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विरासत की सियासत

Posted On: 15 Dec, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Indian Politicsनेतृत्व: साल 2009। अमेरिका में पहले अश्वेत राष्ट्रपति का चयन। सभी भौचक। एक ही सवाल। आखिर कौन है यह राष्ट्रपति। जी हां, राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार की घोषणा से पहले बहुत कम लोग बराक ओबामा के बारे में जानते थे। निचले स्तर पर स्थापित, सक्षम और कामयाब नेतृत्व का इस तरह से देश की बागडोर संभालकर विश्व पटल पर छा जाना किसी मिसाल से कम नहीं था। यह था लोकतांत्रिक प्रक्रिया का नायाब नमूना। अपवादों को छोड़ दें तो, क्या ऐसे कोई ओबामा किसी गैरराजनीतिक परिवार से यहां भी निचले स्तर से उठकर शीर्ष पर पहुंच सकते हैं?


नामुमकिन: दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत हैं हम। लोकतंत्र को कामयाब बनाने के लिए जिम्मेदार हमारे राजनीतिक दलों में भले ही आंतरिक लोकतंत्र का अभाव दिखता हो, लेकिन लोकतांत्रिक पद्धति से परिवारवाद को बढ़ावा देने में इन्होंने सभी देशों को पीछे धकेल दिया है। देश की अधिकांश पार्टियां किसी खास व्यक्ति या परिवार से जानी जाती हैं। दोनों एक दूसरे का पर्याय बन चुके हैं। ऐसे में किसी व्यक्ति का जो किसी प्रभावी राजनीतिक परिवार का सदस्य या कृपापात्र नहीं हैं, शीर्ष पर पहुंचना असंभव सा दिखता है।


निशानी: राजनीति में परिवारवाद या वंशवाद का मूल भले ही हमारी परंपराओं या सामाजिक ढांचे में छिपा हो, लेकिन अपवादों को छोड़ दें तो यह परंपरा तेजी से फलती-फूलती दिखती है। विश्लेषकों की मानें तो यह प्रवृत्ति एक स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी नहीं है। पांच राज्यों में आसन्न विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक वंशवाद बड़ा मुद्दा बन जाता है।


भारतीय लोकतंत्र की उम्र बढ़ने के साथ सत्ता की सियासत को परिवार की वसीयत बनाने की राजनीतिक अमर लता फल-फूल रही है। बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र में जरूरत जिताऊ उम्मीदवार की हो या युवा नेतृत्व की, चयन अक्सर घर से शुरू होकर घर में ही खत्म होता है। आलम यह है कि पंद्रहवीं लोकसभा में करीब आधे चेहरे ऐसे हैं जिन्हें टिकट पारिवारिक कारणों से मिला। केंद्र में एक दर्जन से ज्यादा मंत्री भी किसी न किसी बड़े राजनीतिक घराने का प्रतिनिधित्व करते हैं। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस इन दिनों नेहरू-गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी के राहुल गांधी का नेतृत्व देखने को बेताब है। कांग्रेस में परिवारवाद की बीमारी लाइलाज हो चुकी है। वहीं कांग्रेस के वंशवाद का विरोध करते-करते भारतीय जनता पार्टी को भी यह रोग लग चुका है। कांग्रेस के विरोध से ही उपजे समाजवादी कुनबे के नेता लालू प्रसाद यादव ने जहां अपने बाद अपनी गृहस्थ पत्नी को मुख्यमंत्री बनाया वहीं उत्तरप्रदेश के चुनावी समर की तैयारी कर रही समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव के साथ बेटे अखिलेश यादव भी पार्टी का नया चेहरा बन चुके हैं। ओडिशा में बीजू पटनायक के बाद उनकी राजनीतिक विरासत के लिए पार्टी ने आखिरकार उनके बेटे नवीन पटनायक को ही सबसे उपयुक्त माना। वहीं कांग्रेस की तुलना में भाजपा में यह बीमारी कुछ कम जरूर है। लेकिन इसका अपवाद अभी तक केवल वाम दल हैं जिनका आधार मजबूत कैडर है।


