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सुशासन के लिए जरूरी है न्यायिक सक्रियता

Posted On: 14 Feb, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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जेएस वर्मा (पूर्व मुख्य न्यायाधीश)

जेएस वर्मा (पूर्व मुख्य न्यायाधीश)

कानून का शासन कायम रखने के लिए न्यायिक सक्रियता बहुत जरूरी है। जब सरकार के अन्य अंग कानून में दिए गए अपने दायित्वों का निर्वाह नहीं करते तब न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने की जरूरत पड़ती है। न्यायिक सक्रियता के नाम पर इसकी आलोचना करने वालों को समझना चाहिए कि आखिर न्यायालय को क्यों दखल देना पड़ रहा है। बेहतर हो कि वे न्यायालय के आदेश के बगैर अपना काम करें और कानून व संविधान में दी गई जिम्मेदारियों का निर्वाह करें।

संविधान में सरकार के तीनों अंगों के कार्यक्षेत्र निश्चित हैं। विधायिका कानून बनाती है कार्यपालिका उसे लागू करती है और न्यायपालिका कानून की व्याख्या करती है। आमजनता सरकारी तंत्र की अकर्मण्यता से निराश होकर उम्मीद की आस लिए न्यायालय पहुंचती है। अगर न्यायपालिका भी उसे निराश कर देगी तो लोग अपनी समस्याएं निपटाने के लिए गैर न्यायिक तरीके अपनाने लगेंगे जो बहुत खतरनाक स्थिति होगी।

संविधान में न्यायपालिका को हर काम और प्रत्येक फैसले की न्यायिक समीक्षा का अधिकार प्राप्त है। इतना ही नहीं संविधान में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को रिट ज्युरिडिक्शन मिला है। यानी कोई भी व्यक्ति जिसके जीवन, स्वतंत्रता, समानता आदि से जुड़े मौलिक अधिकार का हनन हुआ हो वह सीधे रिट याचिका दाखिल कर न्यायालय से मदद की गुहार लगा सकता है। इसी क्षेत्राधिकार में जनहित याचिकाएं भी आती हैं। संविधान के अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 142 में सुप्रीम कोर्ट को कोई भी आदेश पारित करने का विशेष अधिकार प्राप्त है और उस आदेश की अहमियत कानून के बराबर होगी।

न्यायपालिका का कर्तव्य है कि वह जनता की परेशानियों पर ध्यान दे, उनका निराकरण करे। कानून का शासन बनाये रखने के लिए यह जरूरी है, लेकिन समस्याओं का हल निकालते समय उसे याद रखना चाहिए कि वह सरकार के दूसरे तंत्रों का काम स्वयं न करने लगे। न्यायपालिका को कानून के मुताबिक काम करने का निर्देश देना चाहिए। यह न्यायिक सक्रियता नहीं  बल्कि उचित न्यायिक प्रक्रिया है।

जो लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं उन्हें देखना चाहिए कि वे अपना काम क्यों नहीं कर रहे। उदाहरण के तौर पर न्यायालय सीबीआइ जांच की निगरानी करता है। आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी? क्योंकि सीबीआइ स्वतंत्र होकर काम नहीं करती वह राजनैतिक निर्देशों के मुताबिक चलती है। जैसे राजनैतिक समीकरण होते हैं वह वैसे ही व्यवहार करती है। इससे ज्यादा और क्या होगा कि कोर्ट में अर्जी दाखिल कर कहा जाता है कि जो कार्यवाही उसने शुरू की थी अब वह उसे वापस लेना चाहती है। अगर सरकार के बाकी तंत्र अपने कामों को ठीक ढंग से करते रहेंगे तो न्यायपालिका को कभी दखल देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। न्यायपालिका को हदों में रहने की नसीहत देने से पहले उन्हें अपने भीतर झांकना होगा।

(माला दीक्षित से बातचीत पर आधारित)


बढ़ी है न्यायिक सक्रियता


मनीष तिवारी (प्रवक्ता, कांग्रेस)


