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अब सधे कदम की दरकार

Posted On: 8 Jul, 2013 में

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अब सधे कदम की दरकार

-डॉ दाताराम पुरोहित

(प्रोफेसर, गढ़वाल विश्वविद्यालय, हिमालयी सरोकारों के चिंतक)


उत्तराखंड की आपदा के बाद हमें ऐसी रणनीति अपनानी होगी जिससे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण किया जा सके। दूसरा यहां के लोगों के बीच जकड़ गई असुरक्षा की भावना को दूर करना है। महज तीन दिनों की भारी बारिश के चलते पूरे क्षेत्र की सड़क, टै्रक रूट, बिजली के खंबे बह गए। चार मंजिला मकान तक डूब गए। अगले तीन वर्षों तक के लिए हिमालयी चार धाम और हेमकुंठ साहिब की यात्रा पर ग्रहण लग गया है।


भयावह त्रासदी के चलते चार धाम से उत्पन्न होने वाला रोजगार भी खत्म हो गया। गढ़वाल की 10 लाख आबादी रोजगार के लिए इस पर निर्भर है। तीर्थयात्रियों की आवाजाही बंद होने से उनके सामने रोजी-रोटी के लाले पड़ जाएंगे। इसके अलावा आधारभूत संरचनाओं की खस्ता हालत और नागरिक सुविधाओं की कमी ने स्थिति को बदतर कर दिया है। स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत सबसे खराब है। लिहाजा बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए रिटायर्ड लोगों को देहरादून में बसना पड़ रहा है। इसके चलते स्वास्थ्य सुविधाओं और सड़क संपर्क की चाहत में पहले से खाली हो रहे गांव अब और खाली हो जाएंगे।


ऐसे में सरकार को हिमाचल प्रदेश की तरह एग्रो आधारित बिजनेस को वरीयता देनी चाहिए। उत्तराचंल राज्य आधारभूत और औद्योगिक विकास कारपोरेशन के रोजगार कामचलाऊ ही हैं। हमको ऐसी रणनीति अपनानी होगी ताकि कृषि, बागवानी, पशुपालन और मेडिकल प्लांट में रोजगार उत्पन्न हो सके।


मार्ग के विकल्प: चार धाम यात्रा को खतरा मुक्त बनाने के विकल्प


1 वैकल्पिक मोटर रोड का निर्माण किया जाये। इससे यदि बाढ़ या आपदा के कारण एक मार्ग अवरुद्ध, बंद या बह जाये तो संचार और तीर्थयात्रियों की हिफाजत के लिए वैकल्पिक मार्ग का सहारा लिया जाये।


2 वैकल्पिक अश्व मार्ग या पगडंडी का निर्माण किया जाना चाहिए। यदि चौमासी-केदारनाथ और तोसी-रामबाड़ा ट्रैक बाढ़ के दौरान काम कर रहे होते तो सुविधा होती। यही बात गंगोत्री, यमुनोत्री और बदरीनाथ पर भी लागू होती है। बदरीनाथ से हजारों श्रद्धालुओं को हेलीकॉप्टर की मदद से ही हटाया जा सका क्योंकि पुराना ट्रैक मार्ग काम नहीं कर रहा था

3 1970 की बाढ़ में अलकनंदा पर बने सभी पुल बह गए थे। इसके बावजूद जब नए पुलों का निर्माण किया गया तो पुल की ऊंचाई नहीं बढ़ाई गई


4 बरसात के दिनों के लिए भोजन और ईंधन का भंडारण किया जाना चाहिए ताकि आपदा के समय इन जरूरी चीजों के लिए संकट उत्पन्न न हो

5 स्थानीय कृषि को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि लोग भोजन, सब्जी और फलों की आपूर्ति के लिए हल्द्वानी, कोटद्वार और ऋषिकेश की मंडियों पर निर्भर न रहें।

……………….


