blogid : 4582 postid : 2667

मर्ज का मर्म

Posted On: 1 May, 2013 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

समाज

एक परिकल्पना कीजिए। अगर समाज के दोनों पहिए महिलाओं और पुरुषों की वर्तमान स्थिति एक दूसरे के विपरीत होती। यानी जिस स्थिति, हैसियत, ओहदे, पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, मौजूदगी, भागीदारी और अन्य चीजों पर पुरुषों का वर्चस्व है, उस पर अगर महिलाएं सत्तासीन होतीं और पुरुष महिलाओं की स्थिति में होते।… तो क्या होता? सोचिए…कुछ नहीं तो 16 दिसंबर को दिल्ली में हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना तो कम से कम नहीं ही हो पाती। इसका प्रमुख कारण यह दिया जा सकता है कि उक्त काल्पनिक स्थिति में उस बस में कम से कम आधे से अधिक महिला स्टाफ होतीं। संभवतया मामले के मुख्य आरोपी राम सिंह की जगह उस बस को कोई महिला चला रही होती।


संस्कार

ऐसा लगता है कि इस कल्पना को मूर्त रूप न मिल पाने की वजह से ही दुष्कर्म की भयावह घटनाओं पर रोक नहीं लग पा रही है। एक तो समाज में उनकी संख्या कम होती जा रही है। कुलदीपक की चाहत ने भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में उन्हें जन्म लेने से पहले ही मार दिया जा रहा है। कई राज्यों में घटते लिंगानुपात ने भयावह स्थिति खड़ी कर दी है। कुंवारे ही अधेड़ की उम्र पार कर रहे हैं। शादी के लिए लड़कियों की कमी हो चली है। ऐसी स्थिति में क्या इन ‘कुंवारों’ से संयम बरतने की अपेक्षा किसी कानून के माध्यम से संभव है? समाज में महिलाओं की भागीदारी आज भी नगण्य है। सरकारी क्षेत्र हो या निजी क्षेत्रों की नौकरियों में इनकी उपस्थिति आज भी प्रभावित नहीं कर पा रही है। राजनीति में एक तिहाई सीटों के आरक्षण मसले पर हमारे माननीय आज भी राजनीति कर रहे हैं।


सवाल

समाज में महिलाओं के खिलाफ भेदभाव को उनकी आयु के हर स्तर पर देखा जा सकता है। अपवाद हो सकते हैं लेकिन अधिकांश मामलों में खान-पान, रहन-सहन, शिक्षा-दीक्षा आदि से लेकर जीवन की अहम जरूरतों में लड़कों को लड़कियों पर वरीयता प्राप्त है। समाजशास्त्री महिलाओं के खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा की वजहों में से एक देश में आंतरिक पलायन की बढ़ती प्रवृत्ति को भी देख रहे हैं। महीनों अपने घर परिवार से दूर रह रहे लोगों द्वारा इन कृत्यों को अंजाम देने की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे में केवल सख्त कानून से ही नहीं, समाज में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को खत्म किए बिना, उनके प्रति लोगों में संस्कार और सम्मान का बीज रोपे बिना महिलाओं के खिलाफ हिंसा को खत्म कर पाना असंभव सा दिखता है। आज समाज में महिला पुरुष के बीच तादात्म्य स्थापित कर एक आदर्श समाज की परिकल्पना को फलीभूत करना हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।

…………………….


पितृसत्तात्मक सोच में बदलाव जरूरी


सरकारी नीतियों, विधानों और सेवाओं में सुधार के जरिये लैंगिक अपराधों के खिलाफ हम सख्त कदम उठा सकते हैं। हमारे यहां कन्या के जन्म को लक्ष्मी (समृद्धि की देवी) के आगमन के रूप में देखने की मान्यता रही है किंतु पितृसत्तात्मक मानसिकता की जड़ें इतनी गहरी हैं कि सम्मान देने के बजाय वे हाशिये पर हैं। पुरानी प्रथाओं और परंपराओं में पुरुषों की सर्वोच्चता को बताकर महिलाओं के मानव अधिकार का हनन करने के अलावा उनके साथ भेदभाव किया गया है। उनको स्वास्थ्य, शिक्षा, आवागमन और यहां तक कि रोजगार के अवसरों से दूर रखा गया है।


