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खतरा बाहर से नहीं भीतर से है

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अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन ने लिखा है, ‘भारत मानव जाति का अवलंब है, मानवीय आवाज की जन्मभूमि है, इतिहास की जननी है, महान गाथाओं की दादी है, परंपराओं की परदादी है। भारत सचमुच मानव इतिहास की सबसे मूल्यवान चीजों का खजाना है।’ इतना सब होते हुए भी भारत स्वयं को विदेशी आक्रांताओं से बचा नहीं पाया और अंतत: उसे दो शताब्दियों तक गुलाम रहना पड़ा। 1947 में आजाद होने के बाद हमने एक ऐसे गणतंत्र की नींव रखनी चाही जो टिकाऊ हो, जिसे कोई और पराई ताकत फिर से गुलाम न बना ले और जिसमें गण का महत्व सर्वोपरि हो।


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आजादी के बाद हमने उन तमाम बुराइयों से लड़ाई लड़ी, जिनकी वजह से हम गुलाम हुए थे। 1952 में जब पहली बार देश में आम चुनाव हुए थे और देश की आम जनता को वयस्क मताधिकार इस्तेमाल करने का मौका मिला था, तब इसे ‘इतिहास का सबसे बड़ा जुआ’ करार दिया गया था। किसी भी नव-स्वतंत्र देश में ऐसी परिपक्वता नहीं देखी गयी थी, लेकिन वही चुनाव भारतीय लोकतंत्र की मजबूत बुनियाद साबित हुआ। हमारे आस-पास लगभग 100 देश आजाद हुए थे। उनमें से चीन, दक्षिण कोरिया और इजरायल को छोड़ दें तो बाकी के देश लोकतांत्रिक दृष्टि से हमसे बहुत पीछे हैं। देखिए, गणतंत्र किसी एक की बपौती नहीं होती। यदि वह गण का तंत्र है तो उसे संभाल कर रखना भी गण का ही काम है। सरकारें तो आती-जाती रहती हैं। यदि गण ढाल बनकर खड़ा हो जाए तो ऐसे गणतंत्र को कोई ताकत पराजित नहीं कर सकती। महर्षि अरविन्द ने कहा था कि ‘भारत को खतरा बाहर से नहीं अपने भीतर से है.’ इस भीतरी खतरे के ही कारण हम गुलाम हुए और इसी वजह से हम आज वांछित  रफ्तार से तरक्की नहीं कर पा रहे हैं।  दरअसल गुलामी ने हमारी सोच को इतना कुंद बना दिया है कि हम हर कदम पर पर-निर्भर हो गए। अपने वर्तमान और भविष्य के बारे में फैसले लेने में भी हमें संकोच होता है और हम पश्चिम की ओर देखते हैं। हमारा ज्ञान, हमारा विज्ञान तब तक पुष्ट नहीं होता जब तक कि पश्चिम की मुहर नहीं लग जाती।


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इसके लिए कौन दोषी है? हमारे पड़ोस में आतंकवादी रहता है, हम पुलिस को नहीं बताते, हमारे सामने कोई दुर्घटना होती है, हम मदद के लिए आगे नहीं आते। हम भ्रष्टाचार से आहत रहते हैं लेकिन खुद की सुविधा के लिए रिश्वत देने में संकोच नहीं करते। हमने भ्रष्टाचार का जनतंत्रीकरण कर दिया है।  गुलामी ने हमें हर काम के लिए परमुखापेक्षी बना दिया है। पहले हम अपने गांव का रास्ता खुद बना लिया करते थे, अब उसके लिए सरकारी योजना की बाट जोहते रहते हैं। हम अपने राजनेताओं को कोसते रहते हैं लेकिन मतदान के वक्त  हमारे विवेक पर पर्दा पड़ जाता है और हमें अपनी जाति-बिरादरी, धर्म और जान-पहचान वाले में ही सब गुण नजर आते हैं। यानी जो कुछ इस गणतंत्र में स्याह है, उसके लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं। सच बात यह है कि हमें अभी स्वायत्त गण की तरह व्यवहार करना ही नहीं आया है। गणतंत्र ने हमें स्वाभिमान का दर्जा दिया है। इस गणतंत्र पर हम आत्मालोचन करें कि हमने इसे क्या दिया? परमुखापेक्षी होना स्वाभिमान का लक्षण नहीं है। इस गणतंत्र पर हम सचमुच स्वाभिमानी बनें, यही कामना है।


डॉ गोविंद सिंह, निदेशक, स्कूल ऑफ

ह्युमैनिटी, उत्तराखंड, मुक्त विश्वविद्यालय



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