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कानून से ज्यादा नैतिक निर्माण की जरूरत

Posted On: 8 Nov, 2011 Others में

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imtiyaz ahmedधीरे-धीरे एक आम भावना घर करती जा रही है कि हर समस्या का हल कानून बनाकर किया जा सकता है। अन्ना हजारे और उनके सहयोगी भ्रष्टाचार को रोकने या खत्म करने के लिए एक मजबूत कानून पारित कराना चाहते हैं। कुछ लोग चाहते हैं कि सांसदों को वापस बुलाने के लिए कानून बने। इसी फेहरिस्त में नागरिकों की शिकायतों की तरफ प्रशासन को उत्तरदायी बनाने के लिए और निचले स्तर की नौकरशाही से भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए सरकार एक और कानून बनाने जा रही है। जन शिकायत निवारण अधिकार विधेयक-2011 नामक इस प्रस्तावित कानून का मसौदा जारी किया जा चुका है।


किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज में कानून की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक तरफ समाज में जुर्म रोकने के लिए तो दूसरी तरफ समाज में एक नई चेतना उजागर करने के लिए। एक जमाने से इस देश में पहले शारदा एक्ट और बाद में बाल विवाह निषेध कानून मौजूद हैं, लेकिन बाल विवाह का अस्तित्व आज भी कायम है। हालांकि इन कानूनों द्वारा एक चेतना आम हुई है कि बाल विवाह आज एक आपत्तिजनक परंपरा है।


भ्रष्टाचार और प्रशासन का नागरिकों की शिकायतों की तरफ नकारात्मक रवैया आम हिंदुस्तानी की रोजमर्रा की जिंदगी का अनुभव है। उसके लिए नए कानून बनाकर चेतना उजागर करने की आवश्यकता तो है नहीं। यह एक बड़ा सवाल है कि जन लोकपाल कानून या जन शिकायत निवारण अधिकार विधेयक या सांसदों को वापस बुलाने वाला कानूनी प्रावधान भ्रष्टाचार को रोकने या अपने मकसद को हल करने में किस हद तक सफल होंगे। अभी तक का अनुभव यही बताता है कि हर नया कानून मुकदमेबाजी बढ़ाता है, लोगों को न्याय या नागरिकों की समस्याओं का निवारण नहीं करता है। ये विधेयक यदि पारित भी कर दिए जाएं तो मुकदमेबाजी ही बढ़ेगी। इससे ज्यादा कुछ नहीं होगा।


भ्रष्टाचार और नागरिकों की शिकायतों की तरफ प्रशासन की उदासीनता सामाजिक और नैतिक समस्याएं हैं। हमारे समाज का ढांचा भ्रष्टाचार और दूसरों की तरफ उदासीनता पर आधारित है। जब हम मन्नत मांगते समय भगवान या खुदा से कहते हैं कि हमारा फलां काम सफल कर दीजिए। हम आपको प्रसाद या चादर या मुकुट चढ़ाएंगे। यह प्रवृत्ति भी तो एक तरह से भगवान को धूस देने की तरह है। वास्तविकता यही है कि धार्मिकता के मापदंड स्वयं भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करते हैं। धर्म की बात न भी करें तो सामान्य जीवन में हम परिवार में ही भ्रष्टाचार का सबक अपने बच्चों को सिखाते हैं।


पिता द्वारा बेटे या बेटी को मां से न बताने की हिदायत देते हुए आइसक्रीम खाने को देना भी भ्रष्टाचार है। यही प्रवृत्ति आगे चलकर उस बच्चे को भ्रष्टाचार के लिए प्रेरित करती है। जब तेज बाइक चलाने या हेलमेट न पहनने के लिए यातायात पुलिस उसे रोकती है तो वह यही सोचता है कि क्यों न कुछ ले-देकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाय।


आम अवधारणा है कि नेता बेईमान हैं, उनके ऊपर अंकुश लगाने की जरूरत है। हम यह सवाल अपने से नहीं करते कि नेता को भ्रष्ट कौन बनाता है। हमीं तो अपने सही या गलत काम करवाने के लिए उनको रिश्वत देते हैं। सच तो यह है कि नागरिक की तरफ प्रशासन का रवैया मजबूर करता है कि काम करवाने के लिए हम घूस दें। ऐसी परिस्थिति में समाज के पुन: नैतिक निर्माण के बिना देश की संबंधित समस्याओं का समाधान मुश्किल है।[प्रो. इम्तियाज अहमद, जाने-माने राजनीतिक समाजशास्त्री]


06 नवंबर को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “सिटिजन चार्टर की हकीकत”  पढ़ने के लिए क्लिक करें.

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06 नवंबर को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “शिकायत की सुनवाई से कार्रवाई तक!”  पढ़ने के लिए क्लिक करें.

06 नवंबर को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “दस के दम से भ्रष्टाचार बेदम!”  पढ़ने के लिए क्लिक करें.

साभार : दैनिक जागरण 06 नवंबर 2011 (रविवार)

नोट – मुद्दा से संबद्ध आलेख दैनिक जागरण के सभी संस्करणों में हर रविवार को प्रकाशित किए जाते हैं.




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