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कानून नहीं, लगता है माननीय हो चुके हैं अंधे

Posted On: 24 Apr, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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नेताओं को दोषियों के बजाय उनका दर्द महसूस करना होगा जिनके प्रियजन आतंकवाद की भेंट चढ़ गये। आजकल कुछ लोग कानून के सर्वोपरि होने की सर्वमान्य धारणा को चुनौती देते दिख रहे हैं। वे अदालत का फैसला मानने को तैयार नहीं है। दोषियों को सजा नहीं देना चाहते बल्कि धर्म, जाति, वर्ग और संप्रदाय की राजनीति चमकाने के लिए जघन्य अपराधियों के साथ खड़े दिखाई देते हैं। यह शायद एकमात्र ऐसा देश होगा जहां मुख्यमंत्री और पूर्व प्रधानमंत्री को बम से उड़ाने वालों की माफी के लिए राजनीतिक स्तर पर मुहिम चलती है।  दहशतगर्दों की फांसी माफ करने के लिए विधानसभाओं में प्रस्ताव पेश किया जाता है। अब तो बात यहां तक पहुंच गई हैं कि आतंकियों की हिमायत में मुख्यमंत्री स्वयं राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से मिल रहे हैं। कौन कहता है कि कानून अंधा है कानून ने तो अपने तराजू पर तोलकर न्याय कर दिया और अपराधी को मौत की सजा सुना दी। अंधे तो ये नेता हैं जिन्हें न्याय नहीं सिर्फ राजनीति दिखाई देती है।


सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी उन नेताओं और और कानूनविदों के मुंह पर तमाचा है जो आतंकवादियों के मानवाधिकारों की दुहाई देते हैं। भुल्लर की माफी की अपील ठुकराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- ‘ये कैसा विरोधाभास है कि जो दूसरों पर तनिक भी रहम नहीं दिखाते वे अपने लिए दया की भीख मांग रहे हैं और बहुत से लोग मानवाधिकार का हौवा दिखाकर जघन्य हत्या में शामिल इन आतंकवादियों का समर्थन करते हैं।’ इस टिप्पणी के गहरे मायने हैं। कोर्ट ने आतंकवाद की गंभीरता और आतंकवादियों की मंशा पर कड़ी टिप्पणियों के साथ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए दूसरी बार भुल्लर की फांसी पर मुहर लगा दी। लेकिन शायद राजनेता अपनी जिम्मेदारी नहीं समझ पा रहे हैं।


इस फैसले के ठीक बाद पंजाब के मुख्यमंत्री भुल्लर की फांसी माफी के लिए दूसरी दयायाचिका लेकर राष्ट्रपति के पास पहुंचे, प्रधानमंत्री से भी मिले। ऐसा ही उन्होंने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह राजोआना की फांसी रुकवाने के लिए भी किया था। वे अकेले राजनेता नहीं है जो दोषियों की हिमायत करते दिखते हों। राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी माफ कराने के लिए तमिलनाडु में भी ऐसी ही मुहिम चल रही है वहां दोषियों को माफी के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पेश होता है। अभी हाल में भुल्लर पर फैसला आने के बाद ही प्रमुख राजनीतिक दल द्रमुक के अध्यक्ष बयान देते हैं कि राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी माफ होनी चाहिए। उधर कश्मीर विधानसभा संसद हमले के दोषी अफजल गुरु के दर्द में उबलती है। पहले उसकी फांसी माफी के लिए उबल रही थी और फांसी के बाद फांसी दिये जाने के विरोध में। धर्म, जाति संप्रदाय और वर्ग की इस राजनीति का नुकसान यह होता है कि आतंकवादियों को सजा देने में देरी होती है और उन्हें कानून से डर लगना बंद हो जाता है। हालांकि ये राजनीतिक मुहिमें कभी सिरे नहीं चढ़ीं। केंद्र सरकार या राष्ट्रपति ने इन्हें तरजीह नहीं दी। लेकिन इसी का असर था कि कसाब और अफजल को गोपनीय ढंग से फांसी देनी पड़ी।

………………


आतंक की आग

किसी आतंकवादी घटना के फलस्वरूप हुए जान-माल की क्षति उस आतंकी हमले का तात्कालिक असर होता है। यह उसके दीर्घकालीन असर की तुलना में आंशिक होता है। कोई भी आतंकी घटना अपना असर लंबे समय के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में करती है। लोगों में अवसाद घर कर जाता है। सामाजिक वैमनस्य बढ़ता है। राजनीतिक असर के रूप में नियम कानून कठोर किए जाने से विभिन्न देशों के बीच रिश्तों पर असर पड़ते हैं।


अप्रत्यक्ष असर

उपभोक्ताओं और कंपनियों के भविष्य की अपेक्षाओं को कुंद करते हैं आतंकी हमले सरकारों और निजी क्षेत्र को सुरक्षा उपायों पर भारी निवेश के लिए विवश करते हैं। इससे अंतत: संस्थाओं की कार्यकुशलता पर नकारात्मक असर पड़ता है किसी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले लोगों (उपभोक्ताओं, निवेशकों और कारोबारियों) की सोच और रुचि में बदलाव दिख सकता है। लोग आतंक से प्रभावित किसी खास स्थान या किसी खास भौगोलिक क्षेत्र (जैसे विमानन, पर्यटन आदि) से जुड़ने से परहेज करने पर विवश हो जाते हैं। व्यापक भूराजनीतिक संघर्ष की शुरुआत की वजह बन सकते हैं। इससे आर्थिक अवरोध अधिक गहराता है।


