कानून से उम्मीदें

भुखमरी की हालत को सुधारने में खाद्य सुरक्षा कानून एक जरिया बन सकता है, मगर अभी यह भुखमरी खत्म करने में पर्याप्त क्षमतावान नहीं दिखाई देता है। हमें खाद्य सुरक्षा का और अधिक मजबूत और प्रभावी क्रियान्वयन चाहिए जो वाकई देश को भूख से मुक्ति दिला सके।

सवाल यह है कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की गंभीर स्थिति को क्या खाद्य सुरक्षा कानून सुधार सकता है? इसका जवाब निश्चित रूप से हां ही हो सकता है क्योंकि हमारे गोदामों में जमा स्टॉक से इस वर्ष के लिए हमें 64 मिलियन टन अनाज की ही जरूरत पड़ेगी, इसके बाद भी हमारे पास 16 मिलियन टन अनाज बचा रहेगा। क्या यह अच्छा नहीं होगा कि गोदामों में पड़े-पड़े अनाज सड़ जाए, उसे चूहे खाए, इसके बजाय वह लोगों के पेट तक जाए, गरीब तक पहुंचे और बंटे?


कई लोगों का मत है कि यह फायदा कभी भी पात्र लोगों तक नहीं पहुंचेगा, लेकिन तमिलनाडु , छत्तीसगढ़, ओडिशा तथा आंध्रप्रदेश जैसे राज्यों द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये जनता तक अनाज पहुंचाने के कार्यक्रम सफलतापूर्वक चलाया जा रहा है। वे अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति के जरिए कामयाब हुए हैं।


अब खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत देश की 67 प्रतिशत जनता इसके दायरे में आई है, विभिन्न राज्य सरकारें उसमें अपना अंश जोड़कर लगभग सार्वभौमिक करने के आस-पास पहुंच गई है, पर अब भी हमारा मानना है कि इसे ठीक से लागू करने के लिए एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है, भले ही बिल आनन- फानन में लाया गया हो मगर उसकी प्रभावी पालन सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था बैठाई जानी बहुत जरूरी है, जो राज्य इससे थोड़ा बहुत असहमति व्यक्त करते है उन्हें भी अब इसे पूरे मन से लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए ताकि देश से भुखमरी जैसी समस्या को जड़मूल से नष्ट किया जा सके।


अभी मात्र 25 किलो अनाज प्रति परिवार दे रहे है, यह वाकई कम है, इससे दोगुने की तुरंत आवश्यकता है, हमें यह भी मानना होगा कि केवल अनाज देने से भुखमरी और कुपोषण से यह देश मुक्त नहीं हो सकता है, जैसा कि तमिलनाडु, केरल जैसे राज्य तेल व दाल दे रहे है और राजस्थान के बारां जिले की आदिम सहरिया जन जाति को मुफ्त फूड पैकेज दिए हैं जिसमें दाल, तेल, अनाज इत्यादि होते है, उसी प्रकार का संपूर्ण पोषण युक्त खाद्यान्न की सुरक्षा सबको दी जा सके तो अच्छा होगा।

-अरुणा रॉय/भंवर मेघवंशी (लेखकद्वय मजदूर किसान शक्ति संगठन के साथ कार्यरत हैं।)

…………..

नीति के साथ नियंता भी सुधरें

-दीपा सिन्हा

(खाद्य एवं जन स्वास्थ्य मसलों की शोधकर्ता और भोजन के अधिकार अभियान की कार्यकर्ता)

तमाम प्रयासों के बावजूद बदस्तूर जारी भुखमरी इन सरकारी योजनाओं पर सवाल खड़े करती है। यदि ये कुछ खास अंतर लाने में समर्थ नहीं हैं तो क्या इन्हें जारी रखा जाना चाहिए?


