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छोटे राज्‍य बड़ी बहस

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चिंगारी

तेलंगाना गठन के फैसले ने नए राज्यों के आंदोलन की आग में घी का काम किया है। कई नए राज्यों के मांग की सुलगती चिंगारी भड़क उठी है। इस मसले पर हमारे राजनीतिक दलों द्वारा की जा रही सियासत इसे शोला बनाने पर आमादा है। ऐसे में नए राज्यों के गठन के तौर तरीके और उनकी जरूरत पर देश भर में बड़ी बहस शुरू हो चुकी है।


अंधियारी

बड़े राज्य बेहतर होते हैं या फिर छोटे राज्य? दोनों के पक्ष और विपक्ष में देने के लिए दलीलों की कमी नहीं है। फिलहाल इस मसले पर की जा रही अंधियारी राजनीति ने मुद्दे को रास्ते से भटकाने का काम किया है। देश की संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने के लिए धर्म, जाति, संस्कृति, बोली व भाषा के आधार पर नए राज्य के गठन को हतोत्साहित किए जाने की जरूरत है। वास्तविक जरूरत वाले उन्हीं पिछड़े क्षेत्रों को नए राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिए जिनमें खुद के बूते पुष्पित पल्लवित होकर तरक्की की सीढ़ियां चढ़ने की कूवत हो। राजनीतिक अस्थिरता की आशंका को भी पृथकता के पैमाने में शामिल किया जाना चाहिए।


तैयारी

बेहतर यह हो कि सियासी नफा-नुकसान से परे हटकर नई राज्य संभाव्यता के लिए राज्य पुनर्गठन आयोग का गठित किया जाए। अन्यथा राज्य का ‘गठन’ तो हो जाएगा, लेकिन उसके ‘निर्माण’ के लिए जनता तरसती रहेगी। नतीजतन अक्षम नेतृत्व के चलते ‘विशेष राज्य’ के दर्जे का ठप्पा लगाकर उसे केंद्र के रहमोकरम पर आश्रित रहना पड़ेगा। ऐसे में तेलंगाना के बहाने नए राज्यों के गठन के पीछे की जा रही सियासत और नए व छोटे राज्यों की आवश्यकता की पड़ताल आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।

………………


सक्षम नेतृत्व मिले तो ही राज्य खिले

-आश नारायण रॉय

(निदेशक, इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज,नई दिल्ली)


छोटे राज्यों की प्रशासनिक रूप से बेहतरी अब अप्रासंगिक हो चली है। बड़े व छोटे दोनों राज्य बेहतर और बदतर कर रहे हैं। प्रख्यात अमेरिकी लेखक मार्क ट्वैन ने कहा है ‘राजनीति एक ऐसी सौम्य कला है जिसमें गरीबों से वोट लिया जाता है और अमीरों से चुनाव खर्च। इसके बदले में इन दोनों से यह वायदा किया जाता है कि उनकी दूसरे से सुरक्षा की जाएगी।’ राजनीति को संभावनाओं की कला ठीक ही कहा गया है। यह रसायन की जगह विशुद्ध रूप से गणित है जिसके मायने चुनावों में  परिलक्षित होते हैं।


तेलंगाना को अलग राज्य बनाने का कांग्र्रेस सरकार का निर्णय जाहिर तौर पर वहां खुद की सियासी राजनीति को पुनर्जीवित करने की आशा में लिया गया है। लेकिन जैसा कि कहा गया है कि सरकारें कभी नहीं सीखतीं, केवल लोग सीखते हैं। आज सभी पार्टियां किसी भी राजनीतिक समस्या पर राजनीति करने से तनिक भी परहेज नहीं करती हैं। तेलंगाना इन्हीं समस्याओं में से एक है।


