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कानून असरदार व्यवस्था बेकार

Posted On: 31 Dec, 2012 में

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माला दीक्षित  विशेष संवाददाता, दैनिक जागरण

माला दीक्षित विशेष संवाददाता, दैनिक जागरण

कड़े कानून और सख्त नजीरों के बाद भी महिलाओं पर अत्याचार नहीं रुका, क्योंकि लागू करने वाले तंत्र ने अपना काम नहीं किया।

साउथ दिल्ली से सिंगापुर तक जिंदगी-मौत के बीच झूलती मासूम ने लोकतंत्र के हर खंभे को सैकड़ों सवालों से झकझोर कर रख दिया तो सवाल कानून को लेकर भी उठे। कानून में संशोधन उसकी खामियों का इलाज तो कर सकता है लेकिन उनका क्या होगा जो इन कानूनों को ठीक तरीके से लागू ही नहीं करते। अगर महिलाओं की हिफाजत के लिए बने 36 कानूनों को ठीक तरीके से लागू किया गया होता तो जिल्लत झेल रही आधी आबादी पर अत्याचार कुछ तो कम होते लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 36 में से दस कानून तो विशेषकर महिलाओं की हिफाजत के लिए बने हैं लेकिन संख्या बढ़ने के साथ महिलाओं पर जुल्म भी बढ़ते गए। कानून को और कड़ा बनाने की कसरत हमेशा तब शुरू हुई जब गुस्से में जनता सड़कों पर आई।


ऐसा ही एक गुस्सा 40 साल पहले 1972 के मथुरा केस के दौरान भी सामने आया जब रपट लिखाने आई नाबालिग से थाने में दुष्कर्म करने वाले पुलिसवाले बरी हो गए और बवाल मच गया। महिला संगठनों ने देशव्यापी आंदोलन चलाया और नतीजतन 1983 में पहली बार कानून संशोधन कर बलात्कार का कानून कड़ा किया गया। मथुरा केस में आरोपी सुप्रीम कोर्ट से इस आधार पर बरी हो जाते हैं कि ये साबित नहीं होता कि संबंध बनाने में लड़की की सहमति नहीं थी। दलील थी कि लड़की ने वारदात के दौरान न तो शोर मचाया और न ही उसके शरीर पर चोट के निशान थे जो कि जबरदस्ती करने के दौरान होने चाहिए थे। इस केस के बाद 1983 में जो कानून संशोधन हुआ उसके बाद संबंध बनाने में पीड़ित की सहमति थी या नहीं ये साबित करना आरोपी की जिम्मेदारी हो गई। अगर भुक्तभोगी कहती है कि उसकी सहमति नहीं थी तो अदालत उसकी बात को ही मानकर चलेगी। कानून में और भी कई बदलाव हुए जैसे अदालत में पीड़ित के चरित्र को लेकर सवाल पूछने पर रोक लगी। दुष्कर्म के अपराध की श्रेणियां बनीं और सजा भी कड़ी की गई। सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक व्यवस्था दी कि आरोपी को सिर्फ पीड़ित के बयान पर भी सजा दी जा सकती है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ अत्याचार, यौन उत्पीड़न, मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना देना, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ तक रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी किए। संविधान के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के आदेश कानून अहमियत रखते हैं और उन्हें लागू करना सरकार की जिम्मेदारी है। कड़ा कानून और सख्त नजीरें फिर भी महिलाओं पर अत्याचार नहीं रुका  क्योंकि इसके लिए कानून नहीं बल्कि इसे लागू करने वाले तंत्र ने अपना काम ठीक से नहीं किया। लिहाजा जरूरत है तो स्वतंत्र, संवेदनशील और सजग पुलिस के साथ त्वरित न्याय प्रणाली की।



कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न


दूसरा अहम फैसला विशाखा मामले में 13 अगस्त 1997 का फैसला है जो आज भी कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने में कानून भी अहमियत रखता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जब तक सरकार कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने के लिए कानून बनाती है।

तब तक उनके दिशा निर्देश कानून की तरह लागू रहेंगे। 15 साल बाद भी सरकार कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने का कानून नहीं बना पाई। ऐसा एक विधेयक संसद में लंबित जरूर है। मामले में दिए गए दिशानिर्देश के पालन न किए जाने पर इसकी शिकायत फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंची औऱ 19 अक्टूबर 2012 को कोर्ट ने मेधा कोतवाल लेले के केस में एक बार फिर सभी राज्यों को सख्ती से गाइडलाइंस लागू करने का आदेश दिया। इतना ही नहीं कोर्ट ने फैसले का दायरा बढ़ाते हुए कई विधायी संस्थाओं को भी ये दिशानिर्देश लागू करने का आदेश दिया।



