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शुद्धीकरण का शुभारंभ !

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मुद्दा

साख

जिस सबसे विशाल लोकतंत्र की दुहाई पूरी दुनिया बड़े अदब से देती रही है, उसकी मर्यादा को समय-समय पर उसके रखवालों ने ही तार-तार किया है। अपने आचार, विचार और व्यवहार से हमारे राजनेता राजनीति को धूल धूसरित करते हुए भारतीय लोकतंत्र की मजबूत जड़ों को खोखला करते रहे हैं। लिहाजा आम जनमानस में अधिसंख्य नेताओं की छवि खराब होती गई। उनको लगने लगा कि ये लोग चाहे कुछ भी करें, इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। विडंबना यह कि हमारे माननीयों ने इस लोकतांत्रिक असंगति को ठीक करने की जहमत भी नहीं उठाई। भला हो लोकतंत्र के दूसरे संस्थानों का जिन्होंने समय-समय पर लोकतंत्र को सींचते रहने का काम किया है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आलोक में दो पूर्व मुख्यमंत्रियों लालू प्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्र एवं सांसद रशीद मसूद को हुई सजा लोकतंत्र को मजबूत करने की बड़ी उम्मीद है।


सबक

ये सजाएं राजनीतिक भ्रष्टाचार के दंभ पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा मारे गए किसी तमाचे जैसी हैं जिसकी गूंज राजनेताओं सहित हम सबके लिए किसी सबक से कम नहीं है। यह फैसला उन राजनेताओं के लिए सबक होगा जो कानून को ठेंगे पर रखकर मनमानी करते हैं। जनता के खून पसीने की गाढ़ी कमाई से गुलछर्रे उड़ाते हैं। यह फैसला उन नौकरशाहों के लिए भी सबक जैसा है जो अपने राजनीतिक आका के इशारे और अभयदान पर भोली-भाली निरीह जनता को ठगने में उसका साथ देते हैं। यह फैसला उस बेबस आम आदमी के लिए किसी ऐसे सबक से कम नहीं है जो उसके मन-मस्तिष्क में राजनेताओं और नौकरशाहों की रच बस गई छवि और धारणा को तोड़ने में मददगार होगा।


सवाल

भ्रष्टाचार के मामलों में दागी नेताओं को सजा और सदस्यता रद होने के विधान से राजनीतिक शुद्धीकरण की शुरुआत हो चुकी है। लंबे इंतजार के बाद ही सही, अमावस में रोशनी की यह कौंध उम्मीद तो जगाती ही है। एक नये युग का सूत्रपात हो चुका है। यहां से स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र बनाने का सिलसिला शुरू हो चुका है। स्वस्थ लोकतंत्र के बुनियाद की पहली ईंट रखते हुए यह आशा और उम्मीद की जानी चाहिए कि ईंटों के रखने का यह क्रम न ही रुके और न ही थके। राजनीति से अपराधीकरण को रोकने की दिशा में कई अहम फैसलों को लेकर जनता में जो सकारात्मक उम्मीद जगी है, उसकी पड़ताल आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।

……………


शुद्धीकरण का शुभारंभ !

-जगदीप एस छोकर

(आइआइएम, अहमदाबाद के पूर्व प्रोफेसर, डीन और डायरेक्टर इन चार्ज रहे हैं)


यह शुभ संकेत है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को मजबूती देने वाले राजनीतिक और चुनाव सुधारों की शुरुआत हो चुकी है।क्या लोकतंत्र को मजबूत करने वाले  राजनीतिक सुधार वास्तविक रूप से शुरू हो गए हैं? बेझिझक और पूर्ण सहमति के साथ इस प्रश्न का सकारात्मक जवाब देने की इच्छा है लेकिन जैसे दूध का जला छाछ फूंक-फूंक कर पीता है, वैसे ही 15 साल के कड़वे अनुभव के बाद हमें ये बेझिझक कहने में संकोच महसूस होता है। लेकिन इंसान आशाओं पर जीता है सो यह कहा जा सकता है कि ऐसा लगता है कि राजनीतिक सुधारों की शुरुआत हो चुकी है।


इसके प्रयास 1999-2000 में तब शुरु हुए थे जब राजनीतिक सुधारों के मकसद से कुछ समूहों ने न्यायपालिका का रुख अख्तियार करके जनहित याचिकाएं दायर की थीं। उसके शुरुआती निर्णय 2000-03 में देखने को मिले थे जब लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी देना कानून बन गया। उससे कई अन्य समूहों ने उत्साहित होकर निर्वाचन और राजनीतिक सुधारों के लिए 2003-05 के बीच कई जनहित याचिकाएं दाखिल कीं।


