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हरकत को हल्के में न लें

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India and China: भारत-चीन

हमारी तुष्टिकरण नीति के चलते चीन हमें भूमि और सागर दोनों तरफ से घेरने की वृहत रणनीति पर काम कर रहा है। 15 अप्रैल से ही उत्तरी लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) क्षेत्र में चीनी सेनाओं की मौजूदगी के रूप में चीन को महत्वपूर्ण सफलता मिली है। भारतीय जमीन के 19 किमी भीतर बिना किसी प्रतिरोध के वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को खींचने से रणनीतिक रूप से उसने हमारे राजनीतिक नेतृत्व पर जबरदस्त मनोवैज्ञानिक दबाव डाला है।


यह बिना कोई बंदूक चलाए विरोधी की इच्छाशक्ति को तोड़ने के बराबर है, जोकि चीन 1962 के युद्ध में नहीं कर पाया। चीन के लिए अगर तिब्बत ‘मूल चिंता’ का विषय है और वह उसमें किसी बाहरी हस्तक्षेप को कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता, उसी तरह सीमा का मुद्दा भारत के लिए ‘मूल मसला’ है जो दुर्भाग्य से कुचला जा रहा है।


ऑपरेशनल स्तर पर चीन की इस हरकत ने सियाचिन ग्लेशियर को बेहद अस्थिर कर दिया है और वहां अब भारत के सामने दूसरा मोर्चा खुल गया है। सियाचिन ग्लेशियर के पूर्वी छोर पर चीन एलएसी का सम्मान नहीं कर रहा है और इसके पश्चिम छोर को पाकिस्तान नो-मैंस लैंड मानता है। लिहाजा ग्लेशियर पर वे अपनी सुविधानुसार करीब चार हजार भारतीय सैनिकों की रसद पानी की सप्लाई को जब चाहे काट सकते हैं। यह महज संयोग नहीं है कि पाकिस्तान के साथ मैप प्वाइंट एनजे 9842 को नियंत्रण रेखा (एलओसी) मानने पर बनी सहमति के बावजूद वह उसके पूर्वी छोर पर कराकोरम पास तक को इसकी जद में समझने लगा है। चीनी सेनाओं ने जहां अपने तंबू गाड़े हैं वहां से यह स्थान महज 30 किमी उत्तर में स्थित है। व्यापक अर्थों में उत्तरी लद्दाख पर भारतीय दावा कमजोर होगा और लद्दाख की राजधानी लेह पर सैन्य खतरा बढ़ेगा। सामरिक रूप से एलएसी पर तैनात भारतीय सेनाओं का भी इससे मनोबल टूटता है। उच्च स्तर पर नेतृत्व में इच्छाशक्ति के अभाव में वे हीनभावना से ग्रसित हो सकते हैं।


इस तरह की गंभीर स्थिति में अब तक सबसे लंबे समय तक रक्षा मंत्री रहने वाले एके एंटनी ने यह कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया है कि इस परिस्थिति के लिए भारत जिम्मेदार नहीं है। निश्चित रूप से यदि भारत सैन्य रूप से सक्षम होता तो चीन इस तरह की बेशर्म हरकत नहीं करता। यह एक खुला रहस्य है कि भारतीय सेना और वायुसेना चीन की सैन्य चुनौती का किसी भी तरह मुकाबला करने के लिए तैयार नहीं हैं और इसके लिए एंटनी जिम्मेदार हैं। यह उनका दायित्व था कि लद्दाख में समग्र सैन्य चुनौती आंकते हुए उसके राजनीतिक निहितार्थ समझते हुए दोनों रक्षा सेवाओं को वहां संयुक्त ऑपरेशन सुनिश्चित कराना चाहिए था। इसके साथ ही चीन और पाकिस्तान का सामना करने के लिए वहां उनको जरूरी सहायता और गोला-बारूद भी उपलब्ध कराना चाहिए था।