अन्य अहम मामले


दिल्ली डोमेस्टिक वर्किंग वूमेन फोरम और विशाखा जजमेंट के बीच में सुप्रीम कोर्ट का एक औऱ महत्वपूर्ण फैसला आया और वह था पंजाब राज्य बनाम गुरमीत सिंह का 16 जनवरी 1996 का। इसमें कोर्ट ने दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताते हुए यहां तक कहा कि हत्या के मामलों में अपराधी पीड़ित का शरीर खत्म कर देता है लेकिन दुष्कर्म के मामले में अपराधी पीड़ित की आत्मा पर चोट पहुंचाता है। अदालतों को ऐसे मामले निपटाते समय बहुत संवेदनशील होना चाहिए। अगर पीड़ित का बयान भरोसे लायक है तो उस पर विश्वास किया जाना चाहिए। उसके साथ किसी सहयोगी

सुबूत की जरूरत नहीं है। इस फैसले में कोर्ट ने 1983 में हुए कानूनी संशोधन का हवाला देते हए अदालतों को दुष्कर्म के मामलों की सुनवाई इन कैमरा करने का आदेश दिया। 26 मई 2004 को साक्षी बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम

कोर्ट ने इन कैमरा (बंद कमरे में)

सुनवाई का दायरा बढ़ा दिया और कहा कि इन कैमरा ट्रायल सिर्फ दुष्कर्म के मामलों में नहीं बल्कि शारीरिक छेड़छाड़ (आईपीसी 354) और अप्राकृतिक यौनाचार (आईपीसी 377) के ट्रायल और जांच में लागू होगा।



महिलाओं के खिलाफ अपराध


इन्हें दो श्रेणी में बांटा जा सकता है। भारतीय दंड संहिता के तहत दर्ज अपराध। आइपीसी में बलात्कार, अपहरण दहेज हत्या, दहेज प्रताड़ना, छेड़खानी और लड़कियों की तस्करी के मामले हैं। जबकि विशेष और स्थानीय कानूनों में अनैतिक देह व्यापार (रोक) कानून, बाल विवाह रोक कानून, सती प्रथा रोक

कानून और महिलाओं का अश्लील प्रदर्शन रोक कानून है। इसके अलावा राज्य सरकारों ने भी जरूरत के हिसाब से कुछ कानून बनाए हैं। लेकिन असर वहां भी ढीला ही है। उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु में छेड़खानी रोकने के लिए अलग कानून बना है लेकिन बेअसर है और फिर सुप्रीम कोर्ट को तमिलनाडु के ही एक मामले में 30 नवंबर 2012 को छेड़छाड़ रोकने की गाइडलाइंस जारी करनी पड़ीं। जाहिर है कानून तो है लेकिन उस पर अमल नहीं हो रहा है।



cuurt hamarसुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश



अपने 6 दिसंबर, 2012 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित सुनवाई के कानूनी प्रावधान (सीआरपीसी धारा 309) को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है। इसमें बलात्कार जैसे मामलों की जांच और सुनवाई दो महीनों में पूरी करने की बात कही गई है। साथ ही अदालतों को आगाह किया गया है कि वे बेवजह के स्थगन आदेश न दें। इससे पहले के फैसलों में दिए निर्देश पर अमल नहीं हुआ।  19 अक्टूबर 1994 को दिल्ली डोमेस्टिक वर्किंग वूमेंस बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में आठ दिशानिर्देश दिए।


1 ) यौन उत्पीड़न की शिकार को वकील मुहैया कराया जाएगा और उस वकील को क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की अच्छी जानकारी होनी चाहिए। उसकी जिम्मेदारी सिर्फ इतनी नहीं होगी कि वह पीड़ित को कानूनी कार्यवाही की जानकारी दे, उसे थाने और अदालत में कानूनी मदद बल्कि यह भी बताएगा कि पीड़ित अन्य एजेंसियों (माइंड काउंसलिंग और चिकित्सीय मदद) से मदद किस तरह प्राप्त कर सकती है। इस कानूनी मदद की निरंतरता सुनिश्चित करना भी जरूरी है। जो व्यक्ति पीड़ित को थाने में कानूनी मदद दे वही उसे अंत तक अदालत में भी मदद करे।


2 ) पीड़ित को कानूनी मदद थाने में ही दी जानी चाहिए क्योंकि दुष्कर्म पीड़ित बहुत ही परेशान हालत में थाने पहुंचती है और ऐसे में उस वक्त और उससे सवाल जवाब करते समय दी गई कानूनी मदद बहुत कारगर होगी।


3 ) पुलिस का कर्तव्य होगा कि वह पीड़ित से कोई भी प्रश्न करने से पहले उसे वकील की मदद लेने के अधिकार के बारे में बताएगी। पुलिस रिपोर्ट में यह लिखा जाएगा कि पीड़ित को इस बारे में सूचित किया गया।


4) जो वकील इस काम में मदद करना चाहते हैं उनके नामों की सूची थाने में मौजूद रहेगी क्योंकि हो सकता है कि पीड़ित की जानकारी में कोई वकील न हो या उसका वकील उपलब्ध न हो।


5 ) पुलिस की अर्जी पर कोर्ट जल्दी से जल्दी वकील नियुक्त करेगा लेकिन पीड़ित से पूछताछ में कोई देरी न हो इसके लिए कोर्ट से अनुमति मिलने से पहले वकील को थाने में ही पीड़ित की मदद करने का अधिकार है।


