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जन क्रांति या जन भ्रांति

Posted On: 9 Aug, 2012 Others में

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पुष्पेश पंत, प्रोफेसर, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जेएनयू)

पुष्पेश पंत, प्रोफेसर, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जेएनयू)

जन क्रांति या जन भ्रांति

व्यवस्था परिवर्तन को लक्षित आज के आंदोलनों के नायकों को आप दूसरा या तीसरा गांधी भले ही ना मानें, लेकिन यह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि करोड़ों भारतीयों को वही भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने वाले एकमात्र मसीहा नजर आ रहे हैं। सरकार से खिन्न जनता का जनाक्रोश आज 1942 से कम विस्फोटक नहीं। तब भी यह पूछना तर्कसंगत है कि क्या यह तुलना जायज है?


1942 में दूसरे विश्वयुद्ध के माहौल में गांधी ने नारा दिया ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ और अपने देश वासियों का आह्वान किया ‘करो या मरो’। आम आदमी ने बेहिचक अपना सर्वस्व न्यौछावर कर खुद को आंदोलन में झोंक दिया। अंतत: जिस घटनाक्रम का सूत्रपात ‘अगस्त क्रांति’ ने किया उसने अंग्रेजों को भारत छोड़ने को मजबूर किया। विदेशी शासक के विरुद्ध सभी आसानी से एकजुट हो सके। क्या आज सत्तर साल बाद, आजाद भारत में जनता द्वारा निर्वाचित सरकार को अपदस्थ करने के लिए इस तरह का अभियान सफल हो सकता है या सार्थक है? सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि तब से आज हिंदुस्तान कितना बदल चुका है। आजाद भारत का इतिहास गांधीवादी मूल्यों तथा विचारधारा से निरंतर विमुख होने का रहा है। यह प्रक्रिया नेहरू के जीवन काल में ही शुरू हो गई थी। लोहिया, जयप्रकाश नारायण आदि द्वारा संचालित सत्याग्रहों का दमन औपनिवेशिक शैली में किया गया। कभी धर्मनिरपेक्षता के बहाने तो कभी जनादेश की दुहाई दे यह सरकार अन्ना के आंदोलन को अराजकता फैलाने वाले, सांप्रदायिक तत्वों तथा विदेशी ताकतों द्वारा प्रायोजित कह बदनाम करती रही।


चूंकि 2012 का साल 1942 नहीं है। आज मीडिया को अंग्रेजी राज की तरह सेंसर करना संभव नहीं है। सच है कि स्वदेशी सरकार की तुलना फिरंगी हुक्मरानों से नहीं हो सकती पर यह भी सच है कि यूपीए-2 को ‘अपनी’ सरकार मानने वाले बहुत कम हैं। जनादेश के किसके दावे विश्वसनीय नहीं। यह खुदगर्ज सहयोगियों का लगातार तुष्टीकरण कर डगमगाती बैसाखियों पर लड़खड़ाती सरकार है। अन्ना टीम के साथ वार्ताओं में कपट के कारण इस पर किसी का भरोसा नहीं बचा। इसीलिए आजादी की लड़ाई के दिनों के मूल्य-आदर्श तथा बलिदानी जज्बा शेष न रहने पर भी बूढ़े अन्ना की हल्की सी हुंकार भी सरकार का दिल दहलाने को काफी है। पलक झपकते, मूक मुखर हो सकते हैं तथा अब तक महज तमाशबीन 1942 की तरह ही कारनामा करने या मरने पर आमादा गुस्सैल आंदोलनकारी बन सकते हैं।

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अरविंद मोहन, वरिष्ठ पत्रकार

अरविंद मोहन, वरिष्ठ पत्रकार

उल्टी रणनीति से सीधी लड़ाई

आज के भारतीय आंदोलनों के प्रति बढ़ती देशवासियों की नीरसता के संदर्भ में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर किसी आंदोलन की रणनीति क्या होनी चाहिए। कैसे कोई आंदोलन सफल बनकर अपने लक्ष्य को प्राप्त होता है।


