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जवाबदेही की दरकार

Posted On: 20 Nov, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Trilochan Shastriसंसद

लोकतंत्र का मंदिर। जनता की समस्याओं का निराकरण करने वाली देश की सबसे बड़ी पंचायत। हम सबकी आस्था और भरोसे का प्रतीक। हमारी संसदीय प्रणाली को स्थायित्व से ज्यादा जवाबदेह बनाने की संविधान सभा की मंशा को साकार करती संस्था। देश के लोगों के भरोसे की प्रतीक संस्था संसद का शीतकालीन सत्र आगामी 22 नवंबर से शुरू हो रहा है।




साख

बीते कुछ साल से लोकतंत्र के इस सर्वोच्च संस्था की गरिमा में आई गिरावट अब जगजाहिर हो चुकी है। आम जनमानस आहत है। हर बार की तरह इस संसद सत्र के हंगामेदार होने की उम्मीद है। विपक्षी दल कमर कसे हुए हैं। लिहाजा इस बैठक का भी वही हश्र तय माना जा रहा है जो पूर्व में होता आया है। शोरगुल और हंगामे के चलते बार-बार सदन का स्थगन और वॉकआउट।


सवाल

जब सिटीजन चार्टर और आरटीआइ के जरिए कार्यपालिका की जवाबदेही तय करने की कोशिश की जा रही है, न्यायपालिका की जवाबदेही तय करने के लिए कानून बन रहा है, मतदाताओं की जवाबदेही तय करने के लिए अनिवार्य मतदान वाली व्यवस्था की मांग जोरों पर हैं तो ऐसे में संसद और सांसदों की जवाबदेही क्यों नहीं तय होनी चाहिए? उनके लिए कुछ अनिवार्यता क्यों नहीं  होनी चाहिए। जब हर स्तर पर उत्पादकता की बात की जाती है तो कई-कई दिन तक संसद ठप रहने के बाद उसकी उत्पादकता पर बहस क्यों नहीं होनी चाहिए? जब हम प्रत्येक संस्था का सांख्यिकीय आकलन करते हैं तो संसद का आकलन क्यों नहीं होना चाहिए? बार-बार संसद के बेनतीजा सत्रों से उसकी जवाबदेही के प्रति उठे ऐसे सवाल आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।


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दुर्भाग्य से आम चुनावों को छोड़कर संसदीय जवाबदेही सुनिश्चित करने का कोई रास्ता अभी तक हम नहीं खोज पाए हैं।

संसद की जवाबदेही के मसले पर सिविल सोसायटी ने सरकार को बार-बार घेरा है। बदले में इसे सरकार के कोप का भाजन बनना पड़ा। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने 2जी स्पेक्ट्रम, कृष्णा गोदावरी बेसिन और ‘कोलगेट’ मामले में सरकार की भूमिका पर सवाल खड़े किए है। कारपोरेट सेक्टर की भी जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। मीडिया, न्यायपालिका, नौकरशाही और पुलिस पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। इस मामले में आरटीआइ एक्ट ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

यद्यपि संसद को स्व नियमन वाली संस्था माना जाता है और इसकी आलोचना करने पर संसदीय विशेषाधिकार के तहत दंडित किया जा सकता है। लोकतंत्र की इस सबसे महत्वपूर्ण संस्था द्वारा पारित कानून सभी नागरिकों को प्रभावित करते हैं। इसमें सार्वजनिक खर्चों और सरकारी काम-काज पर सवाल उठाए जाते हैं और बजट पास होते हैं। संसद सदस्यों को संसदीय विशेषाधिकार मिले होते हैं। इसके तहत संसद के भीतर कृत्यों के लिए उनको सुरक्षा प्राप्त होती है। एक स्वस्थ समाज में अपने जिम्मेदारी भरे कामों से ही विशेषाधिकार प्राप्त किया जाता है। महात्मा गांधी ने भी कहा है कि कर्तव्यों के निर्वहन से ही ‘अधिकारों’ को प्राप्त किया जा सकता है।


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हालांकि आज आंकड़ों को देखने से संसदीय कार्यप्रणाली का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। सदस्यों की उपस्थिति से लेकर सवाल पूछने, बहस आदि में स्पष्ट गिरावट है। एक बुनियादी समस्या यह है कि पार्टी व्हिप जारी होने के बाद संसद सदस्य को अपनी अंतरात्मा, निर्वाचन क्षेत्र या सार्वजनिक हित में वोट देने की अनुमति नहीं होती।  यदि कोई संसद सदस्य किसी अपराध के लिए दोषी साबित होता है तो उसको अगले चुनाव से पहले नहीं हटाया जा सकता। राज्य सभा ने तो एक आचार संहिता अपनाई है, लेकिन लोक सभा में ऐसा नहीं किया गया है। सदस्यों से यह अपेक्षा की गई है कि वह हर साल स्पीकर को अपनी संपत्ति का ब्यौरा पेश करें लेकिन ऐसा यदा-कदा ही होता है। इसको प्रभावी बनाने का कोई तंत्र नहीं है। संसदीय कमेटियों में शामिल सदस्यों के हितों के टकराव का मसला तो अभी तक उठाया ही नहीं  गया है। इसमें कई ऐसे दागी या ऐसे सदस्य होते हैं जो कंपनियों के डायरेक्टर या शेयरधारक होते हैं और इससे संबंधित कमेटी के सदस्य भी होते हैं। राज्य विधानसभाओं में तो स्थिति और भी खराब है। ऐसी स्थिति में बाहरी ताकतवर शक्तियां मन मुताबिक कानून बनवा सकती हैं, मंत्रियों को हटवा सकती हैं या सरकार तक गिरा सकती हैं। यह अपने आप में लोकतंत्र के लिए खतरा है। दुर्भाग्य से आम चुनावों को छोड़कर संसदीय जवाबदेही सुनिश्चित करने का कोई रास्ता नहीं खोजा जा सका है। इस लिहाज से वह वोटरों के लिए जवाबदेह हैं। लेकिन यह उनको कानून के शासन और अपने कर्तव्यों के निर्वहन के लिए जवाबदेह नहीं बनाता। अपेक्षा की जाती है कि आंतरिक तौर पर वह खुद ही नियंत्रित होंगे लेकिन जब ऐसा नहीं होता तो कोई भी तरीका नहीं बचता। लोकतंत्र में नागरिक के लिए बुनियादी सवाल यह है कि यदि उनका निर्वाचित संसद सदस्य ऐसे काम नहीं करता जो उसको करने चाहिए थे तो वह केवल उसको हताशा से देख ही सकता है। हमारे संविधान निर्माताओं ने इस तरह की स्थितियों की कल्पना भी नहीं की होगी। तभी तो इसका कोई कानूनी या संवैधानिक उपाय नहीं है।


