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Devaluation of Indian Rupee: जख्मों पर लगेगा नमक

Posted On: 9 Sep, 2013 बिज़नेस कोच में

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जख्मों पर लगेगा नमक

-जयप्रकाश रंजन

(विशेष संवाददाता)

31 अगस्त, 2013 को तेल कंपनियों ने पेट्रोल को 2.35 रुपये प्रति लीटर महंगा कर दिया। अगले हफ्ते डीजल की कीमत में पांच रुपये तक की वृद्धि की तैयारी है। पिछले तीन दिनों के भीतर जेट एयरवेज से लेकर एयर इंडिया तक ने घरेलू उड़ानों को 30 फीसद तक महंगा कर दिया है। फोर्ड ने अपनी कारों को पांच फीसद तक महंगा किया है। महिंद्रा एंड महिंद्रा ने ट्रैक्टर के दाम बढ़ा दिए हैं। अन्य कार कंपनियां भी कीमतें बढ़ाने की तैयारी में हैं। पिछले एक पखवाड़े में सरकारी व निजी क्षेत्र के करीब दस बैंक होम लोन व कार लोन की दरों को बढ़ा चुके हैं। यही नहीं, जानकार मान रहे हैं कि अगले दो महीनों के भीतर खाद्य तेलों की कीमतों में दस से 15 फीसद की वृद्धि तय है। ये कुछ बानगी है, जो बताती है कि डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी आम जन-जीवन को कितना प्रभावित करती है।


फीकी रहेगी दीवाली की चमक

हर वर्ष की तरह अगर आप इस बार भी दीवाली में टीवी, फ्रिज मोबाइल फोन, कंप्यूटर या अन्य घरेलू इलेक्ट्रॉनिक उपकरण खरीदने की सोच रहे हैं तो इस बार आपको न तो ‘टीवी के साथ फोन’, या ‘स्क्रैच करो मुफ्त फ्रिज ले जाओ’ जैसी स्कीमें मिलेंगी और न ही हर खरीद के साथ कुछ न कुछ गारंटीशुदा गिफ्ट मिलेंगे। साथ ही आपको ज्यादा कीमत अलग से देनी होगी। अप्रैल, 2013 से अगस्त, 2013 के पांच महीनों में एक डॉलर की कीमत 54 रुपये से बढ़ कर 67 रुपये होने से एक बात तय हो गई कि इस बार दीवाली की चमक फीकी रहेगी। कैनन, सैमसंग ने सितंबर के पहले हफ्ते में अपने कई उत्पादों की कीमतों को 3 से 5 फीसद तक बढ़ा कर रुपये की घटती कीमत का बोझ आम जनता पर डाल ही दिया है। दरअसल, ये कंपनियां कई तरह के कल-पुर्जे व अन्य उपकरण आयात करती हैं जिनका इस्तेमाल भारत में उत्पाद तैयार करने में किया जाता है। रुपये के कमजोर होने से इनकी आयात लागत बढ़ गई है। लिहाजा मंदी के बावजूद बढ़ी हुई कीमतें बढ़ाई जा रही हैं।


विदेश में पढ़ाई हुई महंगी

रुपये में लगभग एक चौथाई गिरावट का सीधा सा मतलब है कि जिस अभिभावक को हर महीने विदेश में पढ़ रहे बच्चे को 55000 रुपये (एक हजार डॉलर) देना होता था अब उन्हें अब 67 हजार रुपये देने पड़ते हैं। हर वर्ष 80 हजार के करीब भारतीय छात्र विदेश में पढ़ाई करने के लिए जाते हैं। एसोचैम के एक सर्वे के मुताबिक बाहर पढ़ रहे बच्चों पर भारत से हर वर्ष लगभग 15 अरब डॉलर की राशि जाती है।