यह सही है कि कार्यपालिका की अक्षमता और राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते ही न्यायिक सक्रियता बढ़ी है। लोकतांत्रिक प्रणाली में चुनी हुई सरकार लोगों को इंसाफ दिलाने का पहला पड़ाव होती है। जब कोई सरकार जनता को न्याय दिलाने और पारदर्शिता के अपने मूलभूत कर्तव्य का पालन करने में नाकाम रहती है तब लोग अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। हम 62 वर्षों में अपनी प्रशासनिक प्रणाली में बदलाव नहीं ला पाए। हमारी लास्ट मील डिलीवरी यानी योजनाओं और लाभों को अंतिम छोर तक पहुंचाने के काम में यह ढांचा पूरी तरह विफल हुआ और इसीलिए लोग न्याय की आस लेकर अदालत जाते हैं। अदालत वही कर रही है जो उसे करना चाहिए। अगर सरकार कानून व्यवस्था और न्याय करने में असफल रहती है तो उस अंतर को भरने का काम न्यायपालिका करती है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है।


न्यायपालिका सही दिशा में काम कर रही है क्योंकि न्यायपालिका स्वयं संज्ञान लेकर आदेश नहीं पारित करती। कुछ मामलों में जरूर अदालत स्वयं संज्ञान लेती है लेकिन वे अलग तरह के होते हैं। इस तरह की न्यायिक सक्रियता से प्रशासनिक प्रणाली सुधार की तरफ सोचने को मजबूर होगी। दोष राजनेताओं पर मढ़ा जाता है लेकिन वास्तव में दोषी अफसरशाही है क्योंकि कार्यान्वयन की जिम्मेदारी उन्हीं पर होती है। लेकिन उन्हें तो चुनाव लड़ने के लिए जनता के बीच जाना नहीं पड़ता वे एक बार सेवा में आ गये तो नौकरी पक्की रहती है। जनता के बीच नेता जाते हैं जिन्हें खामियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। हां राजनेता इतने जरूर दोषी हैं कि वे अब तक देश की प्रशासनिक प्रणाली नहीं सुधार पाये।


कार्यपालिका की नाकामी है वजह


विजय हंसारिया (वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट)

जब कार्यपालिका अपने कर्तव्यों का पालन उचित ढंग से नहीं करती तो न्यायिक सक्रियता देखने को मिलती है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि अगर कार्यपालिका अपने दायित्वों का निर्वहन उचित ढंग से करे तो जनहित याचिका के माध्यम से न्यायिक सक्रियता की जरूरत ही नहीं होगी।


परंपरागत रूप से दो पक्षों के बीच विवादित मसले को सुलझाने के कर्तव्य से भी बढ़कर कोर्ट ने अपने फलक को विस्तृत करते हुए जनहित से जुड़े तमाम मुद्दों को सुलझाने की कोशिश की है। जनहित याचिकाओं पर पहल करते हुए अदालतों ने वन एवं खदान, प्रदूषण नियंत्रण और नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए आदेश जारी कर हमारे पर्यावरण को बचाने का प्रयास किया है। न्यायिक सक्रियता ने यह भी सुनिश्चित किया है कि सत्ता में बैठे लोग अपने राजनीतिक संबंधों का लाभ उठाकर मनमानी न कर सकें। इसी संबंध में वह कई आपराधिक मामलों की जांच की निगरानी भी कर रही है। सामाजिक कल्याण के तमाम विधानों को लागू करवाने की दिशा में भी कोर्ट ने तेजी दिखाई है।


अब सवाल यह उठता है कि यह सक्रियता किस हद तक जा सकती है और इसकी दिशा क्या होगी? हमारे विचार में न्यायिक सक्रियता तब तक जरूरी है जब तक जनता में इस बात को समझ न ले कि कार्यपालिका पारदर्शी तरीके से जनता की भलाई के लिए अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए बाध्य है। कार्यपालिका के अंदर इस बात का भय जरूर होना चाहिए कि अगर कोई अधिकारी जनहित के बजाय व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए काम करता है तो उसको इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।


जरूरी है संतुलित लोकतांत्रिक प्रणाली


जगदीप एस छोकर ( पूर्व प्रोफेसर और डीन, आइआइएम अहमदाबाद)

जगदीप एस छोकर ( पूर्व प्रोफेसर और डीन, आइआइएम अहमदाबाद)

