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जटिल मनोविज्ञान है मसले का मर्म

Posted On: 18 Mar, 2013 में

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प्रो निमेष जी देसाई (निदेशक, मानव व्यवहार और संबद्ध संस्थान)

प्रो निमेष जी देसाई (निदेशक, मानव व्यवहार और संबद्ध संस्थान)

पश्चिमी संस्कृति में स्वायत्तता प्रधान समाज है। हमारे यहां सामूहिक विकास की श्रेष्ठ मान्यता रही है। पश्चिम के अंधानुकरण से इस मूल्य में बदलाव आ रहे हैं। यहां भी स्वायत्तता चाहने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। यही समस्या का मूल कारण है।


महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों के मनोविज्ञान को सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्ति विशेष स्तरों पर समझा जा सकता है। तेजी से बढ़ रहा आधुनिकीकरण, वैश्वीकरण, पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण हमारे समाज पर असर डाल रहा है। तकनीकी विकास इसमें आग में घी का काम कर रहा है। समाज में यह बदलाव उस तबके को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है जो नाजुक मोड़ या  नाजुक स्थिति में होते हैं। वहीं मानसिक रूप से मजबूत और अपेक्षाकृत ठीक ठाक माहौल वाले लोगों पर इसका असर नहीं पड़ पाता है, जबकि नाजुक लोगों के स्वभाव में यह असर परिलक्षित होने लगता है। जिसकी परिणति कभी कभी भयावह होती है। मानव समाज ऐतिहासिक मोड़  पर खड़ा है। कुछ हद तक मानव समाज हमेशा से हिंसक भी रहा है, हिंसक घटनाओं को देखने, सुनने के प्रति वह हमेशा लालायित रहा है। आज इस प्रवृत्ति में गुणात्मक वृद्धि देखी जा सकती है। पारिवारिक स्तर पर जो सरलता, जो समर्थन लोगों को पहले प्राप्त था, वह अब नहीं है। लिहाजा लोगों में इस स्तर पर संवाद या अभिव्यक्ति की कमी महसूस हो रही है। इसका नकारात्मक परिणाम उसके व्यक्तित्व पर पड़ रहा है।


व्यक्ति विशेष स्तर पर बॉयोलाजिकल और साइकोलॉजिकल दोनों कारक असर डाल रहे हैं। आनुवंशिक कारण से कुछ लोगों में हिंसक प्रवृत्ति जेनेटिक है। कुछ लोग जो बचपन से तिरस्कृत रहे हैं। यह कमी बड़े होने तक उन्हें सालती रहती है। यह उनके स्वभाव पर विपरीत असर डालती है।

महिलाओं के खिलाफ हिंसा के लिए सख्त कानून बहुत अच्छी बात है, लेकिन उसे लागू करने की प्रणाली और लोगों के बीच जागरुकता के पहलू पर भी विचार किए जाने की जरूरत है। पश्चिमी संस्कृति में स्वायत्तता प्रधान समाज है जबकि हमारे यहां यानी पूर्व में सामूहिक विकास को श्रेष्ठ माना जाता रहा है। वहां व्यक्ति विशेष अपना और सिर्फ अपने से मतलब रखता है यानी उसका हित और जरूरतें पूरी होती रहे जबकि पूर्वी मूल्यों में सामूहिक हित को सर्वोपरि स्थान प्राप्त था। अब जबकि पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण तेजी से जारी है तो यहां भी स्वायत्तता चाहने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। लेकिन उन्हें खासकर किशोरों को कैसे समझाया जाए कि उनकी स्वायत्तता वहीं तक सीमित है जहां से दूसरे की शुरू होती है।

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सभी स्तरों पर प्रयास की दरकार


महिलाओं के खिलाफ  अपराधों का ग्र्राफ बताता है कि कानून कारगर हथियार साबित नहीं हो रहे हैं। यूं भी यह एक स्थापित सत्य है कि कोई भी अपराध महज कानून का डर दिखाकर खत्म नहीं किया जा सकता। पर इसका मतलब यह भी नहीं निकाला जाना चाहिए कि मौजूदा कानूनों में उचित संशोधन या नए कानून बनाने की मांगों पर सार्थक बहस करना बेमानी है। वजह कानून समाज के कमजोर, पिछड़े वर्ग को एक अतिरिक्त वैधानिक संरक्षण प्रदान करते हैं। कानून तो अपराध रोकने के लिए पहला अनिवार्य व महत्वपूर्ण कदम है। महिला अपराधों पर काबू पाने के लिए कानून के साथ-साथ बहुस्तरीय प्रयास की भी दरकार है। यहां पर सरकारी नीयत में साफ  खोट नजर आती है। सरकारें राष्ट्रीय महिला संगठनों व अंतरराष्ट्रीय कंवेशन के दबाव में  कानून तो बना देती हैं मगर उन्हें लागू करने में जो सामाजिक व राजनीतिक प्रतिबद्वता चाहिए, उससे हमेशा पीछे हटती रही है।


कानून को अमली जामा पहनाने में पुलिस की नाजुक भूमिका एक खुला तथ्य है पर महिलाओं के खिलाफ अपराधों को हमारी पुलिस अक्सर जिस तरह डील करती है, वह खतरनाक है। कानून को कारगर बनाने वाली मशीनरी  की ही अगर जवाबदेही तय नहीं होगी तो कानून भी एक टांग वाला साबित होगा। कानून पर अमल सरकार का ऐसिड टेस्ट होता है। अमेरिका में महिलाओं के खिलाफ हिंसा कानून के सकारात्मक नतीजे देखने को मिले हैं। 1993-2010 की अवधि में किसी जान पहचान के व्यक्ति द्वारा महिला पर की जाने वाली हिंसा के मामलों में 67 प्रतिशत की कमी आई है। अब वहां पुलिस अधिक सक्रिय और सतर्क है। अपने मुल्क में नारी सशक्तिकरण का सरकारी मिजाज कानून को विकलांग बनाए रखने वाला ही है।

