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सीबीआइ का सच

Posted On: 27 Dec, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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संस्था

सीबीआइ यानी केंद्रीय जांच एजेंसी। आपराधिक मामलों की देश की आला जांच एवं खुफिया एजेंसी। एक समय अपने बेहतर  प्रदर्शन के लिए जानी जाने वाली यह संस्था राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के मामले में अपेक्षित तेजी न दिखा पाने की वजह से विवादों में रही है। हाल ही में इस संस्था से जुड़े कई वाकए सामने आए जो इसकी साख को धूमिल करते हैं।  इसके एक पूर्व निदेशक ने संस्था के काम में राजनीतिक दबाव की बात कही तो खुदरा में एफडीआइ मसले पर संसद में बहस के दौरान सीबीआइ के राजनीतिक इस्तेमाल की बात सामने आई।


साख

अपराधियों में खौफ और आम नागरिकों में विश्वास एवं भरोसे की प्रतीक माने जाने वाली इस संस्था के राजनीतिक इस्तेमाल से इसकी साख पर बट्टा लगता रहा है। भले ही यह प्रमाणित नहीं हो लेकिन यह आम धारणा  बनती जा रही है कि सत्ताधारी दल द्वारा इस संस्था का राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। यद्यपि यह तय है कि इस परंपरा की शुरुआत कांग्र्रेस ने की।


सवाल

चूंकि सबसे ज्यादा समय तक केंद्र में कांग्रेस पार्टी की सरकार रही है लिहाजा यह कहना कठिन नहीं है कि इसी ने जांच एजेंसी का सर्वाधिक इस्तेमाल किया है। विडंबना देखिए, आम आदमी जहां न्याय पाने के लिए खुद से जुड़े मामले की जांच इस एजेंसी से कराए जाने की इच्छा रखता है वहीं, राजनेताओं और नौकरशाहों से जुड़े मसले में यह न्याय प्रायोजित घोषित हो चुका है। ऐसे में देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी की पारदर्शिता, स्वायत्तता और काम का तरीका हम सबके लिए बड़ा मुद्दा बन जाता है।



प्रकाश सिंह  (पूर्व पुलिस महानिदेशक)

प्रकाश सिंह (पूर्व पुलिस महानिदेशक)

एजेंडे को बढ़ाने का साधन


राज्यों में मुख्यमंत्री पुलिस का दुरुपयोग करते हैं, दिल्ली में केंद्र सरकार सीबीआइ का


सीबीआइ की कार्यप्रणाली पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। इधर हाल में दो प्रकरण ऐसे हुए जिससे इस संस्था की विश्वसनीयता पर फिर से सवाल खड़े हो गए हैं। विभाग के ही पूर्व निदेशक यूएस मिश्रा ने कहा कि बड़े नेताओं के खिलाफ जांच में प्रगति रिपोर्ट को लटकाने या खास तरीके से पेश करने के लिए अक्सर राजनीतिकदबाव पड़ता है। मिश्रा ने  बताया कि मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की जांच के दौरान भी ऐसा हुआ था। इसके अलावा समाजवादी पार्टी ने पदोन्नति में आरक्षण के मसले पर सीबीआइ के माध्यम से दबाव डालने का आरोप लगाया है। सपा के प्रवक्ता ने बयान दिया है कि यूपीए सरकार मुलायम सिंह यादव को सीबीआइ के जाल में फंसाने की कोशिश कर रही है। उपरोक्त दोनों ही प्रकरणों की पृष्ठभूमि सुप्रीमकोर्ट का हाल में दिया वह आदेश है जिसके द्वारा सपा प्रमुख मुलायम सिंह व उनके बेटों के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोपों को जारी रखने का आदेश देते हुए कोर्ट ने कहा है कि सीबीआइ एक स्वायत्त और स्वतंत्र जांच एजेंसी है। इस मामले में सीबीआइ केंद्र सरकार के निर्देश पर काम नहीं करेगी और जांच रिपोर्ट सीधे सुप्रीम कोर्ट को देगी। यह दूसरा ऐसा मामला है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने किसी अभियोग का पर्यवेक्षण सीधे अपने अधीन लिया है। इसके पहले 2-जी आवंटन घोटाले में भी सुप्रीम कोर्ट ने जांच की निगरानी अपने हाथ में ली थी। सुप्रीमकोर्ट ने इन मामलों में जो हस्तक्षेप किया है, वह उच्चस्तरीय मामलों की निष्पक्ष विवेचना का स्थायी समाधान नहीं कहा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट आखिर किन-किन मामलों का पर्यवेक्षण करेगा। आवश्यकता है एक ऐसी व्यवस्था की, जिसमें सीबीआइ स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक ढंग से अभियोगों की विवेचना कर सके।



यह एक विचित्र स्थिति है कि सीबीआइ के लिए आज तक अलग से अधिनियम नहीं पारित किया गया है। कई कमेटी ने समय-समय पर सीबीआइ के लिए अलग से अधिनियम बनाने की सिफारिशें की, परंतु केंद्र सरकार ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया।



1978 में एलपी सिंह कमेटी ने केंद्रीय जांच एजेंसी के लिए एक विस्तृत अधिनियम की आवश्यकता पर बल दिया था। 1998 में सुप्रीमकोर्ट ने विनीत नारायण मामले में सीबीआइ की स्वायत्तता  हेतु कुछ निर्देश दिए थे। तत्कालीन चीफ जस्टिस जेएस वर्मा ने हाल में एक लेख में इस बात पर खेद प्रकट किया कि उनके द्वारा पारित निर्देशों के बावजूद सीबीआइ महत्वपूर्ण लोगों के विरुद्ध अभियोगों में जनता को निराश कर रही है। जस्टिस वर्मा ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि  सीबीआइ की जांच इस बात पर निर्भर करती है कि आरोपी पक्ष का सत्ताधारी पार्टी के साथ कैसे राजनीतिक संबंध है। 2007 में संसद की स्थायी समिति ने अपनी 19वीं रिपोर्ट में साफ-साफ लिखा कि सीबीआइ के लिए एक अलग एक्ट बनाना चाहिए जिसके द्वारा उसकी निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके। 2008 में पुन: इसी समिति ने अपनी रिपोर्ट में सीबीआइ के कार्यों में राजनीतिक हस्तक्षेप का उल्लेख करते हुए कहा कि सीबीआइ को वैधानिक अधिकार और संसाधनों की दृष्टि से सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। दुर्भाग्य से इन सभी संस्तुतियों को केंद्र सरकार ने नजरंदाज किया। जो भी पार्टी सत्ता में आई उसे लगा कि सीबीआइ जैसी है उसे वैसा ही रखा जाए, क्योंकि इससे समय-समय पर राजनीतिक लाभ लिया जा सकता है। राज्यों में मुख्यमंत्री पुलिस का दुरुपयोग करते हैं। जांच एजेंसियां, सरकारों के राजनीतिक एजेंडे को बढ़ाने का एक साधन बन गई है। आज आवश्यकता है कि पुलिस सुधार हो और केंद्र स्तर पर सीबीआइ को सही मायने में स्वायत्तता प्रदान करने हेतु उसे संवैधानिक आधार दिया जाए जैसा कि चुनाव आयोग या नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) को है। ताकि यह एजेंसी स्वतंत्र और निष्पक्ष भाव से अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर सके।



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