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उचित यौन शिक्षा से ही मिलेगा निदान

Posted On: 1 May, 2013 में

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हाल के दिनों में समाज के भीतर दुष्कर्म की बढ़ती वारदातों से हर कोई चिंतित है। सामाजिक ताने-बाने को तहस नहस करने वाली इन घटनाओं को यौन कुंठा से ग्र्रसित लोगों द्वारा अंजाम दिए जाने की बात सिरे से खारिज नहीं की जा सकती है। यौन कुंठा से होने वाले अपराधों का निदान उचित यौन शिक्षा से ही निकाला जा सकता है। यह बात विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अब कहनी शुरू की है, जबकि भारत में 1600 साल पहले कामसूत्र के लेखक ऋषि वात्स्यायन यह बात कह गए हैं। वात्स्यायन के अनुसार यह शिक्षा प्राग यौवने अर्थात यौवन काल शुरू होने से ठीक पहले यानी किशोरावस्था में दी जानी चाहिए। पहले यौवन काल की शुरुआत 16 से 18 वर्ष की उम्र में होती थी। लेकिन अब संचार माध्यमों से मिल रही जानकारियों एवं खुलेपन के माहौल के कारण यौवन काल 11-12 वर्ष की उम्र से ही शुरू हो जाता है। इसलिए उचित तरीके से यौन शिक्षा इस उम्र से पहले ही बच्चों को दी जानी चाहिए। इसकी शुरुआत परिवार में माता-पिता से ही होनी चाहिए। जब बच्चों को सही उम्र में अच्छे-बुरे की जानकारी दे दी जाएगी तो वह कुंठा के शिकार नहीं होंगे। यौन शिक्षा की बात आते ही एक वर्ग द्वारा इसका विरोध होने लगता है। वास्तव में यौन शिक्षा का अर्थ ऐसा आचरण सिखाने से है, जिसका अभ्यस्त होकर व्यक्ति भविष्य में संतुलित व्यवहार कर सके।


कुछ लोगों में मानसिक बीमारी अथवा आनुवांशिक कारणों से भी विपरीत लिंग के प्रति ज्यादा आकर्षण पैदा होने लगता है। कुछ लोगों में बच्चों को देखकर यौन उत्तेजना जागृत होने लगती है। कुछ लोगों में यह भ्रम होता है कि कम उम्र की कुंवारी लड़कियों या लड़कों से संबंध बनाने से उन्हें यौन रोगों से छुटकारा मिल सकता है। ऐसी सोच लोगों में पुरुष हार्मोन की अधिकता के कारण पैदा होती है। देखा जाता है कि 75 फीसद लोग ऐसे अपराध करते हुए बार-बार पकड़े जाते हैैं। ऐसे लोगों को स्त्री हार्मोन बढ़ाने वाली दवाएं देकर ठीक किया जा सकता है। हर व्यक्ति के जीवन में कुछ वक्त ऐसा आता है, जब उसके लिए अपनी कामेच्छा पर काबू पाना मुश्किल या नामुमकिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में मानसिक उद्वेग को शांत करने के कई स्वीकृत तरीके हैं। अॉब्सेसिव कंपलसिव डिसॉर्डर एवं सीजोफ्रेनिया जैसे मानसिक विकारों से पीड़ित को इलाज द्वारा आसानी से ठीक किया जा सकता है।

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पलायन का पहलू

देश की सीमारेखा के भीतर पलायन जोरों पर है। असंतुलित क्षेत्रीय विकास इसकी प्रमुख वजह है। कहीं पर विकास की नई इबारत लिखी जा रही है तो कहीं दाने-दाने को लोग मोहताज दिखते हैं। लिहाजा रोजी रोटी और रोजगार की तलाश में लोगों को अपना घर-परिवार छोड़कर पलायन करना पड़ता है। कई विशेषज्ञ घर परिवार से दूर इस तरह के पलायन को भी महिलाओं के खिलाफ अपराधों की वजह मानते हैं।बड़ा तबका: पलायन करने वालों की संख्या कुल आबादी का 28.5 फीसद (32.60 करोड़) है।


देश में आंतरिक पलायन दो तरह का है। पहला है दीर्घकालिक पलायन। इसमें लोग एक जगह से पलायन करके दूसरी जगह बस जाते हैं। दूसरे प्रकार के पलायन में अंशकालिक या मौसमी या थोड़े-थोड़े समय अंतराल पर लोग स्नोत स्थान से गंतव्य तक की आवाजाही करते रहते हैं। इनकी संख्या 1.5 करोड़ से लेकर 10 करोड़ तक आंकी गई है। इस वर्ग के लोग सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े हुए होते हैं। इनका शैक्षिक स्तर भी निम्न होता है। सीमित संपत्ति के साथ संसाधनों की घोर कमी होती है। ग्र्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में पुरुषों के पलायन की बड़ी वजह रोजगार संबंधी जरूरतें हैं। ग्र्रामीण क्षेत्रों से 29 फीसद और शहरी क्षेत्रों से 56 फीसद पुरुषों के पलायन की यही मुख्य वजह है।


स्नोत स्थान

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, उत्तराखंड और तमिलनाडु


गंतव्य स्थान

दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, पंजाब और कर्नाटक


रोजगार के क्षेत्र

निर्माण, घरेलू कार्य, टेक्सटाइल्स, ईंट भट्टे, यातायात, खनन, पत्थर कटाई और कृषि


बेलगाम अपराध

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि सभी तरह के संज्ञेय अपराधों में पिछले साठ साल के दौरान बेतहाशा वृद्धि हुई है। सख्त कानून यहां तक कि मौत की सजा के प्रावधान वाले अपराधों में भी दोगुनी तीन गुनी वृद्धि दर्ज की जा चुकी है। चौंकाने वाली बात यह है कि बढ़ोतरी के मामले में दुष्कर्म शीर्ष पर है। पिछले 40 साल के दौरान इसके मामलों में करीब 900 फीसद वृद्धि हुई है।

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Voncile के द्वारा
July 12, 2016

Þegar þú segir að hann hafi verið farinn að exnipemerta með eiturlyf á fimmta áratugnum þá skilst mér að það hafa verið á árabilinu 1940-50. Er það rétt skilið?


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