हमारे गांधी बाबा ने अहिंसक सत्याग्रह से सत्ता से टकराने का ऐसा बेजोड़ हथियार खोजा और व्यवहार में लाकर सफल बनाया। उन्होंने बता दिया कि अगर आम लोगों की भागीदारी से बड़ी राजनीतिक लड़ाई लड़नी है तो सत्याग्रह को ही हथियार बनाया जा सकता है। हालांकि इसके लिए भी प्रशिक्षण और बहुत साफ रणनीति चाहिए। बहुत साफ समझ वाला कमांडर चाहिए।  उनके दक्षिण अफ्रीका वाले प्रयोगों का भी बहुत महत्व है लेकिन हमारे यहां चले उनके तीन दशक से ज्यादा लंबे प्रयोग में असफल-सफल होने के टेढ़े-मेढ़े रास्ते में उन्होंने आमरण अनशन नामक ब्रह्मास्त्र का प्रयोग दो या तीन अवसरों पर ही किया। आजादी के बाद अनशन और आमरण अनशन को नाटक बनने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। इसके अच्छे और सफल प्रयोग भी हुए हैं पर  वे अपवाद हैं। इधर के अनेक जनान्दोलनों में सही मंशा और उद्देश्य के लिए भी सीधे आमरण अनशन और जल समाधि लेने जैसे प्रयोगों पर जोर दिया गया। यह मामला पढ़ाई ए-बी-सी-डी से शुरु करने की जगह सीधे एक्स-वाई-ज़ेड पर ही पहुंच जाने जैसा है। कोई तैयारी, कोई आत्मशुद्धि का काम नहीं सीधे मुंह उठाया और आमरण अनशन शुरू कर दिया। भरोसा पुलिस प्रशासन द्वारा वक्त पर दखल देने का तो रहता ही है।


आजादी के बाद के सबसे बड़े जेपी और लोहिया के आंदोलनों में कभी आमरण अनशन  का उल्लेख नहीं मिलता। जेपी आंदोलन में गली गली में धरना-प्रदर्शन, करोडों लोगों के दस्तखत वाला ज्ञापन और बंद, कफ्र्यू जैसे कार्यक्रम बड़े पैमाने पर चले लेकिन आमरण अनशन नहीं हुआ। गांधी, लोहिया और जेपी ने बड़े विस्तार से सत्याग्रही तैयार करने के तरीके और शारीरिक-मानसिक तैयारी का हवाला दिया है। आश्चर्य होता है कि जब हम छापामार युद्ध से व्यवस्था परिवर्तन का रास्ता बताने वाले चे-ग्वेरा को पढते हैं तो पाते हैं कि वे छापामार लडाके में जो गुण चाहते हैं वही शत प्रतिशत गुण गांधी अपने सत्याग्रही में भी चाहते हैं। इसलिए बिना तैयारी, बिना शुरुआती प्रशिक्षण और अनुभव के सीधे आखिरी सीढ़ी पर पहुंचना कभी तो सम्भव हो सकता है लेकिन बड़े और जन आन्दोलन में यह सम्भव नहीं है। आपके उद्देश्य की पवित्रता भी एक चीज है लेकिन लड़ाई के तरीके और कौशल का भी अपना महत्व है।


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जनमत

chart-11942 में आजादी के लिए जो जनआक्रोश था, क्या वह व्यवस्था परिवर्तन के लिए दिख रहा है ?

79% हां

24% नहीं



chart-2क्या आजादी से पहले के आंदोलनों की तुलना में आज के आंदोलनों की धार कुंद हो चली है?

90% हां

10%  नहीं




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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Melia के द्वारा
July 12, 2016

AKAIK yovu’e got the answer in one!

s.p.singh के द्वारा
August 10, 2012

आदरणीय पुष्पेश पन्त जी एक वरिष्ठ शिक्षक ही नहीं महान विचारक भी है पर मैं अल्प बुद्धि व्यक्ति उनसे एक सवाल अवश्य करना चाहूँगा कि क्या आजादी के आन्दोलन कारियों की तुलना आज के आन्दोलन कारियों की कार्य शैली के अनुसार करना उचित है, मुझे कभी कभी आश्चर्य भी होता है जब राजनितिक पार्टिया अपनी भूमिका सही ढंग से नहीं निभा पति और राजनितीक शून्यता/स्वीकार्यता के आभाव किसी पार्टी का जनाधार कम हो गया है तो जनाधार बढ़ने के लिए छद्म आंदोलनों के द्वारा जनाधार बढाने के ये टोने टोटके वाले आंदोलनों के द्वारा परिवर्तन कि आश करना बेमानी ही होगा क्योंकि जानकारी के अनुसार संसदीय लोकतंत्र में सरकारे और व्यस्था परिवर्तन केवल वोटिंग (मतदान) के द्वारा ही संभव है अब अगर जंतर मंतर और राम लीला मैदान से जनाधार बढ़ने के लिए जनता को भ्रमित किया जायेगा और सरकारों को बिल पास करने लिये समय सीमा में बंधा जायगा चौराहों पर संसद लीला कि जायगी तो उसके अंत भी आश्चर्यजनक ही होंगे हाँ जनाधार तो अवश्य ही बढे या न बढे परन्तु सत्ता पक्ष का जनाधार इन बातो से अवश्य ही घटेगा और शायद आंदोलनों का उद्देश्य भी यही है / धन्यवाद.


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