कांग्र्रेस के लिए यह एक बड़ा जुआ है जिसके परिणाम उलट भी आ सकते हैं। भाजपा एक मुंह से तो तेलंगाना के गठन का समर्थन करती है वहीं दूसरे मुंह से कांग्र्रेस की मंशा पर सवाल भी खड़े करती है। मायावती भी पीछे नहीं रहना चाहती हैं। बिना समय गंवाए उन्होंने उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में पृथक करने का शिगूफा छोड़ दिया। यह भी सही है कि अपनी सरकार के कार्यकाल के दौरान नवंबर, 2011 में उन्होंने इस आशय का प्रस्ताव विधानसभा से पारित कराया था, लेकिन वह समयावधि भी चुनाव से ठीक पहले की थी। बीच के इतने दिनों वे खामोश क्यों रहीं? शायद इसे ही मौकापरस्ती की राजनीति कहते हैं।


विडंबना देखिए। 1956 में आंध्र प्रदेश के साथ जिस तेलंगाना के विलय के साथ ही भाषाई आधार पर राज्यों के अस्तित्व में आने को तेजी मिली, वही आधार आज मृतप्राय होता दिख रहा है। भाषाई आधार पर राज्य किसी समय की जरूरत रहे होंगे, लेकिन आज इस आधार की उपयोगिता अपना समय खो चुकी है। बेहतर भविष्य की हसरत और सांस्कृतिक प्रभुता के खौफ से प्रेरित होकर समूह राज्य की मांग करते हैं।


तेलंगाना राज्य के गठन के फैसले ने समस्याओं का अंबार खड़ा कर दिया है। गोरखालैंड की मांग करने वाले हिंसक हो चले हैं। यदि तेलंगाना वास्तविकता है तो क्या विदर्भ और गोरखालैंड को इससे दूर रखा जा सकता है? अन्य नए राज्यों की मांगें बड़ी परेशानी खड़ी कर सकती है। छोटा सुंदर होता है, लेकिन क्या छोटा हमेशा अच्छा होता है? क्या आकार मायने रखता है या फिर प्रशासकीय कौशल बढ़त दिलाता है। गोवा, हरियाणा, हिमाचल, सिक्किम अच्छा कर रहे हैं लेकिन क्या नए राज्य छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड भी इसी रास्ते पर चल रहे हैं? बड़े व छोटे दोनों राज्य बेहतर कर रहे हैं और दोनों का ही खराब प्रदर्शन भी है। राज्य का गठन एक चीज है जबकि राज्य का निर्माण बिल्कुल जुदा चीज है। बेहतर प्रशासन अच्छे व जवाबदेह नेतृत्व और लोगों को सामथ्र्यवान बनाने से आता है।


कभी महाराष्ट्र बेहतर प्रशासित राज्य हुआ करता था, शनै: शनै: इसके क्षीण होते इस गुण की वजह इसका आकार नहीं बल्कि अक्षम नेतृत्व है। यदि वीएस नायपॉल के शब्दों में बिहार के साथ यह विशेषण जुड़ा था कि जहां ‘सभ्यता खत्म’ होती है तो यह इसके आकार के चलते नहीं था। बढ़िया प्रशासन से आज यह भी चमकता सितारा साबित हुआ है।


भारत जैसे विशाल और विविधता पूर्ण देश में अलग राज्य के लिए कोई एकसूत्रीय फार्मूला नहीं अपनाया जा सकता है। नए राज्य की व्यवहारिकता को इसकी मुख्य कसौटी होना चाहिए। तेलंगाना के गठन की सहमति के साथ ही ऐसे तमाम राज्यों की मांग शुरू हो चुकी है जिनके स्वतंत्र राज्य की व्यावहारिकता पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं।


4 अगस्त को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘जनमत भी है जरूरी‘ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


4 अगस्त को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘राष्ट्रीय एकता संप्रभुता पर पड़ सकता है असर‘पढ़ने के लिए क्लिक करें.




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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jazlynn के द्वारा
July 11, 2016

Rune, I hope you are doing well (you are not posting so frequently lately).How about a volcanic cloud picture? I am curious as to how this looks for people on the ground in Norway.Thank yoairevon!cupaiz@gmail.com


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