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इस तनातनी में भारत की भूमिका अहम

Posted On: 24 Feb, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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भरत वर्मा (संपादक, इंडियन डिफेंस रिव्यू)

भरत वर्मा (संपादक, इंडियन डिफेंस रिव्यू)

ईरान और इजरायल के बीच जारी तनातनी के बीच भारत फंसता सा दिख रहा है। हालिया तेजी से बदलते घटनाक्रम के बीच भारत को दोनों देशों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों का आकलन करने के बाद सोच-विचार कर कदम उठाना चाहिए।


ईरान के साथ हमारे महत्वपूर्ण संबंध है। सऊदी अरब के बाद ईरान हमारे लिए दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश है। पाकिस्तान द्वारा अनुमति नहीं दिए जाने की स्थिति में अफगानिस्तान मध्य एशिया में भारत की उपस्थिति ईरान के रास्ते से ही हो सकती है। तेल और गैस के प्रचुर संसाधन से भरपूर मध्य एशिया भविष्य की ऊर्जा जरूरतों के लिए बेहद जरूरी है। ऐसे में यदि वक्त रहते हम मध्य एशिया तक पहुंचने में कामयाब नहीं रहते तो चीन इस मामले में बाजी मार सकता है।


इसी तरह अफगानिस्तान से थकी-हारी पश्चिमी फौजों के हटने के बाद भी भारत वहां से हटने का जोखिम नहीं ले सकता। उस दशा में पाकिस्तान की सरपरस्ती में अफगानिस्तान के भीतर कट्टरपंथी ताकतें फिर से हावी हो सकती हैं। काबुल से लेकर इस्लामाबाद तक फैली ये ताकतें भारत की बहु-सांस्कृतिक और बहु-दलीय लोकतंत्र के लिए भयानक खतरा होगा।


इन सबके बीच लाभकारी होने के बावजूद भारत और ईरान के बीच प्रस्तावित गैस या तेल पाइपलाइन अफगानिस्तान और पाकिस्तान के खतरनाक हालात के कारण व्यावहारिक नहीं है। निकट भविष्य में इन हालात के सुधरने की कोई गुंजाइश भी नहीं दिखती।


दूसरी तरफ , भारत के इजरायल के साथ मजबूत रक्षा संबंध हैं। हम इजरायल से बहुत संवेदनशील रक्षा तकनीक खरीदते हैं। साम्यवादी चीन और इस्लामिक कट्टरपंथी शासन से घिरे होने के कारण हमारे लिए ये रक्षा सहयोग बेहद महत्वपूर्ण है। इजरायल को एक छोटा देश मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। इसके कद का आकलन दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के साथ जोड़कर करना चाहिए।


इजरायल को समर्थन देने वाला अमेरिका पश्चिमी देशों के गठबंधन का मुखिया है , जो बेहद ताकतवर देशों का समूह है। इसलिए इजरायल और पश्चिमी गठबंधन एक साथ मिलकर भारत के लिए असाधारण रणनीतिक महत्व के हो जाते हैं। जिनसे भारत को कई प्रकार से लाभ मिल सकता है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि भारत का युवा अपने सुनहरे भविष्य के लिए पश्चिमी देशों का रुख करना ही पसंद करेगा। वह ईरान और चीन जैसे तानाशाह देशों में जाने की ख्वाहिश नहीं रखता। यह सोच दरअसल हमारे और पश्चिम के समान मूल्यों के कारण है।


इसके अतिरिक्त अरब जगत में सुन्नी लोगों का वर्चस्व है। ये शिया देश ईरान को किसी भी सूरत में परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देना चाहते। इसलिए वह चाहते हैं कि अमेरिका , ईरान पर हमला कर दे। भारत अरब जगत के साथ तेल की आपूर्ति समेत कई लाभों के लिए निर्भर है। इसलिए वह भी हमारे लिए समान महत्व का है। इस लिहाज से इजरायल , अमेरिका की अगुआई वाला पश्चिम गठबंधन और अरब जगत (सुन्नी देश) भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक महत्व के हैं। इस बड़े परिदृश्य के महत्व को ध्यान में रखते हुए हमको अपने राष्ट्रीय हित तय करने चाहिए।


भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिसके दुनिया के अधिकांश देशों के साथ दोस्ताना ताल्लुकात हैं। इसलिए यह भारत के हित है कि वह मध्यस्थता की भूमिका निभाते हुए विभिन्न पक्षों के बीच जारी तनातनी को समाप्त करने में अहम भूमिका निभाए।


जनमत


chart-1क्या इजरायली राजनयिक पर हमला भारतीय कूटनीति के लिए नई चुनौती है?

76% हां

24% नहीं





chart-2क्या ईरानी तेल की कीमत पर भारत को इजरायल से और प्रगाढ़ रिश्ते बनाने चाहिए ?

77 %हां

23% नहीं




आप की आवाज

इजरायली राजनयिक पर हमला भारतीय कूटनीति के लिए नई बल्कि कड़ी चुनौती है। भारत सरकार को आतंकी हमले रोकने के लिए अपनी पुरानी नीतियों को छोड़कर नए हल ढ़ूंढने चाहिए।  – राजेश कुमार


भारत को अपने रिश्ते ईरान से बनाए रखने चाहिए। अमरीका ही वास्तव में दुनिया के लिए खतरा है। अरब देशों से भारत को हमेशा ही फायदा रहा है  – फहीम अहमद


19 फरवरी को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “विरोध की वजह” पढ़ने के लिए क्लिक करें.

19 फरवरी को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “पश्चिम एशिया का संकट” पढ़ने के लिए क्लिक करें.

19 फरवरी को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “कूटनीति की अग्निपरीक्षा” पढ़ने के लिए क्लिक करें.

साभार : दैनिक जागरण 19 फरवरी 2012 (रविवार)

नोट – मुद्दा से संबद्ध आलेख दैनिक जागरण के सभी संस्करणों में हर रविवार को प्रकाशित किए जाते हैं.

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