blogid : 4582 postid : 945

क्या बढ़ रही है संसद और समाज के बीच दूरी!

  • SocialTwist Tell-a-Friend

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा,

वृद्धा न ते यो न वदन्ति धर्मम्।

धर्म: स नो यत्र न सत्यमस्ति,

सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति।


संसद की लिफ्ट संख्या एक के पास वाले गुंबद पर लिखा गया महाभारत महाकाव्य का यह सूत्रवाक्य इसकी श्रेष्ठता एवं सर्वोच्चता और महत्ता को समझाने के लिए काफी है। इसका मतलब है कि वह कोई सभा नहीं है जिसमें अनुभवी लोग शामिल न हों। और वह वरिष्ठ नहीं है जो धर्म की बात न करता हो। वह धर्म नहीं है जिसमें सत्य न कहा जाय और वह सत्य नहीं होता जिससे कोई व्यक्ति छल-कपट और धोखाधड़ी की ओर उन्मुख हो।


par13-2विभिन्न धर्मग्रंथों के ऐसे तमाम सूत्रवाक्य हमारी संसद की प्राचीरों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं जो न केवल संसद की श्रेष्ठता एवं सर्वोच्चता दर्शाते हैं बल्कि उसके सदस्यों को इसकी महत्ता बरकरार रखने को भी प्रेरित करते हैं। एक जमाना था, जब लोग संसद की कार्यवाही को सांस रोककर देखते थे। अब शायद ऐसा नहीं हो रहा है। लोगों को शायद अब यह तमाशा ज्यादा लगने लगा है। और वे खुद तमाशबीन नहीं बनना चाहते हैं। किसी भी मसले पर संसद को सर्वोच्च बताने वाले हमारे माननीय राजनेताओं को इस मसले पर गहन आत्ममंथन करने की जरूरत हो सकती है कि कहीं संसद के भीतर उनके आचरण से तो ऐसी स्थिति नहीं उत्पन्न हुई। आखिर वे कौन से कारण हैं जिसके चलते समाज और संसद के बीच दूरी पैदा हुई है? क्या केवल कहने मात्र से संसद की सर्वोच्चता बरकरार रहेगी? या फिर संसद को अपने कृतित्व से भी खुद को साबित करना होगा। अगर ऐसा नहीं होता तो एक सक्षम लोकपाल कानून पारित करने के लिए सिविल सोसाइटी के लोगों को इतनी जिद्दोजहद क्यों करनी पड़ती।


sudha paiजवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज में प्रोफेसर सुधा पई का मानना है कि संसद एक तरह से समाज का प्रतिबिंब होना चाहिए। आखिर वहीं से आए लोगों से संसद बनती है। जाहिर सी बात है कि समाज का असर कहीं न कहीं संसद पर देखा जा सकता है। यही बात समाज के लिए भी लागू हो सकती है। संसद में माननीय सांसदों के आचार-व्यवहार और बर्ताव का असर हमारे समाज पर भी पड़ता है। ध्यान रहे कि आज भी राजनेता लोगों के रोल मॉडल हैं। उनके हर एक अच्छे-बुरे कार्य व्यवहार एवं आचरण का हमारे समाज पर गहरा असर जाता है। सूचना तकनीक के आधुनिक जमाने में हमारे राजनेताओं के कार्य-व्यवहार को देख और सुन पाना बहुत सरल हो गया है। लोगों की रग-रग में बसी राजनीति पर हमेशा उनकी नजर होती है।


JSC-Informal photo-Feb 10, 2008वहीं चुनाव सुधारों के लिए सतत प्रयासरत संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉ‌र्म्स के संस्थापक सदस्य जगदीप छोकर का मानना है कि संसद समाज का पूरा प्रतिबिंब नहीं है। यह अत्यंत दुखदायक बात है कि समाज अब संसद को एक रोल मॉडल के रूप में नहीं देखता। आज के लोग संसदीय कार्यवाही को सांस रोककर नहीं देखते या इस प्रवृत्ति में कमी आई है, क्योंकि हमारे सांसद शायद यह भूल चुके हैं कि अपनी इज्जत अपने हाथ है। सदन के अंदर उनका व्यवहार भी चिंताजनक है। मेरे विचार में इसके लिए राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं, क्योंकि चुनाव में उम्मीदवारों का चयन यही राजनीतिक दल ही करते हैं।


31 जुलाई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “गिरती साख!” पढ़ने के लिए क्लिक करें.

31 जुलाई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “खास है यह मानसून सत्र” पढ़ने के लिए क्लिक करें.

31 जुलाई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “संसद भवन का इतिहास” पढ़ने के लिए क्लिक करें.

31 जुलाई को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “संसदीय गरिमा का सवाल!” पढ़ने के लिए क्लिक करें.


साभार : दैनिक जागरण 31 जुलाई 2011 (रविवार)

नोट – मुद्दा से संबद्ध आलेख दैनिक जागरण के सभी संस्करणों में हर रविवार को प्रकाशित किए जाते हैं.




Tags:             

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

160 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran