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सिर्फ बातों की सरकार

Posted On: 31 Dec, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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नीलू रंजन विशेष संवाददाता, दैनिक जागरण

नीलू रंजन विशेष संवाददाता, दैनिक जागरण

गैंग रेप के बाद पूरे देश में मचे हाहाकार के बाद गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे भले ही दिल्ली पुलिस में महिलाओं की भर्ती के लिए विशेष अभियान चलाने का दावा कर रहे हों, लेकिन सच्चाई यही हैकि पिछले छह दशक में विभिन्न आयोगों की रिपोर्टों के बावजूद सरकार पुलिस बल को महिलाओं के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। हालत यह है कि 1980 में पुलिस सुधार आयोग ने महिलाओं की संख्या बढ़ाने की सिफारिश की थी,लेकिन 30 साल बाद देश की राजधानी के सभी थानों में तैनाती के लिए महिला पुलिस अधिकारी तक नहीं हैं।


1861 में भारत में पुलिस कानून बनाने के लगभग 120 साल बाद पुलिस सुधार आयोग ने पुलिस को महिलाओं के प्रति संवेदनशील बनाने की जरूरत पर बल दिया। इसके तहत उनसे सब इंस्पेक्टर और इंस्पेक्टर स्तर पर महिलाओं की अधिक-से-अधिक नियुक्ति पर बल दिया। लेकिन पुलिस सुधार आयोग की इस रिपोर्ट पर अमल करने के बजाय उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इसके 25 साल बाद दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने 2005-06 में पुलिस सुधार की जरूरत बताते हुए महिलाओं के लिए 33 फीसद पद आरक्षित करने की सिफारिश की। पर गृह मंत्रालय को छह साल बाद 2012 में इन सिफारिशों का ख्याल आया। पिछले अगस्त में गृह मंत्रालय ने प्रशासनिक सुधार आयोग की 152 सिफारिशों को लागू करने पर राज्य सरकारों से उनकी राय मांगी। पर पांच महीने बीत जाने के बाद भी एक भी राज्य ने इस पर अपनी राय नहीं भेजी है। जाहिर है पुलिस सुधार और उसमें महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का एजेंडा गृह मंत्रालय और राज्य सरकारों की प्राथमिकता में कभी नहीं रहा।


पुलिस व प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्टों के अलावा पुलिस को महिलाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाने के लिए सोली सोराबजी ने मॉडल पुलिस कानून का मसौदा तैयार किया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बने इस मसौदे के आधार पर केंद्र और सभी राज्य सरकार को अपने-अपने पुलिस कानून बनाने थे। लेकिन छह साल बाद न तो केंद्र और न ही किसी राज्य सरकार ने नया पुलिस कानून बनाया है।


बात सिर्फ पुलिस में महिलाओं की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। आजाद भारत में सरकार पुलिस की संख्या बढ़ाने के प्रति भी गंभीर नहीं दिखी है। जहां दुनिया भर में औसतन एक लाख जनसंख्या पर 270 पुलिस वाले हैं। वहीं भारत में इनकी संख्या 120 है। इनमें भी आधी पुलिस बल वीवीआइपी की सुरक्षा या रैलियों व प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए तैनात होती है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों को मानने के बजाय सरकार पिछले छह सालों से किसी न किसी बहाने इसे टरकाने की कोशिश करती रही है। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री, सोनिया गांधी समेत तमाम मंत्रियों के महिलाओं को सुरक्षा देने के दावे पर भरोसा करना आसान नहीं होगा।



1980 पुलिस सुधार आयोग : महिला सब इंस्पेक्टरों व इंस्पेक्टरों को अधिक से अधिक नियुक्त किया जाए

2006दूसरा प्रशासनिक सुधार आयोग: पुलिस में 33 फीसद महिलाओं को आरक्षण मिले

ङ्क्तसोली सोराबजी कमेटी: महिलाओं के प्रति संवेदनशील मॉडल पुलिस कानून का प्रारूप तैयार

2012पुलिस में 33 फीसद आरक्षण के लिए केंद्र ने मांगी राज्यों की राय


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-प्रणय उपाध्याय विशेष संवाददाता, दैनिक जागरण

-प्रणय उपाध्याय विशेष संवाददाता, दैनिक जागरण

थम नहीं रहा अपराधों का ग्राफ


सभी नागरिकों को बराबरी का हक देने वाले संविधान को लागू हुए 63 साल पूरे हो रहे हैं। देश में राष्ट्रीय महिला आयोग और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाएं बीते दो दशक से काम कर रही हैं, लेकिन शर्मसार करने वाली हकीकत यह है कि मुल्क की 48.46 फीसद आबादी यानी महिलाओं के खिलाफ बलात्कार जैसे आपराधिक मामलों में एक तिहाई गुनहगारों को भी सजा नहीं हो पाती। यहां मामला कानून की कमी का नहीं है बल्कि अमल की कमजोरी का है जिसके चलते महिलाओं के खिलाफ अपराध का ग्राफ हर साल करीब तीस फीसद की रफ्तार से बढ़ रहा है।

दिल्ली गैंगरेप मामले के बाद सरकारी तंत्र और नेता जिस व्यवस्था को चुस्त करने के दावे और भरोसे दे रहे हैं।  उनमें से कई प्रावधान तो पहले से मौजूद हैं। करीब ग्यारह साल पहले वजूद में आई राष्ट्रीय महिला नीति में महिलाओं की हिफाजत की वो सारी बातें कही जा चुकी हैं जिन्हें भविष्य के वादों की तश्तरी में सजा कर जनता को दिखाया जा रहा है। मसलन, पुलिस तंत्र को संवेदनशील बनाने, महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रोकथाम, महिला को बराबरी का हक देने के लिए उचित माहौल, उनकी शिकायतों की त्वरित सुनवाई, पुख्ता पड़ताल और जल्द न्याय जैसी सारी बातें बीते एक दशक से लागू राष्ट्रीय महिला नीति का हिस्सा है। 1992 से वजूद में आए राष्ट्रीय महिला आयोग की भी स्थिति शिकायत पेटी से बेहतर नहीं है। उसे जांच का तो अधिकार है लेकिन शिकायतों की पड़ताल कर अपनी सिफारिशें ही दे सकता है। यही वजह है कि आयोग के पास मामलों में 2009 से अब तक 58 हजार से अधिक शिकायतें दर्ज हुई जिनमें से 75 फीसद अभी भी लंबित हैं।



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कानून अपना अपना


देश में


आइपीसी की धारा 376 │ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 में बलात्कारी को दंडित करने का प्रावधान है :

’बलात्कार करने वाले एक व्यक्ति को सात साल, आजीवन कारावास या 10 साल तक की सजा हो सकती है

’यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी का बलात्कार करता है तो उसको दो साल की सजा या जुर्माना या दोनों हो सकती है

’यदि कोई पुलिस अधिकारी या सिविल सेवक किसी महिला का बलात्कार करता है या कोई व्यक्ति 12 साल से कम उम्र या गर्भवती स्त्री के साथ बलात्कार करता है या पुरुषों द्वारा गैंगरेप की स्थिति में उनको 10 साल के सश्रम कारावास या आजीवन कारावास, जुर्माना या दोनों की सजा


आइपीसी की धारा 509 │ शब्द, भाव-भंगिमा, हरकत द्वारा स्त्री के सम्मान को ठेस पहुंचाने के मामले में एक साल की सजा या जुर्माना

या दोनों हो सकता है


आइपीसी की धारा 354 │ स्त्री के सतीत्व का उल्लंघन होने पर दो साल की सजा या जुर्माना या दोनों

भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (2) (जी) में समान मनोदशा के लिए सामूहिक जवाबदेही को सैद्धांतिक रूप से स्पष्ट किया गया है। अपराध की भावना पहले से ही होनी चाहिए जो एक्शन के दौरान अपराधियों के आचरण द्वारा प्रकट होती है। यह अकस्मात भी उत्पन्न हो सकती है लेकिन अपराध के दौरान अपराधियों के मस्तिष्कों का मिलान आवश्यक है।

-गैंगरेप पर सुप्रीम कोर्ट (2003)


परदेस में


chinaचीन : उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहां बलात्कार के विशेष केसों में मृत्युदंड का प्रावधान है। जबर्दस्ती, जबरन, गलत तरीके से बलात्कार करने के मामले में तीन-10 साल की सजा है। यदि लड़की की आयु 14 वर्ष से कम हो तो कड़ी सजा हो सकती है। गैंगरेप, पीड़िता की मृत्यु या उसके गंभीर रूप से घायल होने जैसे विशेष मामलों में दोषी को फांसी दी जा सकती है। चीनी कानून में पुरुषों को लैंगिक उत्पीड़न का शिकार नहीं माना जाता


britainब्रिटेन : बलात्कार, लैंगिक उत्पीड़न के लिए आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। लैंगिक रूप से किसी से संपर्क भी लैंगिक उत्पीड़न की श्रेणी में आता है। इस वजह से छह महीने से 10 साल तक की सजा हो सकती है। किसी के साथ लैंगिक गतिविधियों के लिए जबर्दस्ती करने से छह माह से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है

लैंगिक हिंसा के मामले (2010) │ 45,326



pakistan

पाकिस्तान : गैंगरेप के मामले में न्यूनतम सजा उम्रकैद से लेकर अधिकतम फांसी हो सकती है। किसी महिला के साथ जबर्दस्ती बलात्कार करने पर 10-25 साल की सजा का प्रावधान है। अप्राकृतिक रूप से लैंगिक उत्पीड़न के लिए दो साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है




united state

अमेरिका : हर राज्य में अलग-अलग प्रावधान है। टेक्सास राज्य में जबर्दस्ती, अप्राकृतिक सेक्स, गैंगरेप के बाद यदि जान से मारने की धमकी दी जाती है या पीड़िता की मृत्यु हो जाती है तो दोषी को पांच साल से लेकर अधिकतम 99 साल की सजा तक हो सकती है। लैंगिक उत्पीड़न पर दो-20 साल तक की सजा की व्यवस्था है। वाशिंगटन में बलात्कारी को पांच साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है।

बलात्कार केस (2010) │ 90,750



russian flagरूस : हिंसा का सहारा या धमकी देकर लैंगिक संबंध स्थापित करना, पीड़ित की असहाय दशा का लाभ लेकर लैंगिक उत्पीड़न करना बलात्कार की श्रेणी में शामिल है। इस तरह के मामले में तीन-छह साल तक की सजा का प्रावधान है। गैंगरेप के मामले में चार-10 तक की सजा हो सकती है। 14 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन अपराध करने पर 8-15 साल तक सजा हो सकती है। इस तरह के मामलों में कुल मिलाकर कठोरतम 15 साल की सजा हो सकती है।

लैंगिक हिंसा के मामले (2010) │15,770


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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ival के द्वारा
July 12, 2016

Berenge : C’est vrai que les sites en flash, ce n’est pas ce qu’il y a de mieux. Notamment en terme de rÃn©e©refcÃment. Mais la navigation sur son site est agréable, je trouve. Cosmétogirl : Eh eh !


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