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निगरानी और जवाबदेही बढ़ाने की दरकार

Posted On: 5 Aug, 2013 Others में

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निगरानी और जवाबदेही बढ़ाने की दरकार

-डॉ रितिका खेड़ा

(असिस्टेंट प्रोफेसर, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, दिल्ली)


mid day meal thaliराजनीतिक रूप से प्रभावशाली होने के कारण इस योजना से जुड़े निजी ठेकेदार पकड़ की जद में नहीं आते। मिड डे मील स्कीम से वंचित तबकों के बच्चों के स्कूली नामांकन में व्यापक बढ़ोतरी हुई है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि स्कूलों में नियमित उपस्थिति बढ़ी और स्कूल छोड़ने की दर में गिरावट हुई है। बच्चों के जेहन में स्कूल की छवि बदली है। अब स्कूल सिर्फ सख्त शिक्षण वाली जगह से भोजन से लुभाने वाली जगह में तब्दील हो चुके हैं।


28 नवंबर, 2001 को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश के बाद अधिकांश राज्य पका भोजन खिलाने लगे। उससे पहले बच्चों को सूखा अनाज दे दिया जाता था। राजस्थान और बिहार के बीच विसंगति विशेष रूप से उल्लेखनीय है। कोर्ट का आदेश आने से पहले दोनों ही राज्य पका भोजन नहीं दे रहे थे। 2002 में जब इसकी शुरुआत हुई तो किसी के पास किचन, हैंडपंप, बर्तन और रसोइये नहीं थे। राजस्थान में शिक्षकों और बच्चों ने लकड़ी, पानी एकत्र कर खाना पकाने का प्रबंध किया। पके हुए खाने में बस घुघरी होती थी। तब से राजस्थान इस मामले में काफी प्रगति कर चुका है। रसोइये और हेल्पर नियुक्त किए गए। हैंडपंप और किचन या शेड लगाए गए। शिक्षक अब केवल निरीक्षण का कार्य करते हैं। घुघरी से शुरू कर राजस्थान अब साप्ताहिक मेन्यू तक पहुंच गया है। उसमें सप्ताह में दो बार फल (केला या अमरूद) भी शामिल है। झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों की तरह बिहार इस पूरे परिदृश्य में दो-तीन साल बाद आया। बिहार में मिड डे मील (एमडीएम) योजना की शुरुआत एक जनवरी, 2005 को हुई थी।


इस योजना में बजटीय आवंटन बढ़ने से निजी क्षेत्र ने भी एमडीएम के बाजार पर नजरें जमानी शुरू की। 2013-14 के केंद्रीय बजट में 13,800 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। 2008 में बिस्कुट निर्माता एसोसिएशन’ ने संसद सदस्यों से खाने की जगह स्कीम में पोषकता से भरपूर बिस्कुट देने का प्रस्ताव दिया। कई संसद सदस्यों ने प्रस्ताव को संबंधित मंत्रालय के पास भी भेजा। शुक्र है कि यह प्रस्ताव परवान नहीं चढ़ सका। इसके अलावा जवाबदेही तय करना अधिक कठिन है क्योंकि जिनको ठेका मिलता है वे राजनीतिक रूप से प्रभावशाली होने के कारण पकड़ की जद में नहीं आते। पोंटी चड्ढा के पास पूरे उत्तर प्रदेश में आंगनबाड़ी के खाद्य आपूर्ति का ठेका था। राज्य की सत्ता बदलने के बाद भी उनके ठेके पर कोई असर नहीं पड़ा। कई रिपोर्टों के मुताबिक खाद्य सप्लाई की गुणवत्ता दोयम दर्जे की पाई गई। इसी तरह की समस्या दिल्ली में खड़ी हुई, जहां केंद्रीयकृत किचन द्वारा भोजन की आपूर्ति के कारण अभिभावक, बच्चे और यहां तक कि शिक्षक भी अपने आप को बेबस पाते हैं कि वे शिकायत कहां करें?


