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समरथ को नहिं दोष गोसाईं

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पुष्पेश पंत  प्रोफेसर, जेएनयू

पुष्पेश पंत प्रोफेसर, जेएनयू

जैसे तैसे यदि आप अमीर बन जाते हैं तो आप में कुछ भी कर सकने का भ्रम आ जाता हैं। वाणी असंयमित हो जाती है। इसी का नतीजा है कि ताकतवर तबका अपने को कानून से ऊपर समझने लग जाता है।

आजकल जिस तरह की गाली गलौज के स्तर वाले राजनैतिक ‘संवाद’ सुनने को मिल रहे हैं, वह निर्विवाद रूप से शर्मनाक तथा असह्य है। इतना कहकर हम अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा नहीं पा सकते कि यह तो कलियुग है इसमें सतयुग, त्रेतायुग या द्वापर जैसी शालीनता कहां संभव है। हकीकत यह है कि राजनीति में ही नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में मूल्यों का तेजी से क्षरण हुआ है। संयम, मर्यादा या नैतिकता की बात करने वालों को महामूर्ख समझा जाने लगा है।


इसका सबसे बड़ा कारण जिसका सामना करने से हम कतराते हैं, लक्ष्मी को सरस्वती की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण देवी के रूप में प्रतिष्ठित करना और आंख मूंद कर उसकी उपासना करना है। नौजवान पीढ़ी जो इस घड़ी भारत की आबादी का आधे से अधिक हिस्सा है, सिर्फ यह जानती है कि ‘सर्वे गुणा कांचनम् आश्रयंति’। जैसे तैसे यदि आप अमीर बन जाते हैं तो आप कुछ भी कर सकते हैं। वाणी का संयम तो बहुत दूर की बात है। अश्लील उपभोग पर कोई रोकटोक नहीं। और इसी का नतीजा है कि ताकतवर तबका अपने को कानून से ऊपर समझने लग जाता है। यहां यह साफ  करना जरूरी है कि सरस्वती को मान्यता प्राप्त डिग्री का पर्याय ना समझा जाय। परिवार तथा अड़ोस-पड़ोस से जो संस्कार हम ग्रहण करते हैं वही सरस्वती का असली वरदान है। जिसे विवेक कहा जाता है वह और कुछ नहीं व्यक्ति के सार्वजनिक आचरण को अनुशासित करने वाली परंपरा का आत्मानुशासन है। कोई भी कानून किसी भी समाज में इससे ज्यादा प्रभावशाली नहीं हो सकता।


जहां तक राजनेताओं की बात है उनके बीच आपसी आरोपों की बौछार को अनावश्यक तूल देने की जरूरत नहीं। यह बात एकाधिक बार स्पष्ट हो चुकी है कि यह एक तरह की नूराकुश्ती है जिसका मकसद जनता का ध्यान शासक वर्ग के सभी सदस्यों के भ्रष्टाचार से हटाना है। आप प्रतिपक्षी को जितनी भद्दी गाली देंगे उतनी ही बेहयाई से वह आप पर जवाबी हमला करेगा। यह मुठभेड़ कोरी लफ्फाजी तक सीमित रहती है। इससे भ्रष्टाचार, अत्याचार, व्यभिचार का आरोपी नजरअंदाज होने लगेगा जो असली मुद्दा है। या तो बेमतलब बहस यह छिड़ जायेगी कि क्या इस तरह की असंसदीय भाषा का प्रयोग किया जा सकता है या फिर मामला अदालत में पहुंचाकर न्यायालय के विचाराधीन हो जायेगा जिसके बारे में कोई टिप्पणी  करना जोखिम भरा हो सकता है। मंदमति इंसान भी यह समझ सकता है कि यह एक सुनियोजित साजिश है साधारण नागरिक को जनतांत्रिक बहस से बाहर रखने की। दूसरे शब्दों में अभद्र भाषा के खुल्लमखुल्ला इस्तेमाल या बेलगाम लांछन लगाने का अधिकारी सिर्फ साधन संपन्न बिरादरी को ही समझा जा सकता है।


निरीह गरीब नागरिकों की तो रोजमर्रा की जिंदगी गाली खाते और गाली देते ही बीतती है। मां-बहन की ऐसी तैसी करने वाले मुहावरों को या तो मजाक में टाल दिया जाता है या फिर हाथापाई के बाद नपुंसक गुस्सा ठंडा पड़ जाता है। हाल की सुर्खियों को याद करें तो जनसाधारण के लिये यह गालियां शब्दों तक सीमित नहीं रहतीं। गांव देहात हो या शहर दलितों-दरिद्रों की दुनिया में बलात्कार, यौन शोषण दर्दनाक यथार्थ है। यह सिर्फ अपमानजनक गाली नहीं। ‘चोर’, ‘डाकू’, ‘लुटेरा’, ‘बलात्कारी’, ‘हत्यारा’ और ‘गुंडा’ जैसे शब्द असंसदीय भले ही करार दिए जाएं लेकिन आम आदमी के लिए पेशेवर राजनेताओं की यह पहचान बन चुके हैं  जो इनका उत्पीड़न झेल रहा हो उसको इस बात से कोई सांत्वना नहीं मिल सकती कि ‘सब एक जैसे नहीं’!


जिस देश में सांप्रदायिक दंगों को अंजाम देने वालों को सरकारी बयानों में ‘शरारती तत्व’ कहा जाता हो और खतरनाक आतंकवाद की चपेट में झुलसते भूभाग को ‘उपद्रव ग्रस्त’ इलाका या देश की एकता को खंडित करने पर आमादा अलगाववादियों को ‘असंतुष्ट’ नाजायज आक्रामक विदेशी घुसपैठियों को ‘मासूम शरणार्थी’ वहां वहां भाषा के समुचित प्रयोग की अपेक्षा नादानी ही है।


हमारी समझ में भाषा का निरंकुश भ्रष्टाचार तो लक्षण मात्र है उस घातक सर्वव्यापी भ्रष्टाचार का जो हमें जानलेवा कैंसर की तरह खाए जा रहा है!



सवाल नैतिकता का



माननीय


दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र। संसद और राज्य की विधानसभाओं के लिए चुने गए करीब 4910 जनप्रतिनिधि। आम जनता इन्हें अपना रहनुमा मानते हुए खुद के हितों की सुरक्षा करने के लिए सत्ता के सिंहासन पर बैठाती है। अपने अनमोल मत के बदले वह इन लोगों से यह भी अपेक्षा करती है कि ये अपने आचार, विचार और व्यवहार से ऐसा उदाहरण पेश करें कि सभी लोग उसका अनुसरण करें।


मर्यादा


भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण पेश किए जाने और उनके अनुकरण का लंबा इतिहास रहा है। आज भी मिसाल के तौर पर ऐसे लोग मिल जाएंगे लेकिन उनकी संख्या ‘चंद’ होती जा रही है। बहुतायत में ऐसे राजनेता हैं जिनके राजनीतिक संवादों का शायद ही कोई अनुकरण करना चाहे। इस हमाम में सब नंगे हैं, लेकिन सभी एक दूसरे को आईना दिखा रहे हैं। मेरी कमीज तुम्हारी कमीज से ज्यादा सफेद है। शायद ही ऐसी कोई राजनीतिक पार्टी हो जिसके नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप न हों और वे बेदाग हों। अफसोस तो तब होता है जब इन सारी बातों से भिज्ञ ये नेता विपक्षी दल के किसी नेता को आरोप लगाने के दौरान उसका स्तर इतना गिरा देते हैं कि सुनने वाला स्तंभित रह जाए।


मौका


कई मायनों में भारतीय लोकतंत्र अपने सर्वकालिक शीर्ष से गुजर रहा है। चाहे बात पारदर्शिता की हो, निष्पक्षता की हो, सशक्त और प्रभावी न्यायपालिका और मीडिया की हो, आम जनता में आई जागरूकता और आत्मविश्वास में वृद्धि की हो, सभी क्षेत्रों में हमारा लोकतंत्र अपना सर्वश्रेष्ठ जी रहा है। ऐसे में हम सबके लिए बड़ा मुद्दा बन चुके भारतीय राजनीति में मर्यादा और नैतिकता पर उठने वाले सवालों का कारगर इलाज तलाशने का यही सही समय है।



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1 प्रतिक्रिया

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Tori के द्वारा
July 12, 2016

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