इस उभरती बुनियादी हकीकत को समझने के लिए माथापच्ची करने की जरूरत नहीं है। 2008 से ही भारतीय क्षेत्र में चीनी घुसपैठ लगातार बढ़ती जा रही है और वे स्थानीय प्रशासन और आधारभूत ढांचे के निर्माण को रोकने के लिए  खुलेआम धमकाते रहते हैं। पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल वीके सिंह ने 2011 में कहा था कि पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में करीब 3500-4000 सैनिक मौजूद हैं। इस गंभीर तथ्य को बीजिंग नकारता रहा है। दिल्ली ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी और जम्मू-कश्मीर में स्थित सेना की उत्तरी कमान ने नजरअंदाज किया है। दिसंबर, 2010 में एकतरफा तरीके से विवाद सीमा को सिकोड़कर आधा कर दिया गया।


भारत जिसको 4,056 किमी समझता रहा है, चीन ने उसको घटाकर 2000 किमी कर दिया। इसके जरिये चीन ने यह जताने का प्रयास किया कि लद्दाख में भारत के साथ उसकी कोई सीमा रेखा नहीं है और परिभाषा के अनुसार एलएसी सेना द्वारा खींची गई रेखा है जो किसी भी पक्ष की इच्छानुसार बदल सकती है। उसी का नतीजा है कि चीनियों ने डीबीओ में तंबू गाड़ दिए हैं। ऐसी स्थिति में भारत को क्या करना चाहिए? भारत के पास कोई सैन्य विकल्प नहीं है। जैसे को तैसा की भावना के तहत यदि चीनी क्षेत्र में भारतीय सेना तंबू गाड़े तो दिल्ली के लिए उसके भयावह परिणाम हो सकते हैं। इसलिए युद्ध की बात छोड़ देने में ही भलाई है क्योंकि यह भी अनिश्चित है कि क्या चीन को भारत के खिलाफ युद्ध करने की जरूरत भी पड़ेगी? उसकी सफल साइबर क्षमता और उपग्रह-रोधी क्षमताएं भारत के सैन्य संचार उपग्रहों को ध्वस्त कर सकती हैं। उसकी सटीक मार करने वाली परंपरागत बैलिस्टिक मिसाइलें भारतीय सेना पर भारी हैं। ऐसे में भारत के पास एकमात्र सम्मानजनक विकल्प यह है कि उसके समक्ष घुटने टेकने से इन्कार करते हुए विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की प्रस्तावित चीन यात्रा पर पुनर्विचार करना चाहिए। उसके साथ सैन्य और व्यापारिक संबंधों पर भी मंथन की जरूरत है। इस वक्त चीन के समक्ष झुकने से उसको और पाकिस्तान को भविष्य में नई परेशानियां खड़ी करने के लिए बल मिलेगा।

……………….


वार्ता से ही मिलेगा रास्ता

सीमा विवाद का जल्द समाधान दोनों देशों के बुनियादी हित में है और इसको रणनीतिक उद्देश्य के रूप में देखना चाहिए।दोनों देशों के बीच लगातार व्यापक, विस्तृत और गहरे होते संबंधों के बीच ऐतिहासिक रूप से जटिल और राजनीतिक रूप से समस्याग्रस्त सीमा विवाद रहा है। सुपरिभाषित सीमा रेखा की तलाश में ये दोनों प्राचीन सभ्यताएं 1962 में संक्षिप्त सीमा संघर्ष कर चुकी हैं। युद्ध के बाद के वर्षों की परिस्थितियों को यदि शीत युद्ध नहीं कहा जाए तो उनको शीत शांति की श्रेणी में रखा जा सकता है। 1976 में राजदूत स्तर के संबंध स्थापित हुए। नवें दशक की शुरुआत में दोनों देश प्रत्यक्ष रूप से अपनी स्थितियों की पहचान और उनको स्पष्ट करने में व्यस्त रहे। वही बाद में बातचीत की आधारशिला भी बनी। इसके बावजूद दोनों देश किसी ठोस प्रस्ताव के निकट नहीं पहुंच सके। 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा में संयुक्त सचिव स्तर पर द्विपक्षीय बातचीत के लिए ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप (जेडब्ल्यूजी) की स्थापना हुई। चीनी पक्ष  पूरी सीमा रेखा पर ‘पैकेज डील’ के लिए दबाव डालता रहा जबकि भारत ‘सेक्टर दर सेक्टर’ बातचीत के पक्ष में रहा। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इसने संबंधों की दिशा बदली। नतीजतन दोनों देशों ने सीमा के मुद्दे को पीछे करते हुए अन्य क्षेत्रों में संबंधों को फोकस करने पर बल दिया।