कुल मिलाकर बिहार के दुखद हादसे से तीन महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं। पहला, बिहार जैसे पिछड़े हुए राज्यों को अग्रणी राज्यों से सबक सीखते हुए पौष्टिक भोजन देना चाहिए। दूसरा, बेहतर राज्यों की तर्ज पर प्रशासनिक, निगरानी और जवाबदेही करने वाला तंत्र विकसित किया जाना चाहिए। तीसरा, सरकार को ‘सार्वजनिक-निजी उपक्रम’ या ‘स्वयं सहायता समूहों’ के नाम पर निहित स्वार्थों से सुरक्षा करनी चाहिए क्योंकि ये अपना मुनाफा कमाने या निजी एजेंडे के तहत काम करते हैं। मिड डे मील स्कीम के तहत सरकार प्रति दिन हर बच्चे पर लगभग पांच रुपये खर्च करती है। इस खर्चे को अपने भविष्य में निवेश मानते हुए इसे बढ़ाने की जरूरत है ताकि यह पोषण का स्नोत बने।


मिड डे मील के सेवन से बीमार पड़ने वाले बच्चों के कई मामले हैं। खाने में छिपकली, सांप जैसे विषैले जीवों के निकलने की बात सामने आईं। घटिया स्तर के तेल, मसाले और सामानों के इस्तेमाल की शिकायतें बार-बार देखी गईं। ताजा मामलों पर एक नजर:


एक फरवरी, 2013 पश्चिम बंगाल के साउथ 24 परगना में एक मदरसे की 65 छात्राएं विषाक्त भोजन से बीमार हुईं

24 मार्च पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में एक बच्चे की मौत, 42 अस्पताल में भर्ती

27 जून गोवा में 23 बच्चे बीमार हुए


29 जून आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में गोराकल्लू जिला परिषद सरकारी स्कूल के 16 बच्चे बीमार

9 जुलाई आंध्र प्रदेश के अनंतपुरम जिले में एक बच्चे की मौत जबकि 30 अन्य बीमार


10 जुलाई कर्नाटक के याडगीर में 120 बीमार

12 जुलाई तमिलनाडु के कुड्डालोर में 60 बीमार


16 जुलाई बिहार के सारण में 23 छात्रों की मौत

18 जुलाई तमिलनाडु के नेवेली में 170 छात्राएं बीमार पड़ीं


24 नवंबर, 2012 ओडिशा के गंजाम जिले में 30 बच्चे बीमार हुए

21 जूने तमिलनाडु के सलेम जिले में सरकारी मिडिल स्कूल के 119 बच्चे बीमार


मिड डे मील स्कीम

शुरुआत: पिछली सदी के सातवें दशक से तमिलनाडु में चलाई जा रही मिड डे मील योजना बेहद सफल रही। इसी तर्ज पर 15 अगस्त, 1995 से केंद्र सरकार ने 2408 ब्लॉकों में एक योजना की शुरुआत की। इस योजना के तहत बच्चों को ड्राई राशन (गेहूं, दाल, चावल इत्यादि) दिए जाते थे। 1997-98 तक इस स्कीम को विस्तारित रूप देते हुए सभी ब्लॉकों को शामिल किया गया।


सुप्रीम कोर्ट का फैसला: पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम केंद्र सरकार मामले में आदेश देते हुए देश की शीर्ष अदालत ने 28 नवंबर, 2001 को कहा ‘प्रत्येक सरकारी और सरकारी सहायता से चलाए जाने वाले स्कूलों में सभी बच्चों को मध्याह्न (दोपहर) का भोजन मुहैया कराने के लिए मिड डे मील स्कीम लागू की जाए। इसके तहत कम से कम 200 दिनों के लिए प्रतिदिन न्यूनतम 300 कैलोरी और 8-12 ग्र्राम प्रोटीन की सभी बच्चों को खुराक मिलनी चाहिए’


विस्तार: अप्रैल, 2002 में इस योजना को सभी सरकारी, सरकार द्वारा सहायता प्राप्त स्कूलों तक बढ़ाया गया। अब इन स्कूलों में बच्चों को तैयार भोजन मिलने लगा।


पोषण में वृद्धि: सितंबर, 2006 में तैयार भोजन के पोषकता के मानकों में वृद्धि की गई। प्राथमिक कक्षाओं (एक से पांचवीं तक) के सभी बच्चों को दी जाने वाली खुराक के लिए 450 कैलोरी और 12 ग्र्राम प्रोटीन के मानक सुनिश्चित किए गए।


दायरा: अप्रैल, 2008 में इस योजना को और विस्तार दिया गया। अब सर्व शिक्षा अभियान के दायरे में आने वाले सभी स्कूलों और मदरसों जैसे शिक्षा केंद्रों के बच्चों को भी इसमें शामिल किया गया। 2011-12 तक इस योजना से 24 लाख खाना बनाने वाले और मदद करने वाले लोग जुड़े। इनमें से अधिकांश महिलाएं जुड़ीं। स्कूलों में करीब छह लाख किचन और स्टोर बनाए गए।


मील का मेन्यू

तत्व मात्रा (प्रतिदिन ग्र्राम में)

