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Muzaffarnagar Riots: तंत्र में फूंकना होगा मंत्र

Posted On: 16 Sep, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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तंत्र में फूंकना होगा मंत्र

-विभूति नारायण राय

((आइपीएस)- कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय और ‘शहर में कफ्र्यू’ पुस्तक के लेखक


यदि हम दोषी प्रशासन को कठोर दंड दे सकें तो शायद भविष्य में कोई दूसरा जिला मुजफ्फरनगर न बने। मैं यह मानता हूं कि भारत में कोई भी सांप्रदायिक दंगा चौबीस घंटे से अधिक नहीं चल सकता। यदि सांप्रदायिक हिंसा की कोई घटना चौबीस घंटे से अधिक समय तक किसी क्षेत्र में जारी है तो यह कहा जा सकता है कि राज्य ऐसा चाहता है। राज्य की यह सहमति सक्रिय मौन अथवा आपराधिक निष्क्रियता के रूप में हो सकती है। मेरे इस कथन का यह आशय कदापि नहीं है कि राज्य चाहे तो चौबीस घंटे के अंदर किसी दंगाग्र्रस्त क्षेत्र में संपूर्ण शांति कायम हो जायेगी, पर मेरा यह मानना जरूर है कि राज्य की तमाम सदिच्छाओं के बावजूद किसी दूरदराज के इलाके में आगजनी या सूनी गलियों में इक्का दुक्का छुरेबाजी की घटनाएं तो होती रहेंगी किंतु बड़े दंगे जैसे दृश्य बिना राज्य की सक्रिय सहमति के संभव नहीं है।


पिछले कई वर्षों से सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ एक बिल कानून बनने की प्रतीक्षा कर रहा है। यदि यह कानून बन पाता तो इसकी दो विशेषताएं इसे भारत के दूसरे कानूनों से अलग पहचान देती। पहली बार इसमें सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों के लिए मुआवजे का प्रावधान किया गया है। यह मुआवजा आज की तरह किसी राजनेता या अदालत के विवेक पर आधारित नहीं होगा। आज स्थिति यह है कि दंगों में मरने वालों या संपत्ति का नुकसान झेलने वालों को राजनेता अपनी अपनी राजनीतिक समझ या जरूरत के मुताबिक मुआवजे घोषित करते हैं। मसलन एक ही जैसी परिस्थिति में मरने वाले अलग-अलग धर्मावलंबियों  को अलग अलग राशि मुआवजे के तौर पर देते हैं। अदालतें भी कमोबेश एक जैसा मानदंड नहीं अपनाती। इस कानून में पहली बार मुआवजे को लेकर एक सांस्थनिकप्रयास हुआ है। दूसरा महत्वपूर्ण प्रावधान सांप्रदायिक हिंसा के लिए उत्तरदायित्व निर्धारण का है। यह एक मजेदार तथ्य है कि हमारे देश में सांप्रदायिक हिंसा के गंभीरतम मामलों में भी उत्तरदायी पुलिस अधिकारियों अथवा मजिस्ट्रेटों को बिरले ही सजा मिल पाती है। मैं 1994 में एक फेलोशिप के तहत सांप्रदायिक हिंसा के दौरान पुलिस की निष्पक्षता पर काम कर रहा था और मैंने उसमें आजादी के बाद से तब तक हुए दस सबसे बड़े दंगों में दोषी पुलिस अधिकारियों, मजिस्ट्रेटों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को मिले दंडों के संबंध में सूचनाएं खंगालने की कोशिश की तो मैंने पाया कि ऐसे उदाहरण दुर्लभतम थे जिनमें किसी को सजा दी गयी थी। प्रस्तावित एक्ट के मुताबिक केंद्र सरकार अभी तक प्रचलित परंपरा के अनुसार न सिर्फ राज्य सरकार को सलाह दे सकेगी वरन स्थिति को नियंत्रित करने के लिए निर्णायक निर्देश भी जारी कर सकेगी और राज्य सरकार को उसका पालन करना पड़ेगा।  मैंने सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ प्रस्तावित पर कानून न बन सकने वाले ड्राफ्ट का जिक्र मुजफ्फरनगर के हालिया दंगों के लिए जानबूझ कर किया है। 2002 के ग्यारह साल बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर ऐसे दृश्यों को देखना निश्चितरूप से बहुत निराशाजनक था जिनमें हजारों लोग अपने घर बार छोड़ कर मदरसों में शरण लिये हुये थे।


