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मुश्किल पटरियों पर लड़खड़ाती रेल

Posted On: 1 Mar, 2012 Others में

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Indian Railways System


रेलवे: देश की जीवन रेखा। एशिया का सबसे बड़ा और किसी एक प्रबंधन के तहत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क। अपनी डेढ़ सौ साल से ज्यादा की विरासत में इसने हमारे जीवन को सुगम बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। कश्मीर से कन्याकुमारी और मुंबई से कोलकाता समेत पूरे देश में आवागमन सुगम करने में रेलवे की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।



रुकावट: बड़ा है तो बेहतर है, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े रेल-तंत्र में शुमार भारतीय रेलवे अब बेहतर नहीं साबित हो रही है। सरकार की उपेक्षा और तमाम अन्य कारणों से रेलवे देशवासियों को बेहतर सेवा देने में असमर्थ हो रही है। अपरिहार्य सुधारों पर ब्रेक ने रेलवे का चक्का जाम कर रखा है। आधुनिकीकरण, संरक्षा, माली हालत, कर्मचारियों की कार्यकुशलता एवं उत्पादकता जैसे सुधारों की वेटिंग लिस्ट अब रिग्रेटेबल हो चली है।



रास्ता: रेलवे को सही ट्रैक पर लाने के लिए हर साल रेल बजट के माध्यम से नई नीतियों और योजनाओं की घोषणा की जाती है। कुछ दिन बाद देश के 81वें रेल बजट के रूप में एक और रेल बजट पेश किया जाना है। अनिल काकोदकर की अध्यक्षता वाली हाई पॉवर सेफ्टी कमेटी ने पहले ही अपनी सिफारिशों में सरकार को साहसिक कदम उठाने के सुझाव दे रखे हैं। ऐसे में रेल मंत्री के समक्ष रेलवे के लंबित सुधारों को गति देने के लिए जरूरी राजस्व जुटाने, रेलवे की बेहतरी, उसकी सुरक्षा और संरक्षा के साथ लोकलुभावन बजट पेश करने की न केवल चुनौती है बल्कि आम जनता के लिए यह बड़ा मुद्दा भी है।



1st Trainभारतीय रेल कई समस्याओं से जूझ रही है। सबसे बड़ी समस्या पुराने ढांचे और तौरतरीकों की है, जिनमें पचास सालों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। पिछले नौ साल से यात्री किरायों में एक रुपये की बढ़ोतरी नहीं हुई है, जबकि इस दौरान महंगाई तीन गुना बढ़ चुकी है। संरक्षा पर गठित डॉ. अनिल काकोदकर समिति के मुताबिक रेलवे में उच्च स्तरों पर हुक्मरानों की संख्या ज्यादा है, जबकि प्रचालन के मोर्चे पर कर्मचारियों की कमी है। जटिल और सख्त प्रक्रियाओं की समस्या से संरक्षा पर तो असर पड़ ही रहा है, उत्पादकता भी प्रभावित हो रही है।


तकनीक के स्तर पर रेलवे में पचास साल में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है। रफ्तार के मोर्चे पर यह दुनिया में सबसे सुस्त है। नई तकनीक व सोच के अभाव में पुराने ढंग के ट्रैक, कोच और वैगनों से काम चलाया जा रहा है। रेलवे क्रासिंगों पर दुर्घटनाएं खासी बढ़ गई हैं, मगर इन पर चौकीदार तैनात करने या ओवरब्रिज/अंडरब्रिज बनाने में हीलाहवाली जारी है। आधुनिकीकरण व विस्तार तथा प्रबंधन योजनाओं के अभाव में ट्रेनों व स्टेशनों पर भीड़ व अव्यवस्था से निपटने के फौरी उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं।


imagesअमेरिका, यूरोप, रूस और चीन के मुकाबले भारतीय रेल की उत्पादकता [प्रति कर्मचारी कमाई] भी बेहद कम है। आजादी के वक्त यातायात में रेलवे का हिस्सा 75 और सड़क का 25 फीसदी था। अब रेल की हिस्सेदारी महज 30 फीसदी रह गई है। कमाई के मुकाबले खर्च बढ़ गए हैं। बढ़ते प्रचालन अनुपात से सौ रुपये की कमाई पर केवल सात रुपये बच रहे हैं। ज्यादातर खर्च वेतन, पेंशन, ईंधन, रखरखाव, कजरें पर ब्याज और लाभांश अदायगी में होता है। यही वजह है कि पिछले कुछ वषरें से मूल्यह्रास आरक्षित निधि [डीआरएफ] और विकास निधि [डीएफ] में अब बहुत कम राशि का प्रावधान हो पा रहा है। पांच साल पहले रेलवे के पास कम से कम 20 हजार करोड़ रुपये का सरप्लस था। आज वह पूरी तरह गायब हो चुका है। ऐसे में आधुनिकीकरण व विस्तार तो दूर, मौजूदा आपरेशंस को चलाए रखना भी मुश्किल हो गया है।


डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर, हाईस्पीड कॉरीडोर, व‌र्ल्डक्लास स्टेशनों, नए इंजन व कोच कारखानों समेत लंबित परियोजनाएं धन की कमी से ही आगे नहीं बढ़ पा रहीं।


निजी क्षेत्र की भागीदारी [पीपीपी] के जरिए तमाम लंबित और नई परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की उम्मीद नाकाम साबित हुई है। रेलवे ने ऐसी परियोजनाओं को ही पीपीपी मॉडल पर ऑफर किया जो गैरलाभकारी थीं। लिहाजा निजी क्षेत्र ने इन्हें नकार दिया। निजी क्षेत्र की अरुचि का दूसरा कारण रेलवे की कड़ी शर्ते हैं। पीपीपी पर रेलवे कई बार अपनी नीति बदल चुकी है। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। [राष्ट्रीय ब्यूरो]


समितियां और सिफारिशें

संरक्षा पर बनीं प्रमुख समितियों की अधिकांश सिफारिशें नहीं लागू हो सकीं.


कुंजरू कमेटी: 1962 में गठित। इसकी सिफारिश पर अनुसंधान व विकास कार्यो के लिए आरडीएसओ की स्थापना हुई। इसने 359 सिफारिशें दीं।


वांचू कमेटी: 1968 में गठित। ज्यादातर दुर्घटनाओं के लिए कर्मचारियों को जिम्मेदार माना और रेलवे ट्रैक की अल्ट्रासोनिक जांच की सिफारिश की। इसने कुल 499 सिफारिशें दीं.


सीकरी कमेटी: 1978 में गठित। रेलवे संरक्षा पर 484 सिफारिशें प्रस्तुत की.


खन्ना कमेटी: 1998 में गठित। विशेष रेल संरक्षा कोष सहित 278 सुझाव दिए.


काकोदकर कमेटी: 2011 में गठित। संरक्षा कार्यों पर एक लाख करोड़ खर्च करने के सहित कुल 122 सिफारिशें.


पित्रोदा कमेटी: आधुनिकीकरण पर यह अपनी रिपोर्ट 27 फरवरी को पेश करेगी.

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