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सिफारिशें: कुछ खट्टी तो कुछ मीठी

Posted On: 5 Sep, 2011 Others में

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एक दिसंबर, 2010 को ज्यूडीशियल स्टैंडर्ड एंड अकाउंटबिलिटी बिल, 2010 को लोकसभा में पेश किया गया था। 30 दिसंबर, 2010 को राज्यसभा सभापति ने इस बिल को कार्मिक, लोक शिकायत, कानून एवं न्याय मामलों की संसदीय समिति के पास विचारार्थ भेज दिया। समिति ने 30 अगस्त को संसद के दो सदनों के पटल पर अपनी रिपोर्ट रखी। पेश है, उस रिपोर्ट के मुख्य अंश:-


MP900305894न्यायिक मानदंडों की आचार संहिता

1. ओपन कोर्ट में किसी केस की सुनवाई के दौरान जजों को अन्य संवैधानिक/ वैधानिक निकायों/संस्थाओं/ व्यक्तियों के खिलाफ अवांछित टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

2. बिल में कहा गया है कि बार के किसी भी सदस्य से जज के नजदीकी संबंध नहीं होने चाहिए। इस संदर्भ में नजदीकी संबंध स्पष्ट रूप से व्याख्यायित नहीं होता। इसके कई अर्थ निकल सकते हैं। लिहाजा कमेटी के अनुसार इसकी जगह नजदीकी सामाजिक संपर्क (क्लोज सोशल इंटरेएक्शन) का प्रयोग किया जाना चाहिए।


संपत्ति की घोषणा

कमेटी ने बिल से इस बात पर पूर्णतया सहमति प्रकट की है कि जजों द्वारा अपनी संपत्ति घोषित करना उनका वैधानिक दायित्व है। कमेटी के अनुसार इससे न्यायपालिका में व्यापक पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।


ज्यूडीशियरी ओवरसाइट कमेटी

नेशनल ज्यूडीशियल ओवरसाइट (निरीक्षण) कमेटी का गठन किया जाना चाहिए। इस कमेटी में सरकार के तीनों अंगों (कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका) का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि इस कमेटी के गठन से अभियोग प्रक्रिया के संबंध में संसद की निर्णायक शक्तियां प्रभावित नहीं होंगी। किसी जज के खिलाफ शिकायत होने की दशा में यह कमेटी महज प्राथमिक चरण का काम करेगी, जहां पर संबंधित जज के खिलाफ शिकायत का भविष्य तय होगा।


शिकायत जांच पैनल

बिल के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के किसी जज के खिलाफ मामले की जांच के लिए बने पैनल में देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश समेत सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीश होंगे। इन दोनों जजों को मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित किया जाएगा। इसी तरह हाई कोर्ट के पैनल में उस हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश समेत हाई कोर्ट के दो जज होंगे। इन दोनों जजों को उस हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नियुक्त किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के किसी जज के खिलाफ मामले की जांच के लिए संबंधित कोर्ट में जो पैनल बनाया जाएगा उसमें जज के खिलाफ मामले की जांच उसके सहयोगी न्यायाधीश ही करेंगे। यह पैनल बेहद निर्णायक अहमियत का होगा क्योंकि इसकी सिफारिश के बाद ही मामला ओवरसाइट कमेटी के पास जाएगा। न्यायिक स्वतंत्रता के नाम पर सीएसपी में केवल न्यायपालिका के सदस्य ही नहीं होने चाहिए बल्कि गैर-न्यायिक सदस्यों को भी शामिल किया जाना चाहिए।


जांच कमेटी

किसी जज के खिलाफ कदाचार के मामले की जांच के लिए ओवरसाइट कमेटी द्वारा जांच कमेटी का गठन किया जाएगा। लेकिन, स्थायी कमेटी ने इसके गठन संबंधी प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि ओवरसाइट कमेटी को इस संबंध में कोई दिशानिर्देश नहीं सुझाए गए हैं जिसके आधार पर जांच कमेटी का गठन किया जाएगा।


जजों की नियुक्ति

कमेटी के अनुसार इस बिल में समस्याओं का आंशिक समाधान ही खोजा गया है और जजों की नियुक्ति संबंधी मुख्य मुद्दा अभी बाकी ही है। उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति इस वक्त सबसे अहम मसला है। कमेटी के अनुसार इस अहम मसले पर सरकार को यथाशीघ्र ध्यान देने की जरूरत है।


04 सितंबर को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “जन जागरण अभियान”  पढ़ने के लिए क्लिक करें.

04 सितंबर को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “कानून के रखवालों के लिए कानून”  पढ़ने के लिए क्लिक करें.

04 सितंबर को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “जजों की नियुक्ति”  पढ़ने के लिए क्लिक करें.

04 सितंबर को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “आखिर क्यों उठे सवाल!”  पढ़ने के लिए क्लिक करें.


साभार : दैनिक जागरण 04 सितंबर 2011 (रविवार)

नोट – मुद्दा से संबद्ध आलेख दैनिक जागरण के सभी संस्करणों में हर रविवार को प्रकाशित किए जाते हैं.




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