वैश्विक भुखमरी सूचकांक ने एक बार फिर देश में व्याप्त भुखमरी और कुपोषण की गंभीर परिस्थितियों को उजागर किया है। विगत दो दशकों की टिकाऊ आर्थिक वृद्धि, पर्याप्त कृषि उत्पादन और गोदामों में गेहूं, चावल के रिकॉर्ड भंडारण के बावजूद इस तरह के हालात शर्मनाक हैं। देश में इन समस्याओं से निपटने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम (आइसीडीएस) और स्कूल मील जैसी योजनाओं का लंबा अतीत रहा है। हाल में पारित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एक्ट (एनएफएसए) इसी दिशा में अगला प्रयास है। इन सब प्रयासों के बावजूद लगातार जारी ऐसी परिस्थितियां इन सरकारी योजनाओं पर सवालिया निशान खड़े करती हैं। सवाल उठते हैं कि यदि ये कुछ खास अंतर लाने में समर्थ नहीं है तो ऐसी योजनाओं को क्या जारी रखना चाहिए? यद्यपि इस तरह के तर्क घातक हैं क्योंकि इनसे परिस्थितियां सुधरने के बजाय बदतर ही होंगी।


सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि ये कार्यक्रम कभी सुचारु रूप से चल ही नहीं पाए। मसलन पीडीएस जो पहले सार्वभौमिक योजना थी उसको 1997 में लक्षित लोगों के लिए तब्दील किया गया। इसमें गरीबों को पहचानने में समस्याएं देखी गईं। दरअसल सर्वे दर सर्वे बताते हैं कि गरीबी की व्यापक प्रकृति और हमारे अत्यधिक असमान समाज के कारण यह सुनिश्चित कर पाना असंभव है कि समाज कल्याण योजनाओं के लिए वास्तविक गरीब कौन है। नतीजतन कई ऐसे लोग जो वास्तव में गरीब हैं लेकिन वे गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) की सूची में शामिल नहीं हैं। नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) डाटा के अनुसार करीब 50 प्रतिशत गरीबों के पास बीपीएल कार्ड नहीं है। इसके अलावा राजनेताओं, अफसरों और दुकानदारों की साठगांठ के चलते इस तंत्र में बड़े पैमाने पर लीकेज व्याप्त है। पूरे पीडीएस में 40 प्रतिशत से भी ज्यादा का लीकेज है। इसका यह आशय भी नहीं है कि समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता। भारत जैसे देश में अलग-अलग राज्यों में भिन्नताएं देखने को मिलती हैं। कुछ राज्यों में इस तंत्र को प्रभावी तरीके से लागू किया है और उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।


दक्षिणी राज्यों केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश एवं हाल के वर्षों में अच्छा प्रदर्शन करने वाले छत्तीसगढ़, ओडिशा और राजस्थान के अनुभव बताते हैं कि पीडीएस में इस तरह से सुधार की गुंजाइश है कि लोगों को नियमित रूप से अनाज मिलता रहे और न्यूनतम लीकेज हो। इन राज्यों में जो सबसे आम गुण पाए गए उनमें लगभग सार्वभौमिक स्तर तक विस्तार, कंप्यूटरीकरण, राशन की दुकानों को निजी हाथों से लेना, अनाज की दरवाजे तक डिलीवरी, प्रभावी शिकायत निवारण केंद्र और पारदर्शी एवं जवाबदेही उपाय हैं। एनएफएसए ने इन सुधारों को पूरे देश में लागू करने का रास्ता खोल दिया है। लोगों और सिविल सोसायटी की सतत निगरानी के माध्यम से इस कानून के प्रावधानों का उपयोग कर यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि देश में भुखमरी और कुपोषण की स्थिति से मुक्ति पाई जा सके।


यद्यपि यह ध्यान रखने की जरूरत है कि भुखमरी और कुपोषण को खत्म करने के लिए अनाज आधारित पीडीएस प्रणाली पहला कदम ही है। टिकाऊ बदलाव के लिए हमको अधिक समान आर्थिक मॉडल की जरूरत है जहां वृद्धि को समान तरीके से बांटा जाए और लोगों के संसाधन और जीविकोपार्जन की सुरक्षा की जा सके। कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी और किसानों के लिए लाभकारी कीमतें सुनिश्चित की जानी चाहिए। ऐसे कदम उठाए जाने की दरकार है ताकि वर्तमान अनाज आधारित आहार के दायरे को बढ़ाकर उनमें दालें, तेल, सब्जियां, फल और जन्तु प्रोटीन को भी शामिल किया जा सके। इसके साथ ही महिलाओं और बच्चों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इन सब उपायों को करने के बाद ही कुपोषण के खिलाफ वास्तविक लड़ाई संभव हो सकेगी।


20 अक्टूबर  को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘रोटी के लिए खरी-खोटी‘ कठिन राह पर चलना है मीलों’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.

20 अक्टूबर  को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘भुखमरी पर किरकिरी‘ कठिन राह पर चलना है मीलों’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.



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