वरिष्ठ पत्रकार सईद नकवी कहते हैं कि यह समस्या पायदानों में बंटे लगभग पूरे एशिया समाज की है। भारतीय समाज एक पदानुक्रम में बंटा है लिहाजा यहां परिवारवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं। ऐसे में राजनीतिक विरासत को अपने घर में रखने की रीति हर ओर नजर आती है। जम्मू-कश्मीर शेख अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला के बाद उमर अब्दुल्ला की सत्ता देख रहा है। साथ ही मुफ्ती मोहम्मद सईद और बेटी महबूबा सूबे में विपक्षी ताकत हैं। महाराष्ट्र में ठाकरे, पवार वंश के उत्तराधिकारी राजनीतिक बिसात पर अपनी जगह ले चुके हैं। सत्ता और ताकत घराने की सोच को कैसे मजबूत करती है, इसका उदारहरण है कि एक कार्टूनिस्ट से सूबे की सियासत में किंग-मेकर तक का सफर तय कर चुके बाल ठाकरे ने भी वक्त आने पर बेटे उद्धव ठाकरे को ही सबसे योग्य माना। पंजाब में प्रकाश सिंह बादल का लगभग पूरा परिवार राजनीतिक मंच पर है तो चुनावी समर की तैयारी कर रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी परनीत कौर केंद में मंत्री हैं। राजस्थान में विपक्ष में बैठी वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री रहते हुए ही अपने बेटे दुष्यंत सिंह को सांसद बनते देख चुकी थी। हिमाचल में मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल हैं तो बेटे अनुराग ठाकुर सांसद। मध्यप्रदेश का ग्वालियर क्षेत्र परिवारवादी राजनीति का नमूना है। राजमाता सिंधिया और उनकी बेटियों ने भाजपा के लिए संसद में गिनती बढ़ाई तो बेटे माधवराव सिंधिया और फिर ज्योतिरादित्य सिंधिया हमेशा ही कांग्रेस के लिए एक सीट की गारंटी रहे।


उत्तर और दक्षिण भारत के बीच यूं तो कई सांस्कृतिक अंतर हैं लेकिन परिवार केंद्रित राजनीतिक संस्कृति विंध्याचल के दोनों ओर एक समान है। तमिलनाडु में कलैगनार कुनबा और उसकी अंदरूनी सियासत प्रदेश ही नहीं राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करती रही है। सूबे की सत्ता में बैठी अन्नाद्रमुक पार्टी में एमजी रामचंद्रन की राजनीतिक विरासत पत्नी के बजाए प्रेमिका जे जयललिता के हाथ लगी जो एकाधिकार की शक्ल में बरकरार है। आंध्र प्रदेश में फिल्म अभिनेता एनटी रामाराव के ब्रांडनेम पक्ष और विपक्ष दोनों खेमों में नजर आते है। बेटी डी पुरंदेश्वरी कांग्रेस की केंद्र सरकार में मंत्री हैं तो दामाद चंद्रबाबू नायडू विपक्ष की तेलगुदेशम पार्टी के बरसों से मुखिया हैं। सूबे में कांग्रेस पार्टी फिलहाल इस बात का संकट झेल रही है कि उसने परिवारवाद का रथ रोक दिया। हेलीकॉप्टर हादसे में मारे गए मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के बाद पार्टी ने बेटे जगन मोहन रेड्डी को सीधे मुख्यमंत्री बनाने से इंकार किया तो उसे विभाजन झेलना पड़ा।  परिवारवाद की वकालत करने वालों के तर्क हैं कि बड़े नेता की संतान हो या सहोदर या फिर पत्नी। संसद या विधानसभा में तो चुनाव की अग्नि परीक्षा से ही होकर गुजरते हैं।…और किसी व्यक्ति को केवल इस आधार पर राजनीति में आने से कैसे रोका जा सकता है कि वो किसी बड़े नेता के परिवार से आता है। भारतीय राजनीति में व्यक्ति की बजाए पार्टी के द्वारा परिवारवाद के बढ़ावा देने के नमूने भी कम नहीं है। इतिहास में वो समय अभी ज्यादा दूर नहीं गया है जब सोनिया गांधी को राजनीति में लाने और कांग्रेस पार्टी की कमान सौंपने के लिए पार्टी ने मिन्नतें की। कांग्रेस अपने मानस में इस बात को स्थापित कर चुकी है कि केवल परिवार ही पार्टी को एक रख सकता है। भाजपा और वामदलों के अलावा हर पार्टी में नेतृत्व व्यक्ति या परिवार आधारित है। लिहाजा पार्टी परिवारवाद में अपना वजूद और भविष्य देखती है।


ऐसे में सवाल यह भी है कि आखिर हमें परिवारवादी राजनीति को हटाने की जरूरत भी है क्या? जानकार कहते हैं कि परिवार आधारित समाज आधुनिकीकरण के साथ जब व्यक्ति आधारित होगा तो स्थिति में सुधार होगा। इस बात से भी इनकार नहीं  कि एक अरब 22 करोड़ लोगों की आबादी वाले भारत में कुछ लोगों को छोड़ दें तो अधिकतर जनता को परिवार और उसके युवराजों से ज्यादा फर्क भी नहीं पड़ता।


इस आलेख के लेखक प्रणय उपाध्याय हैं


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साभार : दैनिक जागरण 11 दिसंबर 2011 (रविवार)

नोट – मुद्दा से संबद्ध आलेख दैनिक जागरण के सभी संस्करणों में हर रविवार को प्रकाशित किए जाते हैं.




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