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लोकतंत्र में संसद केवल ऐसी संस्था नहीं होनी चाहिए जो संशय से परे हो बल्कि ऐसा निकाय भी होना चाहिए जिस पर हम सभी देशवासियों को गर्व हो। यह संभव है कि हम अभी भी इस पर गर्व करते हों लेकिन क्या इसमें जाने वाले सदस्यों का भी हम वैसा ही सम्मान करते हैं? जब इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट रूप से ‘हां’ होगा तो यह माना जाएगा कि राष्ट्र और समाज के लिए हमने कुछ उपलब्धि हासिल की है।



चार कारगर हथियार

संसद और लोकतंत्र को बचाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर गौर करने की जरूरत है।

1 हमें ऐसे नियमों की जरूरत है जो यह सुनिश्चित कर सकें कि केवल सक्षम और ईमानदार लोग ही संसद में जा सके। इसके लिए ऐसे कानून चाहिए जो गंभीर आपराधिक मामलों वाले प्रत्याशियों पर चुनाव लड़ने से अंकुश लगा सकें। दुर्भाग्य से लोकसभा में 162 संसद सदस्य ऐसे हैं जिन पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। इनमें से 75 के खिलाफ गंभीर मामले दर्ज हैं।

2राजनीतिक और चुनावी फंडिंग पर शक्तिशाली नियंत्रण, दंड और पारदर्शिता होनी चाहिए। कई महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक देशों में इस व्यवस्था को अपनाया गया है।

3राजनीतिक दलों को कानून के जरिए इस तरह नियंत्रित किया जाना चाहिए ताकि उनमें आंतरिक लोकतंत्र होने के अलावा उनकी फंडिंग प्रक्रिया पारदर्शी बन सके। मसलन आंतरिक लोकतंत्र का आशय यह होगा कि व्हिप व्यवस्था तभी लागू होगी जब सरकार के गिरने का खतरा हो। इससे संसद सदस्य मुक्त रूप से वोटिंग कर सकेंगे।

4ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए जो संसद के अंदर और बाहर के कृत्यों पर समान रूप से लागू हो सकें। जिस प्रकार अपनी ही अदालत की अवमानना करने पर जज के खिलाफ मामला बनता है उसी तरह संसद की अवमानना करने पर संसद सदस्य के खिलाफ भी मामला बनना चाहिए। इसके लिए लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के लिए एक प्रभावी आचार संहिता होनी चाहिए। अन्य देशों में ऐसी व्यवस्था की गई है।


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क्या है जवाबदेही

आमतौर पर इसका आशय ऐसे अधिकारपूर्ण संबंध से है जिसमें एक

व्यक्ति अपनी गतिविधियों, कार्यों, दायित्वों के लिए दूसरे के प्रति जवाबदेह होता है। इसमें दो बातें निहित हैं। पहली

जागरुकता और दूसरी, ऐसे साधनों तक पहुंच जो कार्यों/कृत्यों के घटित होने

के लिए जिम्मेदार होते हैं। इसी

जागरुकता के आधार पर साधन संपन्न से जवाब मांगा जाता है।

हालांकि यह सामान्य उत्तरदेयता से व्यापक अवधारणा है। इसमें सरकार के लिए यह जरूरी होता है कि वह व्यवस्थित तरीके से ऐसी नीतियों एवं कानूनों का निर्माण करें जिनमें जनता के विचार प्रतिबिंबित हों। जवाबदेही ताकत,

निर्णय और कार्यों से संबंधित है

और अपनी जिम्मेदारियों का सही ढंग से निर्वहन नहीं करने वाले सार्वजनिक

निकायों एवं अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है।

लोकतंत्र में सार्वजनिक जवाबदेही के लिए चुनाव के अतिरिक्त अन्य प्रक्रियाओं एवं संस्थाओं की जरूरत होती है। वैधता, पारदर्शिता, सक्षमता और प्रतिनिधित्व जैसे मसले जवाबदेही में अपने आप ही प्रतिबिंबित होते हैं।

संसद के प्रति सरकार/कार्यपालिका की जवाबदेही की आवश्यकता :

इस मामले में दो बातें अहम हैं।

पहली,  संसद की संप्रभुता से

संबंधित है। यह एक ऐसा जरिया है जिसमें कार्यकारी शक्तियां जनता के प्रतिनिधियों में निहित होती हैं। इसलिए संवैधानिक रूप से यह अहम है। दूसरा, सरकारी

गतिविधियों पर बहस के लिए यह एक प्लेटफार्म उपलब्ध कराकर संसद के अभिव्यक्ति वाली पूर्ण भूमिका की पूर्ति करती है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण कार्य है।


प्रो त्रिलोचन शास्त्री

(चेयरमैन, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स)



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