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करारा जवाब ही है एक मात्र विकल्प

Posted On: 14 Jan, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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डॉ भरत वर्मा  (इंडियन डिफेंस रिव्यू के संपादक)

डॉ भरत वर्मा (इंडियन डिफेंस रिव्यू के संपादक)

भारत को अपने दुश्मनों से निपटने के लिए ढुलमुल और कमजोर विदेश नीति के बजाय सख्त एवं कारगर रणनीति पर तत्काल विचार की जरूरत है।

पिछले दिनों कश्मीर में हुई घटना के पीछे पाकिस्तान के दो खास मकसद हैं। पहला तो यह कि उसको लगता है कि कश्मीर का एजेंडा हाशिए पर जा रहा है। इसलिए उसको बरकरार रखने के लिए उस ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना होगा और कश्मीर एजेंडे को जिंदा रखना होगा। दूसरा, पाकिस्तान के भीतर अंदरूनी तौर पर अस्थिरता बढ़ रही है। अलगाव वादी ताकतें शक्तिशाली होती जा रही हैं। इससे देश के बिखराव का संकट पैदा हो गया है। तहरीक-ए-तालिबान जैसे आतंकवादी संगठन सेना की पकड़ से बाहर होते जा रहे हैं। लिहाजा पाकिस्तान सेना सीमा पर इस तरह की हरकत करके भारत को अपने खिलाफ उकसाने की कोशिश कर रही है। इससे पाकिस्तान में भारत विरोधी माहौल बनता है और देश में एकजुटता बढ़ती है। इसलिए आशंका है कि आने वाले दिनों में भी वह इस तरह की हरकतों से बाज नहीं आएगा।

कुछ दिन पहले पाकिस्तान से आया यह बयान भी महत्वपूर्ण है जिसमें उसने कहा था कि अब भारत उसका सबसे बड़ा दुश्मन नहीं है बल्कि अंदरूनी अलगाववादी ताकतों से निपटना उसकी सबसे बड़ी चुनौती है। अगर ऐसा नहीं है तो सवाल यह उठता है कि यदि उसके लिए भारत सबसे बड़ा खतरा नहीं है तो वह आतंकवादी कैंपों को क्यों चला रहा है? नकली नोटों की करेंसी का रैकेट क्यों चला रहा है? बार-बार संघर्ष विराम का उल्लंघन क्यों कर रहा है?

दरअसल इस तरह का बयान कई स्तरों पर हमारे साथ छद्म युद्ध कर रहे पाकिस्तान की एक रणनीति है। इसका मकसद भारत को मानसिक रूप से आश्वस्त करते हुए इसका ध्यान भटकाना है ताकि वह अपनी तैयारी करते रहें।

इस पूरे मसले पर सर्वप्रथम भारत को तात्कालिक रूप से करारा जवाब देना चाहिए और कार्रवाई कर सीमापार बंकरों और आतंकी शिविरों को ध्वस्त करना चाहिए। इसके लिए सेना को एलओसी पार करने की भी जरूरत नहीं है। हमारी सेना बेहतर पोजीशन में है और वह इस कार्रवाई के जरिए पाकिस्तान में घबराहट का माहौल पैदा कर सकती है। इससे उन पर दबाव बनेगा और दोबारा ऐसी नापाक हरकत करने से पहले वह सोचेगा।

इसके साथ ही हमको कैप्टन सौरभ कालिया समेत इन दो जवानों की शहादत और इस तरह की अन्य घटनाओं के निपटारे के लिए अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ऑफ जस्टिस का सहारा लेना चाहिए एवं वैश्विक स्तर पर इसके खिलाफ कूटनीतिक मुहिम चलाते रहना चाहिए।



Read: कब रुकेगा यह सिलसिला



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आखिर कब तक…..


पड़ोस


सभी चाहते हैं कि उनका पड़ोस खुशहाल, अमन पसंद हो। चूंकि पड़ोसी को चुना नहीं जा सकता, इसलिए पड़ोसी में बदलाव की हरसंभव कोशिश की जाती है। पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंधों की खातिर शुरू से ही हम अपना बहुत कुछ दाव पर लगा

चुके हैं, लेकिन पाकिस्तान है कि सुधरना चाहता ही नहीं।


पाकिस्तान


परोक्षे कार्य हंतारम्, प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्। वर्जयेत्ता दृशम् मित्रम् विष कुंभम् पयोमुखम्। यानी पीठ पीछे आपके काम में विघ्न डालने वाले और सामने मीठी-मीठी बातें करने वाले लोगों से दूर रहना चाहिए। ये उसी तरह से होते हैं जैसे जहर से लबालब किसी घड़े के ऊपर दूध से भरा प्याला रखा गया हो। शुरू से ही अपने पड़ोसी का आचार विचार और व्यवहार कुछ इसी तरीके का रहा है। हाल ही में पाकिस्तानी सेना द्वारा पुंछ में सीमा के अंदर घुसकर हमारे सैनिकों की बर्बर हत्या का मामला इसकी एक बानगी है। एक ओर दोनों सरकारों में उच्च स्तर पर संबंधों की बहाली को लेकर बातचीत हो रही है तो दूसरी तरफ सीमा पर पाकिस्तान की यह अमानवीय हरकत उसकी कलई खोलने के लिए काफी है।


पीड़ा


इतिहास गवाह है कि समय समय पर पाकिस्तान ऐसी हरकतों द्वारा हमारी पीठ में छुरा घोंपता रहता है। हैरत तो तब होती है जब घटना के वक्त हम (भारत) तिलमिलाते हैं और सख्त कदम उठाने और सब्र का पैमाना छलकने जैसे कुछ वीर रस से ओतप्रोत बयान जारी करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। कुछ समय बाद फिर हमें न जाने कौन सी मजबूरी घेरती है और हम पाकिस्तान से संबंध मधुर करने की पहल करना शुरू कर देते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम समुद्र द्वारा महज रास्ता न दिए जाने पर ही अपना धैर्य खो बैठे थे। ऐसे में ‘विनय न मानत जलधि जड़’ की तर्ज पर ही पाकिस्तान को जवाब देने का एक मात्र रास्ता शेष दिखता है, लेकिन यह भी सच है कि यह रास्ता युद्ध नहीं हो सकता। ऐसे में हम सभी के लिए यह सबसे बड़ा मुद्दा बन जाता है कि पाकिस्तान को सही रास्ते पर कैसे लाया जाए जिससे वह पुन: हमारी पीठ में छुरा घोंपने की हिमाकत न करे।



Read: दो संस्थान जुदा दास्तान

कहीं धूप तो कहीं छांव


Tag:पाकिस्तान, भारत, विदेश नीति, कैप्टन सौरभ कालिया,Pakistan,india, foreign policy



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