बसाने और बचाने की जरूरत

-राजेंद्र सिंह

(मैगसेसे विजेता, जल पुरुष)


हिमालय की हरियाली राष्ट्रीय शुभ है। सभी छोटे नाले-खालों में मिट्टी रोकने के उपायों को अपनाएं। बांध के बजाय सूर्य और वायु से बिजली पाने के उपाय अपनाएं। सूर्य और हवा से रिश्ते बनाएं।

हमने पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी को पहाड़ में रोकने के नारे बीसवीं सदी के आठवें दशक में सुनने शुरू किए थे। मैदान पहाड़ को लूटता है, पहाड़ के पसीने से मैदान मालामाल बन रहा है। अब तो पहाड़ी ही पहाड़ के राजा हैं, लेकिन अब पहाड़ ज्यादा लुट रहा है। पहाड़ का पानी और जवानी सभी चीजें नीचे ज्यादा मात्रा में आ रहे हैं। सपने बदले, लोग बदले या उत्तराखंड राज्य चलाने वाले बदले हैं?


देवभूमि भारतीय समाज में सबसे अधिक सम्माननीय है। उसी सम्मान को एक बार फिर से बनाने और बचाने की जरूरत है। उत्तराखंड को राष्ट्रीय शुभ की चाह बनानी होगी। ऐसा होगा तो हिमालय को बुखार नहीं चढ़ेगा, आपदा नहीं आएगी। लेकिन, इसके लिए जरूरी है कि सरकार के साथ ही समाज जाग्रत हो। नदियों की भूमि बहाव के लिए ही रहने दी जाएं। नदी की भूमि में बसावट व होटल बनाकर उसका मार्ग न रोका जाए।


तीर्थ और पर्यटन में भेद जरूरी

तीर्थयात्री सरकार से ज्यादा सुविधा नहीं चाहता, इसलिए सरकार तीर्थयात्रियों से कमाई की अपेक्षा न करे। उन्हें सम्मान और संरक्षण प्रदान करे। तीर्थयात्रियों को सुविधा देने के नाम पर हिमालय की हरियाली कतई नष्ट नहीं की जानी चाहिए। सरकार को तीर्थ और पर्यटन में भेद कर हिमालय प्रबंधन करना होगा।


मदद का हकदार

आपदा में बहुत नुकसान हुआ है। ऐसे में आध्यात्मिक सुख, संतोष, समृद्धि देने वाले हिमालय को हम दिल खोलकर सम्मानजनक दक्षिणा दें। हिमालय में बसा उत्तराखंड देशभर से दक्षिणा पाने का सच्चा पात्र है। दक्षिणा के सदुपयोग का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।


पुनर्निर्माण में एहतियात जरूरी

=नदी किनारे बसावट पर रोक लगे

=संवेदनशील जगहों की पहचान हो

=पहाड़ों में सड़क बनाने के बाद मलबा नदी व गदेरे में न छोड़ा जाय

=टनल आधारित बिजली परियोजना व बड़े बांधों की नीति बदलने की जरूरत

=नदियों के उद्गम से 50-100 किमी तक का क्षेत्र इको सेंसटिव घोषित हो


पुनर्वास और गंगा बेसिन प्राधिकरण

=नदियों की भूमि को संरक्षित घोषित करें व इस भूमि में परिवर्तन का अधिकार किसी भी पंचायत, नगर पालिका व राज्य सरकार को ना हो

=आर्थिक मदद का उपयोग प्रकृति के संरक्षण, प्रभावितों ने पुनर्वास व युवाओं के रोजगार प्रदान करने में हो

=नदी-घाटियों में 200 मीटर तक हरी पट्टी स्थापित किया जाना सुनिश्चित हो


7 जुलाई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘सृजन का संकल्‍प‘ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


7 जुलाई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘बरकरार रहे भरोसा’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Benon के द्वारा
July 12, 2016

You’ve imsprseed us all with that posting!

Katherine के द्वारा
July 12, 2016

In order to gain competitive advantage ortnnizagioas should adopt social media marketing currently as well as in the foreseeable future. Online marketing is without a doubt evolving every single day. Organizations must always develop their marketing strategy frequently, creating adjustments since general trends adjust throughout the world wide web. Why social media for business


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