करीब 14 साल पहले शुरू हुए उन प्रयासों के नतीजे अब उन याचिकाओं पर निर्णयों के जरिये फलीभूत हो रहे हैं। इसकी ताजा शुरुआत तीन जून, 2013 को केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) के उस निर्णय से हुई जिसमें कहा गया कि सूचना के अधिकार एक्ट (आरटीआइ) के तहत छह राष्ट्रीय पार्टियां सार्वजनिक प्रतिष्ठान हैं। उस निर्णय को राजनीतिक दल अभी तक स्वीकार नहीं कर पाएं हैं और विरोध कर रहे हैं। फिलहाल मसला संसद की स्थायी समिति के पास है।


इसकी अगली कड़ी में 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने लिली थॉमस निर्णय या अपराधीकरण निर्णय सुनाया। उसमें किसी आपराधिक मामले में सक्षम अदालत द्वारा दो या उससे अधिक वर्षों की सजा सुनाए जाने के बाद संबंधित व्यक्ति संसद सदस्य या विधायक नहीं रह सकता। इससे पहले उच्च अदालत में अपील करने के बाद वे अपने पद पर बरकरार रहते थे। इस निर्णय का भी तीव्र विरोध हुआ। सरकार ने पुनर्विचार याचिका दायर करते हुए सुप्रीम कोर्ट से कहा कि उसका निर्णय असंगत है लिहाजा उसकी समीक्षा की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में परंपरा रही है कि यदि पुनर्विचार को स्वीकार किया जाता है तो उसकी सुनवाई जजों के चैंबर में होती है लेकिन इस मामले में कोर्ट ने अपवाद स्वरूप इस याचिका को खुली अदालत में सुना। चार सितंबर, 2013 को सरकार के तर्कों से असहमति प्रकट करते हुए उसने पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया।


राजनीतिक हल्के में विरोध जारी रहा। प्रत्यक्ष तौर पर संपूर्ण राजनीतिक तंत्र में आम सहमति बनने के बाद एक बिल राज्य सभा में पेश किया गया। जनप्रतिनिधित्व कानून (आरपी एक्ट) में संशोधन संबंधी उस बिल का विशेष उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को निष्प्रभावी करना था। उसके बाद कुछ अप्रत्याशित राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद सरकार ने आरपी एक्ट में बदलाव संबंधी बिल और अध्यादेश को वापस लेने का निर्णय लिया।


इसी तरह 27 सितंबर, 2013 को एक अन्य निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश देते हुए कहा कि वह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में मतदाताओं को ‘किसी भी प्रत्याशी को वोट नहीं’ (नोटा) संबंधी विकल्प का बटन उपलब्ध कराए। इस निर्णय के क्रियान्वयन पर भी विचार या कहें तो विवाद चल रहा है।


जबर्दस्त विरोध करने के बाद अंतत: संपूर्ण राजनीतिक तंत्र को लिली थॉमस निर्णय को अंतिम रूप से स्वीकार करना पड़ा। इससे यह शुभ संकेत निकला है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को मजबूती देने वाले चुनाव सुधारों की शुरुआत हो चुकी है। अभी अन्य राजनीतिक सुधार भी बाकी हैं। इस क्षेत्र के अन्य सुधारों में सबसे बड़ा सुधार राजनीतिक दलों के वित्तीय मसलों से है। 30 अगस्त, 2013 को निर्वाचन आयोग ने सभी मान्यता प्राप्त दलों को ‘पार्टी फंड में पारदर्शिता और जवाबदेही’ के मसले पर लिखा था। इसमें कहा गया है कि ‘स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के हित में जरूरी और उचित है कि राजनीतिक दलों के फंड के मसले पर पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के लिए गाइडलाइंस होनी चाहिए।’ निर्वाचन आयोग ने 10 मुद्दों को सूचीबद्ध कर राजनीतिक दलों के उन पर विचार या सुझाव मांगे हैं। यह सुनने में आया है कि कुछ राजनीतिक दलों जैसे तृणमूल कांग्रेस और अन्नाद्रमुक ने निर्वाचन आयोग के सभी दसों बिंदुओं पर सहमति प्रदान की है।


6 अक्टूबर  को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘निर्णायक जीत-हार का है अभी इंतजार’ कठिन राह पर चलना है मीलों’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


6 अक्टूबर  को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘विश्वसनीयता का संकट’ कठिन राह पर चलना है मीलों’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.



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