ये लोग किसी युद्ध क्षेत्र से आंतरिक रूप से विस्थापित अथवा आइडीपी जैसे लग रहे थे। यह निश्चित रूप से आपकी अंतरात्मा को झकझोर देने वाला दृश्य हो सकता है।  मुझे यह लगता है कि ऐसा तभी संभव हो सकता है जब हम इस स्थिति के लिए जिम्मेदार प्रशासनिक अमले के मन में यह भावना भर दें कि कुछ भी हो जाय उन्हें उनकी नालायकी के लिए कोई दंड नहीं मिलने वाला है। अच्छे संचार नेटवर्क वाले मुजफ्फरनगर जिले में क्या यह आशा की जा सकती है कि हजारों लोग असुरक्षा के माहौल में बाहर शरण लें। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि भारत  में सरकारी अमले के लिए अपनी नौकरी बचाने से बड़ी कोई और चिंता नहीं होती। यदि हम इस बार ही जिम्मेदार दोषी अमले को कठोर दंड दे सकें तो  शायद भविष्य में कोई दूसरा जिला मुजफ्फरनगर बनने से बच सकेगा।

……………..


जब हम सुधरेंगे तभी सुधरेगा समाज

-पुष्पेश पंत

(प्रो जेएनयू)


समस्या के समाधान के लिए सरकार का मुंह ताकना बेकार है। संकट निवारण के लिए हमें खुद सक्रिय होना पड़ेगा। मुजफ्फरनगर के दंगों ने एक बार फिर यह बात शर्मनाक ढंग से उजागर कर दी है कि आजादी और देश के विभाजन के साठ-पैंसठ बरस बाद भी हमारे शरीर में काफी सांप्रदायिक जहर बचा हुआ है और कभी भी विकराल घातक रूप धारण कर सकता है। हमेशा की तरह इस बार भी राजनीतिक दल एक दूसरे को दोष दे रहे हैं। कोई किसी को इसका अपराधी ठहरा रहा है कोई किसी दूसरे दल को राजनीतिक गोटियां सेंकने का आरोपी बना रहा है। हमारी समझ में यह पूरी बहस निरर्थक और राष्ट्रहित में नहीं। गुनहगार कौन? सवाल पूछने के पहले हमें अपने बारे में सोचने की सख्त जरूरत है।


यदि हम अर्थात निरीह आम आदमी जो अपनी रोजमर्रा की जिंदगी रोजी रोटी की जद्दोजहद में बिताता है,  पारंपरिक सांप्रदायिक भाईचारे के निर्वाह के लिए तैयार हैं तो कैसे कोई नेता हमें बहका फुसला कर छका सकता है? यह बात एकाधिक बार प्रमाणित हो चुकी है कि सामाजिक मीडिया हो या कस्बाती कानाफूसी वाली अफवाहें, इनका कोई आधार नहीं होता। अकसर चित्र और वीडियो जाली होते हैं पर पर्दाफाश के पहले कामतमाम कर चुके होते हैं। कितनी कत्लोगारत और आगजनी के बाद हम यह समझेंगे कि ऐसे ‘समाचारों’ और चश्मदीद गवाहियों की हकीकत क्या है? कभी म्यांमार के रोहिंगिया तो कभी बांग्लादेश के चकमा उत्पीड़ित भारतीय अल्पसंख्यक बना दिए जाते हैं। हर बार एक समुदाय के कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा आपराधिक हरकत के लिए उस पूरे समुदाय को जिम्मेदार समझ दंडित करने का काम आहत संप्रदाय के असामाजिक अपराधी अपने हाथ ले लेते हैं। दुर्भाग्य से सत्तारूढ दल की पक्षधरता इस तरह के घावों पर पपड़ी नहीं जमने नहीं देती। लगातार खुरचने से ही यह जानलेवा नासूर बना है।


हम फिर दोहराना चाहते हैं कि दोष तब भी हमारा है। इस समाज शास्त्रीय विश्लेषण से कोई लाभ होने वाला नहीं कि इस तरह की घटनाएं सामाजिक परिवर्तन तथा राजनीतिक संक्रमण के दौर में होती ही हैं। भूमंडलीकरण की आंधी में, उपभोगवादी अपसंस्कृति को आधुनिकता का पर्याय समझ अपनाने की उतावली में हमने अपने समाज को शांत स्थिर रखने वाले मूल्यों को नष्ट होने दिया है। संयुक्त परिवार की बात छोड़िए, नाभिकीय परिवार की आत्मीयता भी कहां बची है? महानगरों में लाखों की संख्या में रोज पहुंचने वाले ‘शरणार्थी’ (गांवों से  विस्थापित बेरोजगार नौजवान) कब तक जड़ों से कटे, अभावग्रस्त और यहां भी शोषित अहिंसक बने रह सकते हैं? पहले सांप्रदायिक दंगे कुछ बदनाम शहरों  की विरासत थे। यह घोर चिंता का विषय है कि अब देहात भी इससे अछूता नहीं।


15 सितंबर को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘लम्हों ने खता की सदियों ने सजा पाई’ कठिन राह पर चलना है मीलों’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


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