प्राथमिक     उच्च प्राथमिक

खाद्यान्न      100      150

दालें   20        30

सब्जियां      50        75

तेल व वसा   5          7.5

नमक और मसाले, जरूरत के अनुसार


प्रक्रिया: केंद्र सरकार सभी राज्य सरकारों को एफसीआइ के माध्यम से खाद्यान्न की नि:शुल्क आपूर्ति करती है। भोजन में शामिल होने वाली अन्य चीजों मसलन दालें, सब्जियां और तेल व वसा की लागत कुकिंग (भोजन बनाने) लागत में शामिल होती है। यह लागत प्रति बच्चे के हिसाब से प्राथमिक स्तर के लिए 3.11 रुपये और उच्च प्राथमिक के लिए 4.65 रुपये निर्धारित है।


परदेस में प्रावधान

अमेरिका : 1946 में राष्ट्रीय लंच स्कूल कार्यक्रम की शुरुआत हुई। वास्तव में इसका मकसद किसानों को लाभ पहुंचाना था क्योंकि अतिरिक्त अनाज को खपाने के लिए और समाज को सुविधा पहुंचाने के लिए संबंधित कानून बनाया गया। बाद में इसका उद्देश्य बच्चों में पोषण स्तर को सुधारना हो गया। अब राष्ट्रीय स्कूल लंच कार्यक्रम संघीय पोषण सहायता कार्यक्रम है। यह कृषि मंत्रालय के अधीन है। वर्तमान में यह संतुलित, पोषक और कम खर्च या मुफ्त में हर रोज करीब 3.1 करोड़ अमेरिकी बच्चों को भोजन उपलब्ध करा रहा है। समय के साथ कार्यक्रम में विस्तार हुआ है। अब इसमें स्कूल नाश्ता कार्यक्रम और स्नैक कार्यक्रम को भी शामिल किया गया है। स्कूल लंच कार्यक्रम अमेरिकी डायटरी गाइडलाइन को लागू करना अनिवार्य है। उसने मानक भी तय किए हैं। उनका सख्ती से पालन अनिवार्य है।


ब्रिटेन : 1944 में स्थानीय प्रशासन को स्कूल डिनर की अनिवार्य व्यवस्था सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया। निम्न आय वर्ग परिवार से ताल्लुक रखने वाले बच्चों को मुफ्त में भोजन उपलब्ध कराया गया। धीरे-धीरे यह स्कीम राष्ट्रीय जनमानस का हिस्सा हो गई। नवें दशक में मार्गरेट थैचर की सरकार ने मुफ्त भोजन की व्यवस्था समाप्त कर दी। हजारों बच्चे इससे वंचित हो गए। भोजन मुहैया कराने वाले स्थानीय प्रशासन को भी नियमों में ढील दी गई। इससे उनके बजट में तो कमी आई लेकिन खाने की गुणवत्ता में गिरावट हुई। धीरे-धीरे यह मुद्दा गर्माता रहा और जनता फंड को बढ़ाने की मांग की। लिहाजा सरकार ने स्कूल फूड ट्रस्ट बनाया।


फिनलैंड : 1948 से ही राष्ट्रव्यापी स्तर पर प्राथमिक और सेकेंडरी स्कूलों में मुफ्त स्कूल डिनर मिल रहा है। उच्च शिक्षण में भी रियायती लंच मिलता है।


फ्रांस : लंच को पूरे दिन का सबसे महत्वपूर्ण भोजन माना जाता है। 1971 में स्कूल लंच के लिए नए दिशा-निर्देश जारी हुए। इसके तहत खाने के साथ सलाद, दूध का भी प्रावधान किया गया। खाने के मेन्यू को अभिभावकों के पास भी रोज भेजा जाता है।


जापान : 99 प्रतिशत प्राथमिक स्कूलों और 82 प्रतिशत जूनियर हाई स्कूलों में स्कूल लंच दिया जा रहा है। अभिभावकों से इसकी फीस अलग से ली जाती है लेकिन श्रम खर्च स्थानीय प्रशासन वहन करता है। 20वीं सदी की शुरुआत में यह परंपरा शुरू हुई। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अकाल की कगार पर खड़े देश के शहरी क्षेत्र में फिर से इस कार्यक्रम को शुरू किया गया। 1952 से राष्ट्रव्यापी स्तर पर इसको शुरू किया गया। मेन्यू को प्रमुख डायटीशियन से बनवाया जाता है।


21 जुलाई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘यहां सेवाभावना से बनता-बंटता है मिड डे मील’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


21 जुलाई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘जहर की खुराक’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.



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