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पड़ोसी की फितरत, हमारी हसरत

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पड़ोस

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आज न्यूयॉर्क में बैठक करने जा रहे हैं। वैसे तो दोनों पड़ोसियों के बीच शीर्ष स्तर पर होने वाली ऐसी किसी भी बातचीत पर दुनिया की निगाहें लगी रहती हैं, लेकिन यह वार्ता इसलिए अहम है कि लगातार सीमा पर युद्ध विराम के उल्लंघन और पाकिस्तान द्वारा भारतीय जवानों की हत्या जैसे बर्बर कृत्य करने के बाद दोनों शीर्ष नेता मुलाकात कर रहे हैं। हाल ही में जम्मू कश्मीर के सांबा और कठुआ में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमलों ने इस मुलाकात की प्रासंगिकता को और गहरा दिया है।


पहलू

आजादी के बाद से ही यह स्यापा किया जाता रहा है कि पाकिस्तान के बार-बार छुरा घोंपने के बाद भी हम उससे बात क्यों करते हैं? कहीं न कहीं इस आक्रोश में पाकिस्तान द्वारा हमें दी गई पीड़ा परिलक्षित होती रही है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर पड़ोस में अमन चैन रहेगा तभी हम भी सुकून और तरक्की कर सकेंगे जिसके लिए दोनों पक्षों में वार्ता अपरिहार्य है। यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि पड़ोसी को चुना नहीं जा सकता है। युद्ध किसी भी चीज का एकमात्र विकल्प नहीं है। वार्ता निश्चित रूप से होनी चाहिए लेकिन ध्यान रखना होगा कि कोई इसे हमारी कमजोरी न समझे।


पहल

नवाज शरीफ की नीयत में अभी तक कोई खास दुर्भावना नहीं दिखती, इसलिए हमारे प्रधानमंत्री को इस मुलाकात के दौरान यह बात रखनी चाहिए कि आतंकवाद से भारत और पाकिस्तान मिलकर कैसे लड़ सकते हैं? पाकिस्तान पर यह दबाव बनाना चाहिए कि सीमा पर आतंकवाद को दोनों देशों की सेनाएं मिल कर ध्वस्त करें। जब तक सीमा के उस पार से साझा कार्रवाई की ईमानदार पहल नहीं होती, पाकिस्तान या नवाज शरीफ की नीयत पर स्थायी रूप से भरोसा नहीं किया जा सकता। बात तो यहां तक बढ़ा देनी चाहिए कि पाकिस्तान में तालिबान समर्थित आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने के लिए नवाज शरीफ अमेरिका की ओर ताकने के बजाय भारत से सहयोग की अपील करें। आतंकवाद से भारत और पाकिस्तान वाकई धरातल पर साझा मुकाबला करते हुए दिखें। ऐसे में दोनों देशों के बीच मधुर संबंध स्थापित करने के लिए एक आदर्श किंतु व्यावहारिक तस्वीर खींचना आज दोनों देशों के लिए बड़ा मुद्दा है।


संजीदगी का गंभीर संकट

-प्रोफेसर उमा सिंह

(सेंटर फॉर साउथ एशियन स्टडीज, जेएनयू)

पाक से मुंह फेरने का कोई मतलब नहीं है। भारत को अपने पड़ोसियों के साथ वृहद रणनीति अपनाते हुए अपनी नीतियों पर ध्यान देने की जरूरत है। वे केवल प्रतिक्रियावादी नहीं होनी चाहिए। पाकिस्तान के साथ बातचीत न करने से परोक्ष रूप से उन लोगों और संगठनों का ही भला होगा जो दोनों देशों के बीच शांति नहीं चाहते। पाकिस्तान के साथ शांतिपूर्ण संतुलन प्रधानमंत्री की प्राथमिकता होनी चाहिए। नवाज शरीफ को सेना के ऊपर सिविल सरकार की सर्वोच्चता स्थापित करके संजीदगी दिखानी होगी पाकिस्तान नीति के संदर्भ में भारत को सक्रिय और सुगठित ‘रणनीतिक विचार’ की जरूरत है


29 सितंबर को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘साम दाम दंड और भेद से काम लें’ कठिन राह पर चलना है मीलों’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


29 सितंबर को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘डायलॉग के साथ डंडा भी चलाने की जरूरत’ कठिन राह पर चलना है मीलों’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.



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