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दिखावे में पिट रही भद

Posted On: 17 May, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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इंदिरा गांधी का दौर आते-आते कार्यपालिका विधायिका पर हावी होने लगी। संसद में हंगामे का एक बड़ा कारण यह है कि सरकार संसद को गंभीरता से लेने के लिए तैयार नहीं है।संसद में जिस तरह विचार-विमर्श की बजाय हंगामा ज्यादा होने लगा है, उसके लिए लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया के कारण अलग पृष्ठभूमि के सांसदों के प्रवेश को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। इसके लिए कुछ प्रमुख कारण जिम्मेदार हैं। पहला,  कार्यपालिका द्वारा संसद के उपेक्षा की बढ़ती प्रवृत्ति। नेहरू युग में जहां प्रधानमंत्री संसद में होने वाली बहसों को पूरी गंभीरता से लेते थे, वहीं इंदिरा गांधी का दौर आते-आते कार्यपालिका विधायिका पर हावी होने लगी। अभी भी संसद में होने वाले हंगामे का एक बड़ा कारण यह है कि सरकार संसद को गंभीरता से लेने के लिए तैयार नहीं है। दूसरा, विपक्ष में भी बहस द्वारा सरकार को घेरने की प्रवृत्ति कम हुई है।


मसलन, विपक्ष में अब ऐसे बहुत कम नेता हैं, जो डॉ राममनोहर लोहिया या मधु दंडवते की तरह अपनी बहस और आंकड़ों द्वारा सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दें। अमूमन इसकी जगह संसद की कार्रवाई रोककर सरकार को झुकाने की कोशिश की जाती है। जो कुछ असाधारण मौकों पर बेहतर रणनीति हो सकती है, लेकिन हर मौके पर यह कारगर नहीं हो सकती है।  तीसरा, यह भी सच है कि राजनीति के अपराधीकरण ने भी संसद के काम के स्तर को प्रभावित किया है। संसद में बहुत से अपराधिक पृष्ठभूमि के सांसद भी हैं। ये लोकतंत्रीकरण और हाशिए के समूहों के उभार की बजाय राजनीति में पैसे और बंदूक के बढ़ते जोर के कारण संसद में पहुंचे हैं। अमूमन संसद की कार्यवाही की गरिमा के अनुसार काम करने की बजाय ऐसे सांसद कई मर्तबा छोटी बातों पर भी जबर्दस्त हंगामा करते हैं।


संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए सबसे बड़ी जरूरत यही है कि कार्यपालिका अहंकार से भरा व्यवहार करने की बजाय विपक्ष और संसद को पूरी गंभीरता से लें। विपक्ष के लिए भी यह आवश्यक है कि वे हर मुद्दे पर संसद ठप्प न करें। उन्हें सिर्फ अपवाद के रूप में ही ऐसा करना चाहिए। संसद में बहस द्वारा सरकार को घेरकर ज्यादा अच्छी तरह से उसका पर्दाफाश किया जा सकता है। इसके अलावा, मेरे विचार से दो स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है। पहला, सांसदों को संसदीय कार्रवाई के बारे में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। यानी सांसदों को यह पता होना चाहिए कि संसदीय प्रणाली में संसद के भीतर उन्हें किस गंभीरता से अपनी भूमिका निभानी है। दूसरा, दागी उम्मीदवारों के संसद में प्रवेश पर और ज्यादा सख्ती से रोक लगाने की आवश्कता है।


दरअसल, संसदीय लोकतंत्र तभी सुचारू रूप से काम कर सकता है जब संसद अपनी भूमिका बेहतर तरीके से निभाए। यदि कार्यपालिका संसद को गंभीरता से नहीं लेती, संसद का अधिकांश समय हंगामों की भेट चढ़ जाता है और संसद में जनता के मुद्दों पर चर्चा की बजाय आपसी छींटाकशी ही होती है, तो यह समझ लेना चाहिए कि यह संसदीय लोकतंत्र के लिए खतरे का समय है।

