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मॉल नहीं मैदान चाहिए

Posted On: 13 Aug, 2012 sports mail में

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मॉल नहीं मैदान चाहिए

खेल मंत्री के नाम एक खुला पत्र

प्रति

श्री अजय माकन

खेल मंत्री

भारत सरकार

हम उन अभागे बच्चों में से एक हैं, जिन्हें खेलने-कूदने के लिए एक अदद मैदान मयस्सर नहीं है। हम ऐसे सभी बच्चों की तरफ से आपसे एक अपील करना चाहते हैं। आपने जब से खेल मंत्रालय की कमान संभाली है, एक के बाद एक अच्छे काम कर रहे हैं। खेल संघों में वर्षों से जमे बैठे प्रशासकों को बाहर निकालने का आपका प्रयास भले ही सफल नहीं हुआ है लेकिन आपके इस कदम के प्रशंसकों की कमी नहीं है। उसी क्रम में आप देश की युवा नीति की भी घोषणा करने वाले हैं। हमारी अपील है कि उस नीति के जरिए आप एक ऐसी राष्ट्रीय संस्था की स्थापना करें, जो देश भर में खेल के मैदानों की सूची बनाएं, उनका अधिग्र्रहण करें, उन्हें विकसित करे और उनकी निगरानी करे।


हमें पता चला है कि ऐसी ही एक संस्था उस ब्रिटेन में भी है, जिसकी राजधानी लंदन में 30वें ओलंपिक खेलों का सफल आयोजन हुआ है। उसका नाम पहले नेशनल प्लेइंग फील्ड्स एसोसिएशन हुआ करता था। 2007 में उसका नाम फील्ड्स इन ट्रस्ट कर दिया गया। वैसे भी ब्रिटेन से हमने बहुत कुछ लिया है। उसकी संसदीय प्रणाली, उसकी नौकरशाही, उसकी सीआरपीसी, आइपीसी…। इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अगर आपके हाथों देश में खेल के मैदानों की निगरानी के लिए ब्रिटेन जैसी ही एक संस्था का जन्म हो जाए तो यह हम बच्चों पर आपका सबसे बड़ा एहसान होगा।


खेल के मैदान के बजाय हम मॉल और मल्टीप्लेक्स के विकास पर कुछ ज्यादा ही ध्यान दे रहे हैं। बच्चों को मॉल नहीं मैदान चाहिए। इसके बिना हम बच्चों का उचित शारीरिक विकास नहीं हो रहा है। घर में बंद रहने और टेलीविजन से चिपके रहने के कारण उनमें हिंसक प्रवृत्ति सहित तमाम नकारात्मक बातें भर रही हैं। खेल-कूद से दूर रहने के कारण बच्चों की शारीरिक क्षमता घट रही है। वे मोटापे का शिकार हो रहे हैं। यहां तक कि उन्हें डायबिटीज जैसी खतरनाक बीमारी अपना शिकार बना रही है। ऐसे बच्चों का भविष्य आपके हाथ में है। हम जानते हैं कि खेल समवर्ती सूची में है। इसलिए खेल के विकास का जिम्मा राज्यों पर है, लेकिन खेल के मैदान को लेकर एक राष्ट्रीय नीति तो होनी चाहिए। जरूरी हो तो संविधान में संशोधन कर खेल को केंद्रीय सूची में भी शामिल किया जाना चाहिए।


जब देश भर के बच्चों को खेल के मैदान उपलब्ध होंगे, तब उनमें से प्रतिभाओं को चुनना और तराशना आसान हो जाएगा। हमें मालूम है कि हम ओलंपिक में पदक जीतने के लिए चीन या रूस की राह पर नहीं चल सकते, जहां निर्मम प्रशिक्षण और बेहिसाब खर्च के जरिए चैंपियन तैयार किए जा सकते हैं। ना ही हम अमेरिका की नकल कर सकते हैं, जहां खेल एक मजहब की हैसियत हासिल कर चुका है। हमें अलग रास्ता अपनाना होगा। इसकी शुरुआत खेल के मैदान और सुविधाओं के विस्तार से की जाए तो अगले दस-पंद्रह साल में सुखद परिणाम देखने को मिलेंगे। निशानेबाजी, तीरंदाजी, कुश्ती और बॉक्सिंग में मिल रही कामयाबी इस बात का सुबूत है कि सुविधा मिले तो हमारे देश के खिलाड़ी भी उम्दा प्रदर्शन कर सकते हैं। अब तो कॉरपोरेट घराने भी खिलाड़ियों को तराशने में सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं।


खेल-कूद की सुविधाएं बढ़ने से सिर्फ अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में मेडल जीतने का उद्देश्य ही पूरा नहीं होगा बल्कि सेहतमंद शरीर में स्वस्थ दिमाग का भी वास होगा। हमें मालूम है कि इस देश में ढेर सारे ऐसे बच्चे भी हैं जिन्हें ठीक से दो जून की रोटी भी नहीं मिलती है, लेकिन उन्हें भी खेलने की सुविधा मिले तो खुश होंगे। इस देश में ऐसे लाखों बच्चे हैं, जिनकी खेल प्रतिभा एक अदद मैदान की कमी के कारण बर्बाद हो रही है। उन सभी बच्चों की एक बार फिर आपसे अपील है कि खेल के मैदानों की देखरेख के लिए एक राष्ट्रीय संस्था के गठन का मार्ग प्रशस्त करें। उस रास्ते पर चल कर बच्चे जरूर इस देश का नाम रोशन करेंगे। ऐसा हुआ तो आपका भी नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा।


इति

खेल के मैदान की सुविधा से वंचित एक बच्चा

………………………………….