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माला दीक्षित (विशेष संवाददाता)

माला दीक्षित (विशेष संवाददाता)

प्रस्तावित कानून और उम्र के धोखे

अपराध रोकने के लिए जरूरत कानून बदलने की नहीं बल्कि सोच बदलने की है। अभी दुष्कर्म के अपराध में उम्रकैद, और हत्या में मौत की सजा है लेकिन क्या ये अपराध रुके। सरकार को महिलाओं के प्रति सामाजिक सोच बदलने के लिए प्रभावी अभियान चलाना चाहिए।


हमबिस्तर होने की उम्र हमसफर होने की उम्र से कम कैसे हो सकती है? शादी से पहले हनीमून को शायद भारतीय समाज औपचारिक रूप से पचा न पाए। कई देशों में यौन संबंध बनाने (सेक्स) की उम्र 16 है लेकिन शादी की शर्त अनिवार्य है। भारत में सरकार सहमति से संबंध बनाने की उम्रसीमा घटाने का कानून ला रही है लेकिन इस मसले पर कानूनन कई सवालों का जवाब मिलना बाकी है। साथ ही विरोधाभासों का समाधान भी जरूरी है।


सेक्स के लिए परिपक्व 16 साल के लड़के-लड़कियों को ड्राइविंग लाइसेंस, वोट डालने के लिए दो साल और इंतजार करना पड़ेगा क्योंकि बालिग होने की उम्र कानून में 18 साल है। कानून में समझदारी आने की तय उम्र में व्याप्त विरोधाभास इसे जटिल बना रहे हैं। महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली सुप्रीम कोर्ट की जानी मानी वकील कामिनी जायसवाल कहती हैं कि नए कानून से भ्रम बढ़ेगा। कानून में सभी जगह एक सी उम्र होनी चाहिए। अपराध रोकने के लिए जरूरत कानून बदलने की नहीं बल्कि सोच बदलने की है। सरकार को महिलाओं के प्रति सोच बदलने के लिए प्रभावी अभियान चलाना चाहिए।


प्रस्तावित कानून पीछा करने और घूरने को गैर जमानती अपराध की श्रेणी में लाता है। सुप्रीम कोर्ट की वकील प्रिया हिंगोरानी इसे महिलाओं के खिलाफ मानती हैं। उनका कहना है कि ये अपराध गैर जमानती नहीं होने चाहिए क्योंकि इससे लोग महिलाओं को नौकरी पर नहीं रखेंगे। उनके लिए अवसर कम होंगे। कानून के दुरुपयोग को रोकने और झूठी शिकायतों पर कार्रवाई के उपाय भी जरूरी हैं।


दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एसएन धींगरा क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट बिल 2013 में छोटे अपराधों-घूरने और पीछा करने को गैर जमानती बनाए जाने की परिणति पुलिस महकमें में भ्रष्टाचार बढ़ने के रूप में देखते हैं। वह कहते हैं कि ऐसा हुआ तो ये पुलिस के लिए नोट छापने की मशीन जैसा हो जाएगा। कहां से आएगा घूरने का सुबूत। पुलिस को इतनी ताकत देना विडंबना से कम नहीं होगा। अगर किसी ने गलत शिकायत की तो उसको सजा होगी क्या? हालांकि झूठे अभियोजन और मुआवजे का मुकदमा किया जा सकता है लेकिन उसमें कई साल लग सकते हैं। और ऐसी कानूनी लड़ाई बहुत कम लोग लड़ पाते हैं। संबंध बनाने की उम्र 16 करने को वे गलत नहीं मानते लेकिन दुष्कर्म के कानून में व्याप्त विरोधाभासों से वे सहमत हैं। वे कहते हैं कि लिव इन रिलेशन में रहने वाले पुरुष को घरेलू हिंसा कानून में पति का दर्जा प्राप्त है लेकिन जैसे ही महिला रिश्ते से बाहर आकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराती है कि उस शख्स ने शादी का वायदा कर संबंध बनाया था तो वही व्यक्ति कानून की नजर में बलात्कारी हो जाता है।


तीन दशक से अधिक सरकारी वकील रहे केडी भारद्वाज कानून में संशोधन कर सहमति की उम्र 16 करने के प्रबल समर्थक हैं। वह कहते हैं कि दुष्कर्म और अपहरण के काफी केस झूठे होते हैं। ज्यादातर संबंध सहमति से बनते हैं लेकिन पकड़े जाने पर वह दुष्कर्म बन जाता है। हालांकि वह कहते हैं कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में संशोधन करके आयु 18 से घटाकर 16 की जानी चाहिए। जैसाकि  2000 से पहले था।

आइपीसी की धारा 375 में शुरुआत से सहमति की उम्र 16 है। चाइल्ड प्रोटेक्शन एक्ट में इसे 18 किया गया था और फिर 16 करने की बात चल रही है।


17 मार्च  को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘संस्कार से सम्मान’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


17 मार्च  को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख ‘देश में प्रस्तावित विधेयक’ पढ़ने के लिए क्लिक करें.


Tags: rape cases, rape in delhi, anti rape law, anti rape ordinance, women empowerment in india, women condition in india, दुष्कर्म विरोधी कानून



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1 प्रतिक्रिया

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Kaycie के द्वारा
July 11, 2016

se me hace muy bien enoactrnr gente que quiera ensenar cosas tan bonitas como las figuras de porcelana fria gracias por tomarte el tiempo de ensenarme


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