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विरोधाभास

हमारे माननीयों की कथनी और करनी में अंतर साफ दिखता है। अलग-अलग मंचों पर राजनीतिक शुचिता, आचरण, नैतिकता और मर्यादा, जवाबदेही जैसी बातों की वकालत करने वाले राजनेता जब खुद इन पर अमल करते नहीं दिखते हैं तो आमजन का हृदय कचोटता है। दु:ख और गुस्से का समवेत भाव उसके चेहरे पर झलकता है। इसका इजहार वह भले ही न कर सके लेकिन उसकी अंतरात्मा खुद उसे ही धिक्कारती है कि अपने लिए कैसा जनप्रतिनिधि चुना है? जरूरी विधायी कामों को निबटाने के लिए संसद का सदन चलता है, लेकिन हंगामे के चलते न केवल ये लोग संसद और सदन की गरिमा और मर्यादा को तार-तार करते दिखते हैं बल्कि अहम बिलों के लटकने से कई क्षेत्र व्यापक स्तर पर नकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं। सदन के दौरान इनके आचार, विचार और व्यवहार का ही यह नतीजा है कि 15वीं लोकसभा ऐतिहासिक रूप से अब तक की सबसे कम कामकाज करने वाली लोकसभा के रास्ते पर आगे बढ़ रही है। 15वीं लोकसभा अपने बजट सत्र यानी 13वें सत्र तक कुल 1252 घंटे बैठी है। प्रति वर्ष लोकसभा के बैठने का औसत लगातार गिर रहा है। वर्तमान में यह औसत 75 तक पहुंच गया है जबकि अमेरिकी प्रतिनिधि हर साल औसतन 130 दिन बैठक करती है।

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इनकी कथनी

2012 में 13 मई को संसद के साठ साल पूरे हुए थे। इस मौके पर आयोजित संसद के विशेष सत्र में एक प्रस्ताव पारित करके सांसदों से ऐसे आचरण की अपेक्षा की गई थी जिससे सदन की गरिमा और मर्यादा को बनाए रखा जा सके। सत्र के दौरान हमारे प्रमुख दलों के शीर्ष नेताओं ने संसदीय परंपरा, मर्यादा और इसके गौरवशाली इतिहास पर काफी लंबे चौड़े बयान दिए थे। चुनिंदा लोगों के बयानों पर एक नजर:


संसद की कार्यवाही में बार-बार व्यवधान उत्पन्न करने, स्थगन और शोर-शराबा से इस संस्थान को लेकर बाहर संदेह उत्पन्न होने लगा है  -मनमोहन सिंह


संसद की गरिमा और स्वायत्तता की रक्षा हर की कीमत पर होनी चाहिए। इसके साथ कोई समझौता नहीं हो सकता है। लेकिन हमारा व्यवहार भी उच्च नैतिक मानदंडों से निर्धारित होना चाहिए  -सोनिया गांधी


संसद में गतिरोध खत्म करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। कुछ सदस्यों की वजह से पूरी कार्यवाही स्थगित होती है। विधेयक लटक जाते हैं  -प्रणब मुखर्जी


विभिन्न मतों को आदर देने से भारतीय लोकतंत्र सफलता का एक मुकाम हासिल कर सका है। अगर संसद सदस्य एक दूसरे के विचारों का आदर करें तो हर समस्या का समाधान निकाला जा सकता है -लालकृष्ण आडवाणी


लोकतंत्र को और बेहतर करने के लिए हमें और ज्यादा लोकतांत्रिक होना पड़ेगा। संसद में महिलाओं को पर्याप्त हिस्सेदारी मिलनी ही चाहिए -सुषमा स्वराज


लोकतंत्र की मर्यादा को बनाए रखने की जिम्मेदारी संसद की है। लेकिन संसदीय प्रणाली के ऊपर कोई नहीं हो सकता। लोकपाल के नाम पर हमारे ऊपर किसी को नहीं बिठाया जा सकता    -लालू प्रसाद यादव


अगर देश में 80 फीसद लोग गरीब और पिछड़े बने रहेंगे तो न लोकतंत्र और न ही संसद का विकास हो सकता है -शरद यादव


संसदीय प्रणाली को लेकर लोगों में बढ़ती निराशा गंभीर चिंता का कारण है। संसद को जनता की अपेक्षा पर खरा उतरना होगा -अरुण जेटली


यह ऐसा पड़ाव है जहां से पीछे मुड़कर भी देखा जाता है और आगे की ओर भी। यह हमारे आत्मावलोकन का समय है। आने वाली चुनौतियों के आकलन का समय है।   -मीरा कुमार


महात्मा गांधी के स्वप्न को पूरा करने का संकल्प लेने का समय है यह। अभी भी किसानों में आत्महत्या और भुखमरी को दूर करना एक बड़ी समस्या है -मुलायम सिंह यादव


12मई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘गरिमा में गिरावट के गुनहगार’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.

12मई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘दिखावे में पिट रही भद‘ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


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