1993 और 1996 में दोनों देशों के बीच दो महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। पहला, सीमा क्षेत्र में शांति और सौहार्द बहाली से संबंधित था और दूसरा, एलएसी पर सेना के बीच विश्वास बहाली (सीबीएम) से संबंधित था। मई, 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण ने थोड़े समय के लिए सीमा बातचीत पर विपरीत असर डाला और रिश्तों में गिरावट आई। एक साल बाद ही औपचारिक तौर से फिर से बातचीत पटरी पर लौट सकी।


2003 में संबंधों में महत्वपूर्ण बदलाव तब आए जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीनी यात्रा के दौरान दोनों तरफ से ‘विशेष प्रतिनिधि’ नियुक्त किए गए। उनका मकसद ‘द्विपक्षीय संबंधों के आधार पर राजनीतिक परिप्रेक्ष्य की खोज और सीमा विवाद सुलझाने के लिए फ्रेमवर्क तय करना था।’ इसके चलते  2005 में चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की यात्रा के दौरान राजनीतिक पैरामीटर और भारत-चीन सीमा मुद्दे के निपटारे के लिए निर्देशक सिद्धांतों पर एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए। उस अवसर पर संयुक्त बयान में कहा गया, ‘सीमा विवाद का जल्द समाधान दोनों देशों के बुनियादी हित में है और इसको रणनीतिक उद्देश्य के रूप में देखना चाहिए।’



उसके तत्काल बाद सीमा विवाद के जल्द समाधान के लिए जबरदस्त आशा का माहौल बना लेकिन करीब आठ साल गुजरने के बाद भी अभी तक कोई नतीजा नहीं निकल सका। आज के ही जैसे माहौल में दिसंबर, 2010 में चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने भारत की यात्रा की थी। उसका नतीजा यह निकला कि दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच हॉटलाइन सक्रिय करने का निर्णय लिया गया। इसके साथ ही घुसपैठ की समस्या के निपटारे के लिए प्रत्यक्ष और तत्काल सलाह-मशविरे के लिए संयुक्त सचिव स्तर का तंत्र दोनों देशों के बीच विकसित किया गया। सैन्य और रणनीतिक बातचीत बहाली की गई। दोनों देशों के बीच नियमित रूप से संयुक्त सैन्य युद्धाभ्यास का भी निर्णय लिया गया। यद्यपि आर्थिक रिश्तों में जबरदस्त तरक्की हुई है। चीन अब भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है। दोनों के बहुत से ऐसे समान हित हैं जिनको वैश्विक स्तर पर ये साझा करते हैं। एक स्थिर और सकारात्मक भारत-चीन संबंध दोनों देशों के अलावा भविष्य में एशिया के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसे दोनों देशों के शीर्ष स्तर पर भी माना गया है। इस लिहाज से दोनों देशों को स्पष्ट रूप से सीमा मुद्दे के अलावा अपनी सामरिक और सुरक्षा चिंताओं पर विचार-विमर्श करना चाहिए। इसके साथ ही वास्तविक आकलन के आधार पर संभावित ‘लेन-देन’ (गिव एंड टेक) करना चाहिए ताकि नए समाधानों का मार्ग प्रशस्त हो सके।


5मई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘हौवा नहीं है पड़ोसी देश’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.

5मई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘चीन की चालाकी’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


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