blogid : 4582 postid : 392

सिमट-सिमट जल भरहिं तलावा

Posted On: 26 Apr, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

  • SocialTwist Tell-a-Friend


सैकड़ों, हजारों तालाब अचानक शून्य से प्रकट नहीं हुए थे। इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की, तो दहाई थी बनाने वालों की। यह इकाई, दहाई मिलकर सैकड़ा, हजार बनती थी। पिछले दो सौ बरसों में नए किस्म की थोड़ी सी पढ़ाई पढ़ गए समाज ने इस इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार को शून्य ही बना दिया। इस नए समाज के मन में इतनी उत्सुकता भी नहीं बची कि उससे पहले के दौर में इतने सारे तालाब भला कौन बनाता था। उसने इस तरह के काम को करने के लिए जो नया ढांचा खड़ा किया है, आइआइटी का, सिविल इंजीनियरिंग का, उस पैमाने से, उस गज से भी उसने पहले हो चुके इस काम को नापने की कोई कोशिश नहीं की।

वह अपने गज से भी नापता तो कम से कम उसके मन में ऐसे सवाल तो उठते कि उस दौर की आइआइटी कहां थी? कौन थे उसके निर्देशक? कितना बजट था, कितने सिविल इंजीनियर निकलते थे? लेकिन उसने इस सब को गए जमाने का गया-बीता काम माना और पानी के प्रश्न को नए ढंग से हल करने का वायदा भी किया और दावा भी। गांवों, कस्बों, की तो कौन कहे, बड़े शहरों के नलों में चाहे जब बहने वाला सन्नाटा इस वायदे और दावे पर सबसे मुखर टिप्पणी है। इस समय के समाज के दावों को इसी समय के गज से नापें तो कभी दावे छोटे पड़ते हैं तो कभी गज ही छोटा निकल आता है।

 

************

 

एकदम महाभारत और रामायण काल के तालाबों को अभी छोड़ दें, तो भी कहा जा सकता है कि कोई पांचवीं सदी से पंद्रहवीं सदी तक देश के इस कोने से उस कोने तक तालाब बनते ही चले आए थे। कोई एक हजार वर्ष तक अबाध गति से चलती रही इस परंपरा में पंद्रहवीं सदी के बाद कुछ बाधाएं आने लगी थीं, पर उस दौर में भी यह धारा पूरी तरह से रुक नहीं पाई, सूख नहीं पाई। समाज ने जिस काम को इतने लंबे समय तक बहुत व्यवस्थित रूप में किया था, उस काम को उथल-पुथल का वह दौर भी पूरी तरह से मिटा नहीं सका। अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के अंत तक भी जगह-जगह पर तालाब बन रहे थे।

लेकिन फिर बनाने वाले लोग धीरे-धीरे कम होते गए। गिनने वाले कुछ जरूर आ गए पर जितना बड़ा काम था, उस हिसाब से गिनने वाले बहुत ही कम थे और कमजोर भी। इसलिए ठीक गिनती भी कभी हो नहीं पाई। धीरे-धीरे टुकड़ों में तालाब गिने गए, पर सब टुकड़ों का कुल मेल कभी बिठाया नहीं गया। लेकिन इन टुकड़ों की झिलमिलाहट पूरे समग्र चित्र की चमक दिखा सकती है।

 

************

 

जहां सदियों से तालाब बनते रहे हैं, हजारों की संख्या में बने हैं-वहां तालाब बनाने का पूरा विवरण न होना शुरू में अटपटा लग सकता है, पर यही सबसे सहज स्थिति है। ‘तालाब कैसे बनाएं’ के बदले चारों तरफ ‘तालाब ऐसे बनाएं’ का चलन था।

 

************

 

तालाब एक बड़ा शून्य है अपने आप में। लेकिन, तालाब पशुओं के खुर से बन गया कोई ऐसा गढ्ढा नहीं है कि उसमें बरसात का पानी अपने आप भर जाए। इस शून्य को बहुत सोच-समझ कर, बड़ी बारीकी से बनाया जाता रहा है।