महिलाओं के खिलाफ अपराधों में बढ़ोतरी पितृसत्तात्मक मानसिकता के प्रकटीकरण का ही एक रूप है। लिंग चयनात्मक गर्भपात, दहेज, ऑनर किलिंग, बलात्कार, घरेलू हिंसा और मानव तस्करी जैसे कई रूपों में यह हिंसा महिलाओं के खिलाफ देखने को मिलती है। यहां तक कि लड़के की चाहत और दहेज के भय के चलते गर्भ में ही लड़की के अस्तित्व का संघर्ष शुरू हो जाता है। 2011 में प्रसव पूर्व लिंग चयन पर प्रतिष्ठित जर्नल ‘द लैंसट’ के एक अध्ययन के मुताबिक पिछले तीन दशक में गर्भपात की वजह से करीब 1.2 करोड़ बालिकाएं जन्म नहीं ले सकी। नतीजतन देश भर में पुरुषों की तुलना में महिलाओं के घटते अनुपात की वजह से बलात्कार और मानव तस्करी की घटनाएं बढ़ रही हैं। दिल्ली में बलात्कार केसों में बढ़ोतरी तो महज एक बानगी है। बालिकाओं को बलात्कार और बाल विवाह का खतरा रहता है। विवाह के बाद दहेज उनके खिलाफ हिंसा यहां तक कि हत्या की वजह हो सकता है। यदि वह इन सबसे बच गई तो विधवा होने की दशा में भी उसके साथ भेदभाव होता है और संपत्ति या विरासत में उसको कोई हिस्सा नहीं मिलता।


महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा के संदर्भ में सबसे चिंताजनक पहलू उन अपराधों को प्राप्त उच्च स्तर की सामाजिक स्वीकृति है। एक सरकारी सर्वे के मुताबिक 51 प्रतिशत भारतीय पुरुष और 54 प्रतिशत महिलाएं पत्नियों के पीटे जाने को जायज ठहराते हैं जबकि दिल्ली और पूरे देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा के रूप में लोगों की वे प्रतिक्रियाएं होती हैं जिनमें महिलाओं की पसंद के कपड़ों और उनके भड़काऊ अनैतिक व्यवहार को दोष दिया जाता है।हमको बढ़ते जेंडर आधारित अपराधों की पहचान करने की जरूरत है भले ही उनमें हिंसा का सहारा नहीं लिया गया हो। सरकारी नीतियों, विधानों और सेवाओं में सुधार के जरिये इसके खिलाफ हम सख्त कदम उठा सकते हैं। लिंग आधारित हिंसा और लैंगिक असंतुलन में पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ ऐसे कदम उठाए जाने की जरूरत है जिससे इसकी भूमिका पर कुठाराघात पहुंचे। इसके साथ हीलैंगिक समानता की भावना के विकासकी भी जरूरत है। शैक्षिक सुधार इस मुहिम में एक महत्वपूर्ण कड़ी हो सकते हैं। शिक्षा ही पुरातन सोच में बदलाव का जरिया बनकर लैंगिक समानता स्थापित करने में केंद्रीय भूमिका निभा सकती है। महिलाओं के खिलाफ इस तरह के पूर्वाग्रहों और भेदभावों से उबरने के बाद ही देश में वास्तविक लोकतांत्रिक समाज को स्थापित किया जा सकेगा। एक ऐसे समाज में जहां एक बार फिर लड़की के जन्म को लक्ष्मी, प्रसन्नता और हर्ष के रूप में देखे जाने के लिए अभी बहुत काम किया जाना जरूरी है।


Tags: Women Empowerment, Women Empowerment In India, Women Rights In India, Rape Cases, Rape Cases in india, Delhi Rape Case News, Women and Indian Society, महिला, समाज, नारी, नारी और समाज, बलात्कार, दुष्कर्म, यौन शिक्षा



Tags:                             

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran