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सौ तालों की एक चाबी है यह कानून

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talaसामूहिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुचारु रूप देने तथा तंत्र को पारदर्शी एवं जवाबदेह बनाने के लिए लोगों के हाथों में सूचना का अधिकार एक बहुत ही महत्वपूर्ण अस्त्र है। इसे बचाने के लिए जनता को ही अपने प्रयास और तेज करने पड़ेंगे।हम सब जानते हैं कि हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए सूचना का अधिकार एक मजबूत औजार बन रहा है, लेकिन यह कानून पूरी तरह कारगर साबित हो, इससे पहले ही सरकारी तंत्र इसे बेअसर करने तथा इसकी धार को भोथरा करने में जुट गया है।


हाल ही में प्रधानमंत्री ने सूचना का अधिकार कानून लागू होने की सातवीं वर्षगांठ के मौके पर दिए भाषण में सूचना के अधिकार कानून का दुरुपयोग, निजता के अधिकार और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप पर बात की है। इससे पहले से ही गोपनीयता की संस्कृति के शिकार सत्ता तंत्र में बैठे लोगों में यह संदेश गया कि सूचना के अधिकार कानून को बेहद लचर तरीके से लागू किया जा सकता है। शीर्ष स्तर पर इस तरह की बयानबाजी का अधिकारियों में नकारात्मक संदेश जाने के अंदेशे को खारिज नहीं किया जा सकता है।


अभी तो सूचना के अधिकार कानून को जन-जन तक पहुंचाने का काम ही नहीं हुआ है, अभी तो इसका पूरा उपयोग भी नहीं हो पाया है कि कथित दुरुपयोग की बहस छेड़कर जनता के हाथ में आई शक्ति को सीमित करने का प्रयास हो रहा है। अभी हालात ये हैं कि सूचनाएं प्राप्त करने में बहुत बाधाएं आ रही हैं। सूचना अधिकार कानून को काम में लेने वालों को कई खतरों से रूबरू होना पड़ रहा है। इतनी जटिलताएं इसकेउपयोग में खड़ी कर दी गई है कि कानून अपना पूरा असर नहीं छोड़ पा रहा है।


सूचना का अधिकार कानून की धारा 4 हर एक सरकारी विभाग को स्वत: सूचनाएं उद्घाटित करने को बाध्य करती है। धारा 4 इस कानून की आत्मा है। इसके जरिए स्वत: ही पूरे देश का तंत्र पारदर्शी हो सकता है, मगर कानून लागू हो जाने के सात वर्ष बाद किसी भी राज्य या केंद्रसरकार ने धारा 4 को लागू करने की इच्छा शक्ति नहीं दर्शाई है। कानून में 30 दिन में सूचना नहीं मिलने पर उसी विभाग के उच्च अधिकारी के समक्ष प्रथम अपील का प्रावधान है। यदि सरकारी तंत्र ठीक से काम करता तो सूचना आयोगों में इतने मामले लंबित नहीं होते। सूचना के अधिकार कानून का व्यापक प्रचार-प्रसार भी बेहद जरूरी था, मगर इस दिशा में शायद ही कुछ हुआ हो।


सोचा गया था कि सरकारी तंत्र पर लगाम कसने के लिए सूचना आयोग काम करेगें, मगर सरकारी तंत्र को ठीक करने के बजाय सूचना आयोग इसी तंत्र के सेवा निवृत्त अधिकारियों का पुनर्वास स्थल बनने लगे। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आयोग भी आरटीआइ को प्रभावी बनाने में नाकाम साबित हुए हैं। चूंकि आम नागरिक ही इस कानून के जनक हैं और वे ही इसके रक्षक भी। लिहाजा सूचना अधिकार का जनता को निरंतर उपयोग करना होगा। लोकतंत्र को ठीक से चलाना एक गहन सामूहिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, जिसे सुचारु रूप देने तथा तंत्र को पारदर्शी एवं जवाबदेह बनाने के लिए लोगों के हाथों में सूचना का अधिकार महत्वपूर्ण अस्त्र है। इसे बचाने के लिए जनता को ही प्रयास और तेज करने पड़ेंगे।


लेखक मजदूर किसान शक्ति संगठन के कार्यकर्ता हैं।




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