महंगा लोन, महंगी कार

ऐसे समय जब उद्योग जगत, सरकार और आम जनता सस्ते कर्ज की उम्मीद कर रहे थे पिछले एक महीने में देश के दस प्रमुख निजी व सरकारी बैंकों ने ब्याज दरों को बढ़ा दिया है। इसके पीछे असली वजह रुपये की कमजोरी है। रुपये की हालत को संभालने के लिए ही रिजर्व बैंक को बाजार में तरलता (पूंजी के प्रवाह) को नियंत्रित करना पड़ा। इसका असर यह हुआ कि बैंकों को कर्ज की दरें बढ़ानी पड़ी। एक्सिस, एचडीएफसी, आंध्रा बैंक सहित कई बैंकों के होम लोन और ऑटो लोन महंगे हो गए। ताजे आंकड़े बता रहे हैं कि विदेश भ्रमण के पहले से बनाये गये प्रोग्राम को भी लोग रद कर रहे हैं। डॉलर की मजबूती भारतीयों के लिए पर्यटन को एक महंगा शौक बना दिया है।


किचन के अर्थशास्त्र पर असर

रुपये का अवमूल्यन सिर्फ देश के अर्थशास्त्र पर ही असर नहीं डालता बल्कि आम जनता की रसोई के बजट को भी गड़बड़ाने का माद्दा रखता है। उदाहरण के तौर पर डीजल की कीमतों में संभावित तीन से पांच रुपये की वृद्धि पूरे देश में माल ढुलाई को महंगा कर देगी। इससे फल-सब्जियों के साथ अन्य खाद्यान्नों की कीमतें बढ़ेंगी। हाल के वर्षों में भारतीय किचन में आयातित उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ी है। साथ ही देश अपनी मांग का 55 फीसद खाद्य तेल बाहर से आयात करता है। गृहणियों पर एक भारी बोझ आने वाले दिनों में महंगे रसोई गैस के तौर पर पड़ने वाला है।


साल 1991 या उसके पहले भी रुपये की कीमत में काफी गिरावट हुई थी लेकिन तब और आज के हालात में जमीन आसमान का अंतर है। उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक स्तर पर इतनी नहीं जुड़ी हुई थी। तब हम इतने बड़े पैमाने पर आयातित सामानों का इस्तेमाल नहीं करते थे। आज रुपया और डॉलर की कीमत से हर आम भारतीय प्रभावित होता है।

-राजीव कुमार (प्रसिद्ध अर्थशास्त्री व वित्त मंत्रालय के पूर्व सलाहकार)

………………..


यहां भी चूक गए हम

पिछले तीन दशक से भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर औसतन 6.4% रही। 2002 से 2011 तक औसत विकास दर 7.7% रही और भारत चीन के करीब पहुंचता हुआ दिखाई दिया लेकिन हमारे आत्मविश्वास को दरकते देर नहीं लगी जब हमारी अर्थव्यवस्था की विकास दर सुस्त होकर 4.4% पर जा पहुंची। रुपया लगातार नीचे जा रहा है, महंगाई और बजट घाटे के बढ़ने से आसन्न संकट साफ महसूस किया जा सकता है। अर्थविदों की मानें तो यह संकट नीति-नियंताओं की देन हैं।


समस्याएं

2004 में वर्तमान सरकार के सत्तासीन होने के बाद उससे मूलत: दो गल्तियां हुईं। पहली चूक के तहत उसने शायद मान लिया कि होने वाली तेज विकास ऑटो पायलट मोड थी लिहाजा ढांचागत समस्याओं को दुरुस्त करने में वह असफल रही। दूसरी चूक के तहत उसका राजस्व प्रबंधन बेहतर नहीं हो सका। परिणामों की परवाह किए बिना उसने बड़े पुनर्वितरण कार्यक्रमों द्वारा अपनी कमाई झोंक दी। लिहाजा उच्च वित्तीय और व्यापार घाटा सामने है।


8 सितंबर को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘टूट गया भ्रम, थम गए कदम’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


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