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संस्कार से सम्मान

Posted On: 18 Mar, 2013 में

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डॉ अमिता (लखनऊ विश्वविद्यालय)

डॉ अमिता (लखनऊ विश्वविद्यालय)

सख्त कानून बनाकर शायद महिला अपराधों पर अंकुश लगाना संभव नहीं हो पाएगा। अधिकार देने या कानून बना देने मात्र से नहीं, बल्कि सोच और परिवेश में उचित बदलाव लाकर ही इसे वांछित दिशा दी जा सकती है। समाज में यदि नैतिकता व शिक्षा और अध्यात्म का विकास हो तभी नारी को सम्मान मिल सकता है। महिलाओं के प्रति दुराचरण करते समय किसी को कानून का भय नहीं होता है। अपराध पाश्विक प्रवृत्ति और उसके जुनून के चलते होता है। अपराध की कोई उम्र नहीं निर्धारित की जा सकती है। यह तो एक प्रवृत्ति है जो बुरे संस्कारों में पनपती है।


यदि दुष्कर्म विरोधी कानून बनाकर सहमति से संबंध बनाने की उम्र 18 साल से घटाकर 16 कर दी जाती है तो हमारे समाज के सामने कई सवाल खड़े हो सकते हैं। ङ्क्तक्या कानून यौन संबंधों को शादी से अलग देख रहा है? शादी की उम्र लड़कियों और लड़कों के लिए क्रमश: 18 और 21 वर्ष है? ङ्क्तक्या हमारा समाज इतना आधुनिक हो गया है कि 16 साल के किशोरों को यौन संबंध बनाने की छूट देने जा रहा है? ङ्क्तकहीं यह उम्र घटाकर हम बाल विवाह का समर्थन तो नहीं करने जा रहे हैं? ङ्क्तक्या वयस्क होने की आयु केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए होगी या फिर वोट देने का अधिकार, ड्राइविंग लाइसेंस लेने, वयस्क फिल्में देखने की आयु सीमा पर भी पड़ेगा? ङ्क्तक्या 16 वर्ष की आयु में (सहमति से ही सही) यौन संबंध बनाना उचित होगा? यह आयु उनके करियर और शिक्षा के लिहाज से अधिक महत्वपूर्ण है। ङ्क्तक्या दबाव डालकर उसकी सहमति दिखाकर अपराधी कानून के फंदे से बच नहीं जाएंगे?


ङ्क्तक्या 16 साल का युवा मन शादी, संबंध बनाना, करियर जैसे विशेष निर्णयों में स्वविवेक से उचित निर्णय लेने में सक्षम होगा! ङ्क्तक्या यह कानून मां-बाप की परवरिश पर एक कठोराघात नहीं साबित होगा? ङ्क्तशायद दुष्कर्म रोधी कानून में सहमति से संबंध बनाने की आयुसीमा कम करने से समस्या का समाधान होना मुमकिन नहीं। कहीं यह फैसला अनुचित और सामाजिक ताने बाने को तहस नहस करने वाला न साबित हो।

………….


सरकार

महिलाओं की हिफाजत के लिए सरकार द्वारा प्रस्तावित कानून और इसकी सख्ती विवादों में घिर गए हैं। इसकी कठोरता को दोधारी तलवार की तरह देखा जा रहा है। अंतहीन बहस बन चुके इस प्रस्ताव के कई प्रावधानों से समाज को होने वाले फायदे समझ से परे हैं।


समाज

यह प्रस्तावित कानून देश और दुनिया को झकझोर देने वाली दिल्ली में हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना के परिप्रेक्ष्य में लाया जा रहा है। इस घटना से आम जनमानस के उद्वेलित और आंदोलित होने के बावजूद दुष्कर्म की घटनाओं एवं महिलाओं के प्रति अपराधों में कोई कमी नहीं देखी जा रही है। ऊपर से इस तरह के प्रस्तावित सख्त कानून से समाज में विकार पैदा होने के अंदेशे अलग से खड़े हो गए हैं।


सुरक्षा

अनुभव बताते हैं कि केवल सख्त कानून से ही अपराधों पर अंकुश लगाने की कल्पना बेमानी है। इससे कहीं अधिक जरूरी है समाज के सोच में बदलाव लाना। अभी भी इसकी जरूरत समझी जा रही है कि महिलाओं के प्रति सम्मानजनक भावना के संस्कार ज्यादा से ज्यादा पोषित हों। ऐसे में महिलाओं के मान सम्मान और उनकी सुरक्षा को लेकर समाज में चेतना जाग्रत करना आज हम सबके सामने सबसे बड़ा मुद्दा है।


17  मार्च  को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘जटिल मनोविज्ञान है मसले का मर्म’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


17 मार्च को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘देश में प्रस्तावित विधेयक’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


Tags: rape cases, rape in delhi, anti rape law, anti rape ordinance, women empowerment in india, women condition in india, दुष्कर्म विरोधी कानून



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