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थोड़ा है थोड़े की जरूरत

Posted On: 9 Apr, 2013 में

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प्रदेश में मृत्यु दर घट कर 38 रह गई है जबकि शिशु लिंग अनुपात बढ़कर पिछले साल की तुलना में 906 से 914 तक पहुंच गया है। यहां संस्थागत प्रसव की दर भी अब 71 से बढ़कर 76 प्रतिशत हो गई है जबकि प्रजनन दर घटकर 1.9 व जन्म दर घट कर 16.9 है। यहां की स्वास्थ्य संबंधी अधोसंरचना भी राष्ट्रीय औसत की तुलना में कहीं बेहतर है। घर-द्वार तक व समाज के हर वर्ग को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करवाने के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना में बीपीएल परिवारों को इलाज के लिए आर्थिक मदद का प्रावधान है।

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बहुत करना बाकी

दस साल पहले के मुकाबले सूबे में कुपोषण में 3 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। पांच साल तक के बच्चों में तो इसका प्रतिशत अभी करीब 80 है। बार-बार की घोषणाओं के बावजूद अब तक एक भी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अस्तित्व में नहीं आ सका है, जबकि प्रदेश के सभी 534 प्रखंडों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी नहीं है। हर जिला अस्पताल को 300 बेड के अस्पताल में अपग्रेड करना अभी सपना ही बना है। 15-49 वर्ष की 68.2 प्रतिशत महिलाएं कुपोषण की शिकार हैं। 1998 में यह प्रतिशत 60 का था। डॉक्टरों के 8700 पद सृजित हैं, जबकि एनआरएचएम के तहत 16,000 डाक्टरों की जरूरत है। लेकिन उपलब्धता मात्र 4,000 चिकित्सकों की है।

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पुरानी से नहीं छूटा पीछा नई की दोहरी मार


वक्त के संग बीमारियां भी बदल रही हैं। कभी हम मलेरिया और टीबी जैसी बीमारियों से ही डरते थे। मगर अब ज्यादा बड़ा खतरा उनका है, जिन्हें अमीरों की बीमारियां कह कर हम नकारते रहे। देखते ही देखते इन्होंने ऐसा दबोचा कि अब हम दुनिया में मधुमेह की राजधानी बन गए हैं। ऊपर से हृदय रोगों और कैंसर में भी यह तमगा हमें मिलने जा रहा है। हालात यह है कि वर्ष 2030 तक इन गैर संक्रामक बीमारियों पर देश को 12.5 लाख करोड़ रुपए खर्च करने होंगे। यह रकम भारत की सालाना आय से भी ज्यादा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन  सात साल पहले ही बता चुका है कि देश में आधी से ज्यादा असमय मौतों का कारण ये बीमारियां ही हो गई हैं। और हां, इसके शिकारों में अमीर और गरीब बराबरी से शामिल हैं।


पिछले तीन-चार साल से देश के स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद भी इस मामले पर पूरी व्यथा के साथ बात करते दिखाई देते हैं। उनकी पहल पर वर्ष 2010 में केंद्र सरकार ने ‘कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग और लकवा से बचाव और नियंत्रण का राष्ट्रीय कार्यक्रम’ शुरू भी किया। इसके तहत पहले चरण में शामिल किए गए सभी सौ जिलों में कैंसर मरीजों के लिए कीमोथेरेपी सुविधा, हृदय रोग के इलाज के लिए अलग चिकित्सा इकाई (सीसीयू) और एक गैर संक्रामकरोग (एनसीडी) सेंटर शुरू करना था।


मगर स्वास्थ्य मंत्रालय के कागजातों की पड़ताल से पता चलता है कि इतनी देर से शुरू हुई सरकार की सीमित कोशिश भी भारी लापरवाही का शिकार है। अब तक महज 62 जिलों में एनसीडी सेंटर खुले और सिर्फ 39 जिलों में सीसीयू शुरू हुए। कीमोथेरेपी तो सिर्फ चार जिलों में ही शुरू हो सकी है। इसी तरह 700 की बजाय सिर्फ 50 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को इसमें शामिल किया जा सका है। इस योजना केतहत तीस से ज्यादा उम्र के सभी लोगों की मधुमेह और रक्तचाप की जांच भी करनी थी। पहले चरण में सौ जिलों के सात करोड़ लोगों की यह जांच बीते साल में ही पूरी हो जानी थी। मगर सरकारी सुस्ती का आलम यह है कि अब तक महज 1.7 करोड़ लोगों की जांच की जा सकी है।


ऐसे में सरकार को तंत्र की सुस्ती तोड़ने के साथ ही इस कार्यक्रम की प्राथमिकता भी बदलने की जरूरत है। इस समय सरकार सीमित ही सही इलाज उपलब्ध करवाने पर जोर दे रही है। जबकि भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में बचाव पर ज्यादा जोर देना जरूरी है। लोगों को जीवन शैली में सुधार की जरूरत और तंबाकू उत्पादों और शराब के खतरों के बारे में जागरूक करना होगा। संसाधनों की सीमा को देखते हुए इस कार्यक्रम में योग व आयुर्वेद के उपायों का अधिकतम उपयोग भी ज्यादा प्रभावी होगा।


7 अप्रैल  को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘मरीजों के बोझ से हांफ रहे अस्पताल‘ पढ़ने के लिए क्लिक करें.

7 अप्रैल  को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘सवाल सेहत का’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


Tags: health tips, health condition in India, health system in India, health system research, health system, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, कुपोषण, स्वास्थ्य व्यवस्था



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Marty के द्वारा
July 12, 2016

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