केस स्टडी 9/11 हमला

मानव सभ्यता के आधुनिक इतिहास में अमेरिका के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर 9 सितंबर 2001 को हुआ आतंकी हमला सबसे बड़ा, विनाशकारी और सर्वाधिक योजनाबद्ध था। आतंक के असर का आकलन करने के लिए कई विशेषज्ञ इसे अपनी केस स्टडी बना चुके हैं।


नुकसान

तात्कालिक: 11 सितंबर आतंकी को हुए हमले में भौतिक पूंजी के रूप में 15.5 अरब डॉलर की क्षति हुई। व्यापक आर्थिक असर के रूप में अमेरिकी कंज्यूमर कांफिडेंस इंडेक्स अगस्त, 2011 में 114 अंकों से गिरकर सितंबर में 97.6 और अक्टूबर में 85.5 पर पहुंच गया।  सितंबर की तुलना में अक्टूबर के दौरान बेरोजगारी दर में 0.6 फीसद का इजाफा दिखा। पर्यटन से जुड़े क्षेत्रों में साठ हजार नौकरियों का नुकसान हुआ। अनिश्चितता की स्थिति ने कई कारोबार में नई नौकरियों के सृजन और निवेश को रोक दिया। समग्र्र उत्पादकता पर असर दिखा। विमानन, बीमा, बैंकिंग और यात्रा जैसे क्षेत्रों में कारोबार करने के लिए सुरक्षा के मद में एक और लागत बढ़ी। कई कंपनियों को अतिरिक्त सतर्कता के चलते अपनी सूचना प्रणाली और डाटा को सुरक्षित रखने के एवज में अधिक खर्च करना पड़ा। कारोबार में अनुत्पादक खर्चों का बोझ बढ़ा।


दीर्घकालिक: पहले से ही मंदी की चपेट में चल रहे अमेरिका की स्थिति को गहराने में इस हमले ने अहम भूमिका निभाई। चूंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक बड़ी हिस्सेदारी अमेरिका निभाता है लिहाजा इस असर से वैश्विक अर्थव्यवस्था भी अछूती नहीं रही।  9/11 के बाद रक्षा बजट में वृद्धि ने अमेरिकी वित्तीय संकट में इजाफा किया।


क्षेत्रवार असर

विमानन: घटना से पूर्व तेजी से वृद्धि कर रहे इस क्षेत्र को 2001 में 4 अरब डॉलर की केंद्रीय मदद के बावजूद 7.7 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा। अमेरिका की तीन सबसे बड़ी विमानन कंपनियां (यूएस एअरलाइंस, यूनाइटेड और डेल्टा) को दिवालिया घोषित करना पड़ा। दुनिया की विमानन कंपनियों पर भी इसका असर दिखा। 2010 में 10.7 अरब डॉलर का मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को 2001 में 11.8 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा। इस घटना के तीन साल बाद पहली बार दुनिया के उड्डयन क्षेत्र को मुनाफे का स्वाद लगा।


बीमा क्षेत्र: 9/11 की घटना में कुल बीमित नुकसान 35.6 अरब डॉलर हुआ था। हमले के बाद बीमा कंपनियों के प्रीमियम बढ़ गए। अधिकांश कंपनियों ने अपने स्टैंडर्ड कमर्शियल कवरेज से आतंकवाद को हटाकर इसके लिए विशेष प्रीमियम वसूलना शुरू किया। आंतरिक सुरक्षा: इस घटना के बाद आंतरिक सुरक्षा को लेकर एक नया उद्योग तैयार हो गया। रसायनिक, जैविक और रेडियोधर्मिता की पहचान और सुरक्षा के उपकरणों की मांग बढ़ी। सुरक्षा और पहचान संबंधी यंत्रों ने लोगों की गोपनीयता और सुविधा को दुश्वर करने का काम किया। अमेरिकी सरकार ने इनकी जमकर खरीद की। 2000 में इस मद में उसका बजट 20 अरब डॉलर से बढ़कर 2003 में 40 अरब डॉलर पहुंच गया। 2006 में एंटी टेरर प्रोटेक्शन पर वैश्विक खर्च करीब 59 अरब डॉलर था जो छह साल पहले की तुलना में छह गुना अधिक था। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2015 तक इस मद में वैश्विक खर्च में तीन गुना से अधिक का इजाफा हो सकता है।


रक्षा: इसके बाद अमेरिकी रक्षा खर्च में हर साल सात फीसद से अधिक का इजाफा होता आया है। पेट्रोलियम: आतंकी हमलों या विश्व को प्रभावित करने वाली किसी भी घटना के चलते वैश्विक पेट्रोलियम कीमतें तेजी से उठती गिरती हैं। पर्यटन: हमलों के बाद इस क्षेत्र को काफी नुकसान पहुंचा। यहां रोजगार को तेज धक्का लगा। अक्टूबर-नवंबर, 2001 में अमेरिकी होटलों में रोजगार में तीन फीसद (58 हजार कर्मचारी) गिरावट दर्ज हुई।


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21अप्रैल  को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘दो धमाके दो चिंताएं’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


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