बादल उठे, उमड़े और पानी जहां गिरा, वहां कोई एक जगह ऐसी होती है जहां पानी बैठता है। एक क्रिया है : आगौरना यानी एकत्र करना। इसी से बना है आगौर। आगौर तालाब का वह अंग है, जहां से उसका पानी आता है। यह वह ढाल है, जहां बरसा पानी एक ही दिशा की ओर चल पड़ता है। इसका एक नाम पनढालं भी है। इस अंग के लिए इस बीच में, हम सबके बीच, हिंदी की पुस्तकों, अखबारों, संस्थाओं में एक नया शब्द चल पड़ा है-जलागम क्षेत्र।

आगौर का पानी जहां आकर भरेगा, उसे तालाब नहीं कहते। वह है आगर। तालाब तो सब अंग-प्रत्यगों का कुल जोड़ है। आगर यानी घर, खजाना। तालाब का खजाना है आगर, जहां सारा पानी आकर जमा होगा।

 

************

 

आज तालाबों से कट गया समाज, उसे चलाने वाला प्रशासन तालाब की सफाई और गाद निकालने का काम एक समस्या की तरह देखता है और वह इस समस्या को हल करने के बदले तरह-तरह के बहाने खोजता है। उसके नए हिसाब से यह काम खर्चीला है। कई कलेक्टरों ने समय-समय पर अपने क्षेत्र में तालाबों से मिट्टी नहीं निकाल पाने का एक बड़ा कारण यही बताया है कि इसका खर्च इतना ज्यादा है कि उससे तो नया तालाब बनाना सस्ता पड़ेगा। पुराने तालाब साफ नहीं करवाए गए और नए तो कभी बने ही नहीं। गाद तालाबों में नहीं नए समाज के माथे में भर गई है। तब समाज का माथा साफ था। उसने गाद को समस्या की तरह नहीं बल्कि तालाब के प्रसाद की तरह ग्रहण किया था।

 

“अनुपम मिश्र की कालजयी पुस्तक
‘आज भी खरे हैं तालाब’ से साभार”

 

बोतल में बंद हुए ताल तलैया

मौजूदा जल संकट के लिए कोई एक नहीं हम सब दोषी हैं। खुद तो नदी, तालाब, पोखर और कुएं जैसे जलस्नोत बना नहीं पाए, जो विरासत में मिला था उसे भी नहीं सहेज सके। लिहाजा इन जलस्नोतों में से अधिकांश विलुप्त होकर हमें बोतलबंद पानी के सहारे छोड़ गए।

24 अप्रैल को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “मर रहा है आंखों का पानी” पढ़ने के लिए क्लिक करें

24 अप्रैल को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “बाढ़-सूखे का इलाज है पाल-ताल-झाल” पढ़ने के लिए क्लिक करें

24 अप्रैल को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “बिन पानी सब सून” पढ़ने के लिए क्लिक करें

24 अप्रैल को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “जनमत – जल संकट” पढ़ने के लिए क्लिक करें

साभार : दैनिक जागरण 24 अप्रैल 2011 (रविवार)
नोट – मुद्दा से संबद्ध आलेख दैनिक जागरण के सभी संस्करणों में हर रविवार को प्रकाशित किए जाते हैं.

| NEXT



Tags:               

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

1 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Zaylin के द्वारा
July 12, 2016

Sorry to hear about your Computer problems.. NOT FUN AT ALL.. I have today managed to understand just a TINY little bit of the new Blogspot users.. -well do not know what to call it.. but I guess you have the New page in your blog too.. I hate it..But I doo love your New Card.. So Super Cute.. And that you have managed to use an Old Magnolia, and made it look so Good.. WOW.. I love the Background stamp.. I Want that one too.. :o ) :o aui)utefBl colors and Coloring.. Great Card! :o )


topic of the week



latest from jagran