हरियाणा की हसरत

आलीशान विदेशी गाड़ियों से चलने वाले किसानों और महिला अधिकारों की खराब दशा जैसे मसलों को लेकर चर्चा में रहने वाला हरियाणा राज्य खेलों के दौरान सकारात्मक वजहों के चलते सुर्खियों में रहता है। हालिया लंदन ओलंपिक में भाग लेने गए 81 भारतीय खिलाड़ियों में से करीब 20 या तो हरियाणा से ताल्लुक रखते हैं या फिर इनकी जड़ें यहां से जुड़ी हुई है। दो साल पहले दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में कुल पदकों में से 60 फीसद यहीं के खिलाड़ियों ने झटका था। यह सब यहां खेल संस्कृति के सकारात्मक विकास से संभव हो सका।


शुरुआत:

चार साल पहले 2008 में बीजिंग ओलंपिक में जब विजेंदर सिंह ने मुक्केबाजी में कांस्य पदक जीता तो हरियाणा सरकार ने खिलाड़ियों के लिए धन और नौकरी देने का प्रस्ताव देकर उन्हें प्रोत्साहित करना शुरू किया। इस कदम से राज्य के युवाओं का झुकाव खेल की तरफ हुआ। इसका नतीजा अब दिख रहा है। इस बार लंदन ओलंपिक के दौरान हरियाणा ने सबसे पहले यह घोषणा की थी कि ओलंपिक में पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को नकद ईनाम दिया जाएगा। स्वर्ण के लिए 2.5 करोड़ रुपये, रजत के लिए 1.50 करोड़ रुपये और कांस्य विजेता को 1 करोड़ रुपये राज्य सरकार की तरफ से दिए जाएंगे।


रोजगार गारंटी:

‘पदक लाओ पद पाओ’ नामक अपनी नई नीति के तहत राज्य सरकार ने ओलंपिक में कोई पदक और एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले खिलाड़ी को द्वितीय श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी पद देने की व्यवस्था की है। इसके अलावा एशियाई खेलों में रजत और कांस्य विजेता, राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण और रजत विजेता और खेल संघों द्वारा आयोजित विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण विजेता खिलाड़ियों के लिए द्वितीय श्रेणी के पद की व्यवस्था है। प्रोफेशनल और टेक्नीकल संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में इनके लिए आरक्षण भी यहां लागू है।

नौकरी प्रस्ताव:

राज्य पुलिस विभाग में 37 नामचीन खिलाड़ियों की नियुक्ति की जा चुकी है। इनमें से पांच डीएसपी, 18 इंस्पेक्टर और 14 सब इंस्पेक्टर पदों पर तैनाती मिली है।


खेलों के लिए धन:

पांच करोड़ की शुरुआती वित्तीय मदद के साथ राज्य ने हरियाणा स्पोट्र्स डेवलपमेंट फंड की स्थापना की है। इसका उद्देश्य खिलाड़ियों के स्वास्थ्य सहायता और प्रशिक्षण से लेकर तमाम जरूरतों के लिए वित्तीय मदद मुहैया कराना है। यह कोश रिटायर हो चुके खिलाड़ियों की भी मदद करता है।


प्रतिभा खोज:

राज्य भर में खेल प्रतिभाओं की खोज के लिए स्पोट्र्स एंड फिजीकल एप्टीट्यूड टेस्ट (स्पैट) का आयोजन किया जाता है। इसका मुख्य मकसद कम आयु में ही प्रतिभावान खिलाड़ियों की पहचान कर लेना है। हर साल संचालित इस प्रणाली से 8-19 साल आयुवर्ग वाले 5000 उच्च क्षमतावान खिलाड़ियों की पहचान करके उन्हें स्पोट्र्स स्कॉलरशिप मुहैया कराने का लक्ष्य है। इसके लिए 10 करोड़ की रकम निर्धारित की गई है। अब तक 25 लाख बच्चे परीक्षा में बैठ चुके हैं।


खेल का अधिकार

हरियाणा सरकार ने एक ऐसा कानून लागू किया है जो स्कूली बच्चों को ज्यादा से ज्यादा शारीरिक गतिविधियों से जुड़े रहने को अनिवार्य बनाता है। स्कूल में प्रत्येक बच्चे के लिए अनिवार्य है कि वह कुछ समय के लिए किसी एक खेल से जुड़ा रहे। मूलभूत खेल सुविधाओं, स्टाफ और उपकरणों को मुहैया कराना स्कूल की जिम्मेदारी है। यह कानून आवासीय कालोनियों पर भी लागू होता है। राज्य ऐसे संगठन तैयार कर रहा है जो खेल में रुचि रखने वाले किसी भी व्यक्ति को प्रशिक्षित कर सके।




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