बड़े अफसोस की बात है कि लोकतंत्र के दोनों स्तंभ विधायिका और कार्यपालिका आम आदमी की नजरों में अपना विश्वास खो चुके हैं। जहां लंबे अर्से से यह मान्यता रही है कि नौकरशाही को आम जनता के कष्टों से कोई लेना-देना नहीं होता और सामान्यतया जनहित में यह वर्ग अड़ंगे ही लगाता है, वहीं पिछले दशकों से राजनीतिक कार्यपालिका और विधायिका का प्रतिनिधित्व करने वाला राजनीतिक वर्ग भी अपने नाम के अनुरूप काम करने में विफल रहा है। लोकतंत्र के इन दोनों स्तंभों की अक्षमता और उठाए जाने वाले अनुचित कदमों से उपजे खालीपन को भरने के लिए तीसरा स्तंभ न्यायपालिका सामने आ रही हैं। हालांकि यह सचाई है कि अदालतें भी अब सदाचार की आदर्श नहीं रहीं। खासकर न्यायपालिका के निचले स्तर और कुछ मामलों में उच्च स्तर पर भी यह खामी दिखायी देती है लेकिन समग्ररूप में आम आदमी आज भी न्यायपालिका के प्रति आस्थावान है भले ही यह कितनी ही सुस्त क्यों न हो। यह भी सच है कि इन तीनों अंगों में से किसी को भी बहुत शक्तिशाली नहीं होना चाहिए और लोकतांत्रिक प्रणाली के समस्त अंगों में निहित शक्तियों के दायरों का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन यदि लोकतंत्र के दो स्तंभ अपना काम ठीक प्रकार से नहीं कर रहे हैं तो स्वाभाविक रूप से तीसरे को यथाशक्ति सामने आना चाहिए।


समय की जरूरत है



प्रशान्त भूषण (अधिवक्ता सुप्रीमकोर्ट)

प्रशान्त भूषण (अधिवक्ता सुप्रीमकोर्ट)

न्यायिक सक्रियता तब ज्यादा जरूरी होती है, जब सरकारी तंत्र या कार्यपालिका फेल हो जाए और पूरी व्यवस्था कुछ लोगों की मुट्ठी में स्थित हो जाए, जैसे आजकल हो रहा है। जब से नए मुख्य न्यायाधीश आए हैं स्थिति और अच्छी हुई है। आम जनता से जुड़े जनहित के मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जैसी सक्रियता न्यायपालिका आजकल दिखा रही वह आवश्यक है और समय की जरूरत भी।


सारे अंगों को बनना होगा सक्रिय


एमसी मेहता (जाने-माने पर्यावरण कार्यकर्ता)

एमसी मेहता (जाने-माने पर्यावरण कार्यकर्ता)

जिस तरह शरीर के सभी अंग महत्वपूर्ण होते है और किसी भी अंग के काम न करने से उसकी कार्यप्रणाली प्रभावित होती है। उसी तरह अगर किसी लोकतंत्र के सारे अंग अपने दायित्व का उचित पालन करें तो न्यायपालिका को जनहित के लिए बाध्य होकर आगे आने की नौबत ही न आए। देश में जो कानून हैं उनका पालन ही नहीं किया जाता है। कार्यपालिका अपने काम में विफल रही है। कहीं पर भी आम आदमी की सुनवाई नहीं होती जिसके चलते कानून में विश्वास रखने वाले व्यक्ति को अदालतें अंधेरे में एक उम्मीद की किरण की तरह दिखायी देती है। कायदे से लोकतंत्र के सभी स्तंभों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। जनहित के लिए अदालतों का सामने आना अच्छी बात है लेकिन अदालतों के पास और भी महत्वपूर्ण काम होते हैं। अगर सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं अपने दायित्व का सही तरीके से अनुपालन करें तो अदालत का बेशकीमती समय बचेगा जिसका सदुपयोग दूसरे कामों में किया जा सकेगा। दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात कि जनहित से जुड़े मुद्दों के साथ लापरवाही पर अदालत का ध्यान आकृष्ट कराने के लिए चंद लोग ही सामने आ पाते हैं। हर आदमी में इतनी निष्ठा और दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं होती कि वह किसी मामले को अदालत में उठाकर उसे एक मुकाम तक पहुंचाएं। इसलिए अगर देश के सभी अंग अपने अपने काम भलीभांति करने लगे तो सबकुछ अपने आप ही ठीक हो जाएगा।

13 फरवरी को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख जनहित के लिए जारी जिद्दोजहद! पढ़ने के लिए क्लिक करें

13 फरवरी को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “क्या है न्यायिक सक्रियता” पढ़ने के लिए क्लिक करें



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