6) दुष्कर्म के सभी मामलों में पीड़ित की पहचान गोपनीय रखी जाएगी।


7 ) संविधान के अनुच्छेद 38 (1) के तहत जरूरी है कि एक क्रिमिनल इंजरीस कंपनशेसन बोर्ड गठित किया जाए। पीड़ित को तत्काल आर्थिक हानि होती है और कई बार वह इतने सदमे में आ जाती है कि वह अपनी नौकरी जारी नहीं रख पाती है।


8) अदालतें अपराधी को दोषी ठहराते समय पीड़िता को मुआवजा दिलाएंगे। बोर्ड मुआवजा तय करते समय पीड़ित को पहुंचे

शारीरिक और मानसिक आघात, आर्थिक नुकसान, बलात्कार के कारण ठहरे गर्भ व बच्चे के जन्म के खर्च को भी ध्यान रखेगा।



दोषियों को कड़ा दंड देने की मांग उठ रही है लेकिन कई बार यह मांग पीड़ित का कष्ट बढ़ा देती है


दुष्कर्म एक ऐसा अनुभव है जो पीड़ित की जिंदगी में भूचाल ला देता है। कई बार तो इसका असर पीड़ित के आपसी संबंधों, व्यवहार और जीवन मूल्यों पर लंबे समय तक रहता है। जिंदगी भर के लिए उसमें भय समा जाता है औऱ कानूनी प्रक्रिया उसके इस दर्द को और बढ़ा देती हैसबसे पहले तो पीड़ित की शिकायत को काफी हल्के से लिया जाता है। उसे जरूरी तरजीह नहीं दी जाती है। इसके बाद रेप ट्रायल उसके लिए आमतौर पर कष्टदायक अनुभव होता है। अदालत में साक्ष्य देना उसके लिए बहुत मुश्किल होता है। कई बार पीड़ित कहती है कि दुष्कर्म की घटना बयान करना दुष्कर्म से ज्यादा कष्टदायक है



- दिल्ली डोमेस्टिक वर्किंग वूमेंस बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी



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female symbolहिफाजत की फिक्र



जननी


सृष्टि की। उस मानव की जो खुद को सबसे समझदार जीव होने का खम ठोंकता है। दुनिया की हर चीज के सृजन के पीछे जुड़ा है नारी मातृत्व। अपने गर्भ में पाल-पोष कर हमें इस दुनिया में लाने के लिए स्त्री के रूप में जननी ही जिम्मेदार है।


ज्यादती


दिल्ली गैंग रेप की पीड़िता अब हमारे बीच नहीं है। उसने जीने का अदम्य साहस तो दिखाया लेकिन नियति के हाथों हारकर भी समाज को वह जगा गई। ऐतिहासिक रूप से देश की यह पहली घटना होगी जब आम आदमी के साथ हुए हादसे ने मानवता को झकझोर कर रख दिया। वेंटिलेटर के भरोसे सांस ले रही एक लड़की जिसे किसी ने नहीं देखा वह देखते ही देखते पूरे देश के आक्रोश का प्रतीक बन गई, लेकिन क्या इस आक्रोश का कोई निर्णायक अंजाम होगा? महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की लंबी फेहरिस्त है। उम्र के हर पड़ाव पर उन्हें इनसे दोचार होना पड़ रहा है। कन्या भ्रूण हत्या, लैंगिक भेदभाव, बाल विवाह, वेश्यावृत्ति, यौन हिंसा, ऑनर किलिंग, दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, दफ्तर में यौन उत्पीड़न, विधवा का जीवन और बुढ़ापे में परित्यक्त का जीवन जीने को वे अभिशप्त हैं।


जरूरत


यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता और नारी को साक्षात् देवी मानकर उनकी पूजा करने वाले देश में उनकी यह हालत आधुनिक समाज के माथे पर बड़ा कलंक है। कानून व्यवस्था को ठीक करना और कड़ी सजा देना ही इसका एकमात्र हल नहीं है। आंकड़े गवाह है कि महिलाओं के खिलाफ ज्यादातर अपराध उनके खुद के जानने वालों और परिचित लोगों ने अंजाम दिए हैं। कई अन्य मामलों में कठोर सजा का प्रावधान है लेकिन वे अपराध भी नहीं रुक रहे हैं। लिहाजा अब समय महिलाओं के प्रति मानसिकता और दृष्टिकोण में बदलाव का आ चुका है। नया साल आने वाला है। आइए महिलाओं के खिलाफ अपने और समाज के नजरिए में सकारात्मक बदलाव लाने का संकल्प करें। नए साल में महिलाओं के हिफाजत की फिक्र ही हम सबके लिए बड़ा मुद्दा होना चाहिए।



Tag: दिल्ली गैंग रेप, नारी,महिला, यौन उत्पीड़न,सुप्रीम कोर्ट,कानून,Delhi gang rape, women,supreme court,sexual harassment





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